#Kahani by Ajeet Singh Avdan

माँ की डायरी ( लघु-कथा )

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आज मेरी बेटे स्वरोचिष का १२ वाँ जन्म-दिवस है,जिसने मुझसे वचन लिया है कि मैं उसे साइकिल उपहार में दूँगा बस इसी लिए आज ऑफिस से कुछ जल्दी निकल कर घर पहुँचा तो मेरी पत्नी संगीता जिसे मैं प्यार से मनकी कहकर बुलाता हूँ, मुझे लेकर घर में बने मंदिर की ओर गई मैं द्वार पर रुक गया क्यों कि मंदिर में इस प्रकार बिना हाथ-पाँव धुले जाने की अनुमति संस्कार में नहीं मिली थी, मनकी लकड़ी से बने मन्दिर के नीचे से एक दराज़ निकाल कर ले आयी,मैं हैरान था कि आज तक हमें यह पता नहीं था कि वहाँ इस तरह की कोई दराज़ भी है जिसके बारे में मनकी को भी आज ही सफाई करते समय पता चला था । दराज़ में अत्यन्त छोटे बच्चे का एक झबला, लाल रंग के कपड़े में बँधा एक मंगलसूत्र और सन् १९७२ की एक डायरी के अलावा और कुछ नहीं था ।

मैने डायरी को हाथ में लेकर प्रणाम की मुद्रा में माथे से लगाकर उसे खोला पहले ही पृष्ठ पर एक फोटो रखा था जो कि मेरे दिवंगत पिता जी का था, अगले पेज पर दृष्टि पड़ते ही मुझे ज्ञात हुआ की यह डायरी मेरी माँ की है, जिसे पढ़ना आरम्भ करते ही मुझे अनुभूति हुई कि अब इसे बिना पूरा पढ़े मैं और कोई काम नहीं कर पाऊँगा सो पढ़ते-२ वहाँ से चलकर कुछ दूर रखे सोफे पर आकर बैठ गया ।

पूरी डायरी पढ़ने के पश्चात मुझे ज्ञात हुआ कि इसमें मेरे अलावा किसी और के बारे में कुछ लिखा था तो वो मेरे पिता जी थे, जो कि फौज में दुश्मनों से लड़ते शहीद हो गए थे जिसकी ख़बर मिलने पर सिर्फ एक बार माँ ने लिखा था कि आज वह बहुत दुखी हैं जब कि उन्हें सारा जीवन दुख ही मिला था ।

रात होने तक मैनें बे-मन से बाकी के काम निपटाए और बिस्तर पर जाकर लेट गया मगर नींद नहीं आ रही थी सारा वृत्तान्त एक चलचित्र की भाँति आँखों के आगे चलने लगा ।

आज मुझे पहली बार आभाष हुआ कि मैं माँ बनने वाली हुँ, मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज मेरे पेट में पल रहे बच्चे ने पहली बार कुछ हरकत की,मुझे लगा जैसे इसने अपने पैर चलाए हों,मै बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज मैने एक चाँद से बेटे को जन्म दिया,जिसका मुखड़ा देखते ही मैं अपनी प्रसव-वेदना भूल गई,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज इसके नामकरण संस्कार पर इन्होने सर्वप्रथम पंडित जी के द्वारा बताए गए नाम को इसके कान में पुकारा,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज अवदान मुझे देखकर बिना बुलाए मुस्कुराया,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज ये अपने काम पर वापस जा रहे हैं किन्तु मैं बहुत प्रसन्न हूँ क्यों मेरे बेटे ने पहली बार अपने आप करवट ली है ।

आज मेरा राजा बेटा पहली बार घुटनों के बल चला,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज इसने पहली बार अपने आप खड़े होकर मेरी तरफ़ आने का प्रयास किया,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज अवदान ने पीछे से आकर मेरा पल्लू खींचा,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

कल इसका पहला जन्म-दिवस है,मैं बहुत प्रसन्न थी कि उनके शहीद होने कि ख़बर मिली ।

आज इसका जन्म-दिवस है और मैं बहुत दुखी हूँ ।

आज मेरी बहू ने मेरे पोते को जन्म दिया जिसकी आँखें बिल्कुल अपने दादा जी की तरह हैं,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज मेरा पोते का नामकरण है मैने इसके कान में इसका स्वरोचिष नाम पुकारा,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आज स्वरोचिष ने पहली करवट ली,मैं बहुत प्रसन्न हूँ ।

आखिरी पँक्ति के स्मरण पर मुझे भान हुआ कि मेरी आँखों से आँसू अनवरत बह रहे थे और याद आया जब स्वरोचिष घुटनों के बल चलने लगा था तब एक दिन उसे सीढ़ियों पर देख उसकी तरफ लपकी मेरी माँ हड़बड़ाहट में स्वयं को संभाल न सकीं और गिरने पर सिर में आई चोट के कारण उनका स्वर्गवास हो गया था । …अवदान

 

 

 

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