#Geet by Vijay Narayan Agrwal

(ममता )
–:भजन:–भाग (1)

तेरे द्वार आऊँ,
माँ आऊँ तो कैसे।
तुम्हें माँ रिझाऊँ,
रिझाऊँ तो कैसे।।
1
बना है भवन तेरा,
चोटी के ऊपर,
कनक ज्योति शीतल,
गुफाओं के भीतर,
दशा ही हमारी ,
नहीं चलने लायक,
मरम को जगाऊँ ,
जगाऊँ तो कैसे——
2
तेरे पास बहती है,
गंगा की धारा,
सुदर्शन है मेला,
सुखद भाई चारा,
दुवारे लुभाते हैं,
हनुमान पायक,
नजर को हटाऊँ ,
हटाऊँ तो कैसे—–
3
नहीं पास पैसा ,
अडी़ है सुमरनी,
हमें भी दिखादो जि,
ममता की धरनी,
हुये भाव वेकल,
बिधी के विधायक,
धरम को निभाऊँ,
निभाऊँ तो कैसे—–
4
सुना है तुम्हारी,
विकलता निराली,
हरे दुक्ख पीड़ा,
भरे झोली खाली,
समय की कृपणता,
बड़ी कष्ट दायक,
लगन धुन बढा़ऊँ,
बढ़ाऊँ तो कैसे—–
5
बसी हो हृदय में,
सदा आदि देवी,
है पौरुष ‘भ्रमर’ का,
बड़ा ही फरेबी,
रटे उसकी जिह्वा ,
विनायक विनायक,
भरम को मिटाऊँ,
मिटाऊँ तो कैसे—–
क्रमश: :—
विजयनारायणअग्रवाल ‘भ्रमर’

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