#Kahani by Ajeet Malviya Lalit

भंवरीदेवी का प्रेत

 

लता अपने दो बच्चों के साथ साथ छत पर सो रही थी। रात के तकरीबन बारह  बजे उसे ऐसा महसूस हुआ कि उसके ऊपर कोई चढ़ गया है, उसने चिल्लाना शुरु कर दिया ।

उसके पति ने कहा – “क्या हुआ क्यों चिल्ला रही हो”?

 

लता ने घबराते हुए कहा कि- “मेरे ऊपर कोई चढ़ गया था”।

और वह रोने लगी।

रमेश (लता का पति) ने उसे पानी पिलाया और समझाया “कि डरो मत कुछ नहीं होगा”।

 

इतने में रमेश के दोनों छोटे भाई महेश व सुरेश छत पर आ गए। उन्होंने पूछा कि “क्या हुआ हो गया” तब, रमेश ने घटना बताई।

 

महेश और सुरेश में महेश बहुत वाक्पटु व निडर था लेकिन सुरेश जो है बहुत डरपोक था।

 

महेश नीचे दौड़ते हुए घर में गया क्योंकि उसे एहसास महसूस हुआ कि वहां कोई भागते हुए जा रहा है।

यह कोई पहली घटना नहीं थी जब उनके साथ ऐसा हुआ था। कुछ दिन पहले ही जब रमेश और लता अपने कमरे में सो रहे थे तब उन्हें सोते हुए ही रमेश की गर्दन किसी ने दबा दी और वह हडबडाकर कर जाग गया और बहुत घबरा गया था इसी के चलते उन्होंने छत पर सोने का फैसला लिया था।

 

हालांकि लता अपने पति और बच्चों के साथ छत से नीचे आ गए और फिर नीचे आंगन में बिस्तर करके लेट गये वह रात  तो उन्होंने लगभग जागे हुए ही गुजारी क्योंकि दोनों को डर लग रहा था। जैसे तैसे रात काटने के बाद सुबह हुई और रमेश के लिए मानो उस दिन सूरज की लालिमा काली बनकर निकली थी क्योंकि रमेश को भी मालूम नहीं था कि आज उसके साथ क्या होने वाला है।

 

सुबह के आठ बजे थे कि रमेश अचानक से अजीबोगरीब आवाज में चिल्लाने लगा उसकी आंखें ऊपर की ओर चढ़ गई वह अजीब सी हरकतें करने लगा, किसी को समझ नहीं आया कि यह क्या हो गया लता डर के मारे कांपने लगी इतने में ही सुरेश और महेश जी आ गए ।

रमेश की इस अजीबोगरीब हरकत को देखकर वह दोनों भी स्तब्ध रह गए।

रमेश ने कहा – “भाभी जरा पानी लेकर आओ”

 

लता तुरंत पानी लेकर आई। महेश ने पानी के छींटे रमेश के मुंह पर मारे, फिर ही कुछ देर में रमेश एकदम नॉर्मल हो गया;

उसने हो संभालते ही कहा- “क्या हो गया तुम सब भीड़ लगाकर क्यों खड़े हो”।

 

लता रोने लगी और कहा- “कि कुछ नहीं हुआ”।

लता और सुरेश काफी दहशत में आ चुके थे अभी की घटना को लेकर तथा कल रात की घटना को सोचकर लेकिन महेश जो कि  घबराता नहीं था।

 

उसे लग रहा था कि कहीं ना कहीं कोई ना कोई तो गड़बड़ है पर मामला क्या है, उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

 

उस दिन इसी तरह के और भी दौरे पड़े लेकिन कुछ ही देर में वह ठीक हो जाता था लेकिन उसकी इन हरकतों की वजह से उनका पूरा परिवार सदमे में था और बहुत परेशान भी था, लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा था।

हालांकि सुरेश ने कहा कि-  “कुछ गड़बड़ है एक काम करते हैं किसी पंडित को बुला लेते हैं”।

लेकिन महेश ने साफ मना कर दिया कि- “कोई पंडित नहीं आएगा”।

 

महेश भले ही छोटा था लेकिन उसकी बात को सहमति मिली, लेकिन यह समस्या का हल नहीं था, क्योंकि सभी डरे हुए थे पर महेश इन सब पर विश्वास नहीं करता था सो उसके आगे किसी की नहीं चली।

उस दिन लता ने खाना भी डर-डर के बनाया उसे हमेशा डर सताया रहता था।

इसी कशमकश में शाम हो गई और शाम धीरे धीरे रात में ढल रही थी और इन सब का डर भी भयानक रूप लेता जा रहा था।

 

सुरेश ने ऐलान किया कि- “आज मैं इस घर में नहीं सोऊंगा” और वह खाना खाकर पड़ोस में ही एक चाचा के यहां रात में सोने चला गया।

रात हुई आज सब के बिस्तर नीचे किए गए थे आंगन में सभी एक कतार में सो रहे थे। लता एक तरफ तो दूसरी तरफ महेश व उनके मां-बाप सो रहे थे।

ढेर सारी  कुविचार लता के दिमाग में चल रहे थे इसी वजह से उसकी आंखों में नींद नहीं आ रही थी। लेकिन धीरे-धीरे वो शांत होती गयी और उसकी  झपकी लग ही रही थी अचानक रमेश बहुत जोर से चीखा और उठ बैठा ।

लता कांप कर सिहर गई रात के फिक्स बारह बजे रमेश जोर-जोर से चीखने लगा।

इतने में महेश उसके पास आया और जोर से तमाचा रसीद किया और कुछ ही मिनटों में रमेश शांत हो गया और चुपचाप सो गया जैसे ही कुछ हुआ ही न हो ।

