#Geet by Sushila Joshi

फिर …

सुदूर जा कर बस गया
कहीं सवेरा
फिर सिमट कर आ गया
घना अंधेरा ।।

दृश्य बादल ने कोई
ऐसा उकेरा
फिर ठिठक कर रह गया
स्वर्णिम सवेरा
कोरे रिश्तों के भवन ऐसे जमे
खण्डहरों से हो गया
मेरा बसेरा ।।

चीखते दर्द का पिट गया
फिर से ढिंढोरा
विवश बैठा रहा गया
ठाली ठठेरा
अपनेपन के दौर भी
ऐसे चले कुछ
फिर उखड़ती साँस ने
मन को झकोरा ।।

आन लिपटा रात से फिर
वो धुंधलका
चाँद की गंगा नहाया
था तहलका
याद का ऐसा चँदोवा
तन गया कि
चाँद को फिर रह गया
तकता चकोरा ।।

फिर तरसता सांझ को
पागल चितेरा
फिर सरकता आँख से
काजल घनेरा
अजनवी सी जिंदगी अब
हो गयी है
हर दिशा से बांह
फैलाता अंधेरा ।।

सुशीला जोशी
मुजफ्फरनगर

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