#Kahani By Alka Jain

मजदूर  का पसीना

आज फिर मजदूरी नहीं मिली।वह निराश झोपड़ी में लोट आया। गांव छोड़ कर  शहर आया था । मालूम पड़ा था शहर में मजदूरी आसानी से मिल जाती है।मगर यहां भी वही रोने।_अनाज नहीं है। छोरा छोरी क्या खायेंगे?रामू कुछ नहीं बोला। बीबी के सवाल पर। मेरे को लगता है ठेकेदार ने इस बार पैसे मार लिये। पिछली बार तीन दिन मजदूरी की थी तब चार दिन का अनाज आ गया था। इस बार नि आया।  राम बोला  कौन जाने?अपनी पडिया लिखिया तो है नहीं। हिसाब-किताब पतौ नि। छोरा छोरी  कौ मांगने पहुंचा दे। रोटी इतने बड़े शहर में कौन ना कोई तो देगा।अपनी तो भुके सो जायेंगे।चारों कहा गए हैं। राम ने पूछा। यही आसपास खेल रहे हौगे । छोरा छोरी ने समझा दे, लोहा बीन लाया करे।  कभी मजदूरी नहीं मिलती तब बेच के पेसे का  परमल खा लिया करें। पानी दे। बड़ी भूख लगी है। राम वहीं बेठ गया।

 तभी चारों बच्चै आ गये। रोटी मांगने लगे। अधनंगे अपने बच्चों को देख राम रोज खुश होता है। मगर आज नही हूंआ। आज रोटी नहीं हे। औलाद  को भूखा सोना पड़ेगा। बीबी की बात उसके कानों में गूंज रही है। ठेकेदार ‌‌ने पैसे मार लिए। कम अनाज आया इस बार।उसका खून खौला। पैसे कम  दिये, मेरे बच्चेभूखे।  किसी ने रोटी नहीं दी।उसने चाकू उठाया। उसकी आंखों में नाराजगी का नज़ारा देख बीबी घबरा गई। कोई करी लिया हो तुम ? ठेकेदार  को मार दूंगा। बीबी ने राम से चाकू  छिनने की कोशिश की। छिना झपटी की आवाज पड़ोसी के कान तक पहुंची।

नही नहीं  बीबी चीखने लगी। अपने बच्चे पालने है। छोटे हैं अभी। पास की झापडी से लोग जमा हो गए। मेरी पसीने की कमाई ठेकेदार ने मारी। मेरे बच्चे को रोटी कहा से दूं। मेरे बच्चे को रोटी कोई नहीं देता। इतना बड़ा शहर रोटी छोटे छोटे बच्चों को कोई नहीं दे सकता क्या?  मै मार दूंगा ठेकेदार को। पड़ोसी उसका दर्द समझे।उसका इलाज भी उन्हें पता है। पड़ोसी ने अपनी दारू की बोतल में से रामू को पिला दी।अब कोई सवाल नही उठाया राम ने। पैसे कम या औलाद भूखी, कोई औलाद को रोटी क्यों नहीं देता?  शहर काहे आया? इतनी कम मजदूरी काहे?  सब भूल बैठा राम, बस दारू पीकर कर सारे ग़म भूला दिये, राम ने हां राम ने।  सामने के बंगले से टीवी पर पर ग़ज़ल आ रही  थी। 

अंकित होंगे मेरे लहू से बर्बादी के अफसाने 

किसने सोचा था किसने जाना था यार

पतझड़ आयेगी आ कर चली जायेग

पतझड़ मगर जिदंगी बन जायेगी

डूब जाती है कश्ती भंवर में फंस कर

अपनी कश्ती का भी यही अंजाम होगा

किसने सोचा था किसने जाना था यार

सुना था महबूब बेवफा होते हैं कोई कोई

मेरे महबूब की आंखों में फरेब होगा

किसने सोचा था किसने जाना था यार

दर्द है वक्त ले कर कट मिट जायेगा

दर्द मगर लाइलाज होगा

किसने सोचा था किसने जाना था यार

कांपती है जमी टूटता है आसमां

ये मंज़र दिवाना मोहब्बत में देखेगा

कीसने सोचा था किसने जाना था यार

अंकित होंगे मेरे लहू से बर्बादी के अफसाने

किसने सोचा था किसने जाना था यार

 

 

 

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