0205 – Ishaan Sharma , Anand


गज़ल :

तेज़ लहरों पर सफीना आ गया।
मुश्किलों के साथ जीना आ गया।।
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तीर तेरे सब जिगर के पार हैं।
आज मेरे काम सीना आ गया।।
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कुछ परिन्दे इस कद़र ऊँचे उड़े।
आसमानों को पसीना आ गया।।
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ऐक तेरे इश्क में जलता रहा।
दूसरा सावन महीना आ गया।।
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आग सीने की बुझाने क्या गये?
दिलजलों को जाम पीना आ गया।।
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फरवरी की सर्द रातों में हमें।
आतिशे-ग़म से पसीना आ गया।।
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डूबते ही बीच दरिया में हमें।
पार जाने का करीना आ गया।।


गज़ल :

ख्वाहिशे-मँज़िल भले आसान है।
चल पड़े तो दूर तक मैदान है।।
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मैं खड़ा आवाज़ देता रह गया,
वक्त रूठा सा कोई मेहमान है।।
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है बड़ा दुश्वार जीना ज़िन्दगी,
साँस लेना ही फक़त आसान है।।
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दौलतें मेरे मुकद्दर में कहाँ,
पास मेरे आज भी ईमान है।।
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टूटने पर भी न मुकरे बात से,
आइना, मत सोचिऐ इन्सान है।।
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हाथ में है आज क़ातिल का गला,
मौत मेरे हाथ तेरी जान है।।
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आ गया तूफान से लड़ना हमें,
ऐ तड़पती लौ तेरा ऐहसान है।।
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है सभी को ऐक दूजे की ख़बर,
कौन किसकी ज़ात से अन्जान है।।


गज़ल :

मुझे जिसकी हवा में ताज़गी मालूम होती है,
वही गुज़री गली से आज भी मालूम होती है।
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मिला जितनी दफा हर मर्तबा पागल कहा उसने,
मेरी हालत उसे हर रोज़ ही मालूम होती है।
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कटे दिन जो हमारे वो बड़े मर मर के काटे हैं,
मिली ही मौत जैसी जिन्दगी मालूम होती है।
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जीत कर सारे मुकामों को दिखाया है,
तेरी ही बात पर बस मात सी मालूम होती है।
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जुबाँ खामोश थी शायद नज़र का ही किया होगा,
उसे हर बात ही जो राज़ की मालूम होती है।
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न जीने की तमन्ना है, न है आसान मर जाना,
मुझे ये जि़न्दगी अब कैद सी मालूम होती है।
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कभी जो हाल दिल का मैं सुनाने बैठ जाता हूँ,
मेरी हर बात उनको शायरी मालूम होती है।


गज़ल :

देखकर बस आसमाँ मैं रो दिया,
था मेरा कच्चा मकाँ मैं रो दिया।

भीगकर बरसात में जब घर गया,
डाँटने को थी न माँ मैं रो दिया।

यादकर बचपन बनाई कश्तियाँ,
फिर डुबोकर कश्तियाँ मैं रो दिया।

आँख भर कर दे गई वो अर्ज़ियाँ,
फाड़कर सब अर्ज़ियाँ मैं रो दिया।

याद घर की आ रही थी यूँ बहुत,
आ गई जब हिचकियाँ मैं रो दिया।

फिर किसी ने ज़ात मेरी पूछ ली,
चुप रही मेरी ज़ुबाँ मैं रो दिया।

थी ख़ुशी परदेस जाने की मगर,
छोड़ते ही आस्ताँ मैं रो दिया।

हर कोई मुझपर यकायक हस दिया,
सोचता हूँ ये कहाँ मैं रो दिया।

ख़ुद मसल डाला है अपने फूल को,
मुँह छुपाकर बागबाँ मैं रो दिया।


गज़ल

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आइने से खुद मुँह छुपाते हो।
हर दफा मुझको आज़माते हो।।
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हर घड़ी तुम जो मुस्कुराते हो।
आँधियों में लौ सी जलाते हो।।
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आप गुजरा सा वक्त हो कोई।
खुद नहीं आते, याद आते हो।।
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चुप रहे मुझमें इक छुपा शायर।
पूछता हूँ जब क्या कमाते हो?
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मैं किनारों सा, तुम लहर जैसे।
पास आते हो, दूर जाते हो।।
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दोष देते हो धूप को सारे।
पेड़ बनने से हिचकिचाते हो।।
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खुद घड़ी भर में तोड़ देते हो।
उँगलियों से जो दिल बनाते हो।।


Kavita :

जमाने भर का विष अक्सर लबों से मैं लगाती हूँ।

मुझे वरदान है कोई जो फिर भी मुस्कुराती हूँ।।

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बदन को घूरती नज़रें मुझे हर रोज़ चुभती हैं,

जुबाँ खामोश रखती हूँ, जिगर पर चोट खाती हूँ।।

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तले छत के रहोगे तो तुम्हारा वो मकाँ होगा,

मुझे है इल्म ऐसा कि मकाँ को घर बनाती हूँ।।

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मेरे दिल की तबीयत को समझ पाया नहीं कोई,

नज़र में अश्क रखती हूँ, लबों से मुस्कुराती हूँ।।

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सती कहकर मुझे इक दौर में जिन्दा जलाते थे,

दहेजों के लिऐ अब भी जलाई रोज़ जाती हूँ।।

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मेरी माँ कोख तेरी हो गई है आज मुर्दाघर,

यहीं से था सफर मेरा, यहीं से लौट जाती हूँ।।

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ख़ता है क्या बताऐ बिन सज़ा ऐ मौत देते हो,

लहू से आज भी मैं आतिश ऐ हस्ती बुझाती हूँ।।

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नहीं कमज़ोर इतनी जो समझ लो पैर की जूती,

बना लूँ रूप चण्डी का तो शिव को भी झुकाती हूँ।।

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