#Kahani by Ajay Ahasas

विजयदशमी/ आज का रावण

एक दिन दस सिर वाला व्यक्ति हमसे टकरा गया , टकरा क्या गया बातों ही बातों में बहस पर आ गया ।हमने कहा- श्रीमान थोड़ा दीजिए ध्यान आपको देखकर मैं हूं हैरान । दस शीश आँखें बीस, क्या मैं आपको नहीं दिखा लंकाधीश । जबाब मिला- थोड़ा तमीज से बोलो, बोलने से पहले तोलो । हम हैं लंकेश , जिससे डर गये थे महेश। तेरी औकात क्या है तुच्छ मानव, हम तो केवल बदनाम हैं वास्तव में तू ही है असली दानव । ओह तो आप ही हैं लंकेश रावन, जिनके विचार बड़े पावन । मैनें कहा एक बात बताइये, मेरी शंका को दूर भगाइये । आपके पास हैं दस मस्तक , शैम्पू लगाने में आती होगी दिक्कत । अगर कभी सिर करे दर्द , तो पता ही नहीं चलेगा किस सिर में है मर्ज। रावण बोला- तुम लोग एक ही मुख पर कितने मुखौटे लगाते हो, कितनो को उल्लू बनाते हो, क्या थक नहीं जाते हो। अरे आप तो सीरियस हो गये अच्छा ये बताइये हमने सुना है आपने मचाया था हाहाकार , और आपके अन्दर था काफी अहंकार । रावण ठहाका मारा मैने कहा इसमें हंसने वाली कौन सी बात है क्या मैने कोई जोक मारा । रावण नें कहा और नहीं तो क्या , एक कलयुगी इंसान के मुँह से ये सब सुनकर अच्छा नहीं लगा । तुम लोग एक छोटी मोटी डिग्री क्या ले लिए , दो चार अक्षर अंग्रेजी क्या सीख लिए। बात ऐसे करते हो जैसे इस धरती पर तुम ही हो समझदार बाकी सब गवार। अरे मैने चारो वेद पढ़ा, उन पर टिप्पणी गढ़ा । चाँद की रोशनी में खाना तक पकवा दिया , दुनिया का पहला विमान और सोने की लंका तक बनवा दिया । इतना सब करके अगर कर लिया थोड़ा घमण्ड , तो तू क्यों हो रहा है इतना प्रचंड । चलो ठीक है बाॅस जस्टीफाई कर दिया आपने, अच्छी तरह समझा दिया आपने। लेकिन लोगो को ये क्या तरीका दे गये, गुस्सा आने पर परबीबी को किडनैप कर ले गये। इतना सुनकर रावण सीरियस हो गया और पड़ गया सोच में, फिर तुरत ही आया जोश में चेहरे पर एक विचित्र हंसी ,और बातों की एक व्यंग्य उसने मुझ पर फिर कसी । बोला मानता हूं मैने श्रीराम की पत्नी को उठाया, श्रीराम को बहुत सताया। मैने किया बड़ा गलत काम, और भुगता उसका परिणाम । पर प्यारे मेघनाद की कसम , जान लो ये सच्चाई मैनें कभी उनकी गरिमा को ठेस नहीं पहुँचाई । और तुम कलयुगी इन्सान बन गये हो हैवान । छोटी-छोटी बच्चियों को नहीं बख्शते, पहले तो करते प्रेम फिर छलावा परसते। अरे तुम दरिन्दों में कोई नैतिकता बची है अपने आपको बचाने का, फिर क्या अधिकार है तुम्हें मेरे ऊपर उंगली उठाने का। मैं कुछ सोचते-सोचते थोड़ा रुक गया, इस बार मेरा सिर शर्म से झुक गया । पर मैं भी ठहरा पक्का इन्सान बोला जाओ जाओ दशहरा है हम सब सम्हाल लेंगे, तुम्हारी सारी दबंगई निकाल देंगे। इस बार वो इतनी जोर से हंसा कि मैं गिरते गिरते बचा। मैनै कहा- इतनी जोर जोर से हंसते हो दस दस मुंह लेके, कान के पर्दे फाड़ दोगे क्या हंस हंस के। रावण बोला- यार वैसे कमाल हो तुम, शैतानों की जिन्दा मिसाल हो तुम। इसमें कोई शक नहीं कि विज्ञान नें तरक्की कर किया कन्फ्यूज है पर काॅमन सेन्स के मामले में फ्यूज है । हर साल मेरे पुतले को जला कर होते हो खुश, पुतला जब जलने लगता है तब मैं तुम्हारे अन्दर जाता हूं घुस। वैसे अब तुम लोगो के अन्दर मुझे घुटन होने लगा है क्योंकि मैने जो सोचा न था आज का इन्सान वो करने लगा है। इतनी बेइज्जती के बाद कुछ बोलने को बचा न था। सोचा तो लगा वो रावण ही सच्चा था। आज हम इतने गिर गये, कि हमारी सामाजिकता और नैतिकता पल भर में बिखर गये ।

           अजय एहसास

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