#Geet by Ramesh Raj

-गीत-

जिनके आचराणों के किस्से केंची जैसे हों,

कैसे उनको गाँव  कहें जो दिल्ली जैसे हों।

नहीं सुरक्षा हो पायेगी गन्ध-भरे वन की

काटी जायेगी डाली-टहनी तक चन्दन की,

लोगों के व्यक्तित्व जहां पर केंची जैसे हों।

जब हम सो जाएंगे मीठे सपने देखेंगे

वे घर के तालों के लीवर-हुड़के ऐंठेंगे,

क्या उनसे उम्मीद रखें जो चाभी जैसे हों।

तय है वातावरण शोक-करुणा तक जायेगा

कौन हंसेगा और ठहाके कौन लगायेगा?

परिचय के संदर्भ जहां पर अर्थी जैसे हों।

वहां आदमीयत को पूजा कभी न जायेगा

कदम-कदम पर सच स्वारथ से मातें खायेगा,

जहां रूप-आकार मनुज के कुर्सी जैसे हों।

-रमेशराज

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.