अब जैसे तैसे उनकी वह रात्रि भी गुजर गई।

 

सुबह से तो लता भी मानो किचन में जाने से कतराने लगी और जब तक उसके साथ उसकी सास रहती तब तक ही हो किचन में खाना बनाती क्योंकि वह बहुत डर चुकी थी हालांकि उस दिन रमेश को दौरे आएं लेकिन कम।

 

परंतु अजीबोगरीब तरीके से व्यवहार कर रहा था उसकी आंखों में एक भयानक छवि थी जो सामान इंसान को डराने के लिए काफी थी, सुरेश इन सब से अनजान पड़ोसी के घर में चैन कि नींद  सोया और वह घर भी नहीं कम ही आता था।

घंटो तक घर से बाहर रहता था ताकि उसे किसी तरह के डर का सामना ना करना पड़े।

 

महेश ने  सोचा कि अब कुछ किया जाए वह गांव के एक व्यक्ति के पास गया जो कि काफी पढ़ा लिखा था और इन अंधविश्वासों पर यकीन नहीं करता था जिसका नाम ओम व्यास था उस गांव में वह बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति था।

महेश ने उनको सारी घटना बतलाई और कहा कि- “रात बारह बजे अचानक रमेश भैया को दौरा पडते हैं।

 

ओम ने कहा कि- “ठीक है तुम घर जाओ मैं शाम को  घर आता हूं देखते हैं फिर क्या होता है।

 

रात नौ बजे लगभग ओम ब्यास आया, उस घर में पहले से ही कुछ और लोग भी मौजूद थे और इसी विषयांतर्गत वार्तालाप कर रहे थे।

ओम ब्यास भी जाकर बैठ गया और यह सब लोग बारह  बजने का इंतजार करने लगे।

घड़ी अपनी गति से टिक टिक चल रही थी।

 

समय बीतता गया रात के 11:59 हो गए और ओम व्यास  रमेश के पास बैठ चुका था और गांव वालों में से भी इंतजार में बैठे थे कि कब कुछ हलचल हो।

ठीक 12:00 बजे रमेश चीखने लगा, उसके चीखते ही ओम ने रमेश के बाल पकड़ लिये और चोटी बनाकर गांठ लगा दी और अब प्रारंभ होती है वार्तालाप:-

 

ओम व्यास- “बता कौन है तू और रमेश को क्यों परेशान कर रहा है”?

 

रमेश- “मैं भंवरी देवी हूं”।

 

“तो तू रमेश को क्यों परेशान कर रही है और क्या चाहती है”

 

– “मुझे मुक्ति चाहिए मुझे किसी को परेशान करने का कोई शौक नहीं है, लेकिन इस (रमेश) ने मुझे मारने में मेरे पति की मदद की है”।

 

-“कैसी मदद और तू कैसे मरी”? ओम कड़क आवाज में बोला।

 

– “मुझे किसी ने नहीं मारा मैंने खुद ही फांसी लगाई है लेकिन मुझे मेरा पति प्रताड़ित करता था तब यह रमेश भी उसकी सहायता करता था, इसलिए ही मैं इस को परेशान कर रही हूं”।

 

– “तू कहां की है”

 

– “मैं बाईपास के पास रहती थी और एक एडवोकेट थी और अपने पति से प्रताड़ित होकर मैंने घर में ही फांसी लगा ली थी”।

 

– “तो तू रमेश को कैसे लगी”?

 

– “यह जब उस दिन साइकिल से आ रहा था तो मैं रात में इस को लग गई लेकिन मुझे अब मुक्ति चाहिए”।

 

वह मिट्ठू की तरह पटर-पटर जवाब दे रही थी।

व्यास के सवालों के और उसके जबाबों को सब लोग बड़े ध्यान से सुन रहे थे।

रमेश की गुत्थी सुलझी नजर आ रही थी।

 

ओम ने कहा-  “ठीक है कल तुझे मुक्ति मिल जाएगी लेकिन आज रात रमेश को परेशान मत करना”।

 

और उसके बाद ओम कहा कि अब रमेश को शांति से सोने दो।

 

कल सुबह जब भंवरी देवी के बारे में पता लगाया तो सारा रहस्य सुलझ गया- भंवरीदेवी एक बहुत बड़ी वकील थी और बहुत बड़ी संपत्ति की मालकिन भी थी। इसका पति किसी और से प्यार करता था तो वह भंवरी को प्रताड़ित करता था लेकिन भंवरी बहुत सारी सभ्य और शालीन औरत थी वह अपने पति को कुछ भी नहीं करना चाहती थी, बावजूद इसके  कि वह एक बड़ी वकील थी।

उसके पति से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली थी अपने घर में ही और इस बात को 2 साल बीत चुके थे।

रमेश ने भंवरी के घर में बतौर नौकर एक साल काम किया और उसके पति के साथ रमेश की खूब पटती थी, भंवरी को मालूम था कि रमेश भी उसके पति की खूब सहायता करता है।

 

इसी वजह से रमेश उस दिन जब वेल्डिंग की दुकान से काम करके रात आठ बजे अपनी साइकिल से घर लौट रहा था तभी भंवरी देवी की आत्मा उसको लग गई।

 

फिर पंडित को बुलाकर रमेश को सामने बैठा कर कुछ पूजा पाठ किए गए और भंवरी देवी की आत्मा को हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई।

अजीत मालवीया’ललित’

 

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