#Kahani by Archana Dubey Shaili

कालचक्र
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समय ने भटका दिया सब कुछ छीन कर,प्रत्येक वस्तु का अभाव ही बना रहता है।
अब तो उसे ऐसा लगने
लगा कि इस बेरहम समाज में बेबस और मजबूर का कोई सहारा नहीं, रोटी के भी लाले पड़ गये, आटा नहीं है और आटा लाने को पैसे चाहिए,दो दिन से तवियत भी खराब है ।
बदन बुखार में तप रहा था।
दो दिन से खाना भी नहीं खाया शायद भूख न सह पाने से ही बुखार हो गया था,किसी काम की उम्मीद लिए अपनी मंजिल की ओर कदम उठाए चला जा रहा था। तभी उसने एक जगह देखा गाड़ी से गैस सिलेंडर उतारने का काम चल रहा था,।
वहां काम तो मिला पैसे नहीं मिले भगा दिया क्योंकि कार्य पूरा न कर सका बुखार फिर आ गया था।आँखों में आंसू लिए, किस्मत को कोसते हुए, क्या कहूं किससे कहूं कौन सुनेगा कोई पूछने वाला नहीं, यदि कोई था तो उसे ताने कसने वालों की कमी न थी । पिछली साल हाईस्कूल में फेल जो हो गया था।
यदि आज माँ, जीवित होती तो कभी तो पूछती कि तुझे किस वस्तु की आवश्यकता है। मेरे पास तो पूरी किताबें भी नहीं स्कूल की फीस भी टाइम से नहीं मिलती साथ के बच्चे अच्छे कपडे पहनते हैं अपने साथ पैसे भी रखते है लेकिन उसे याद न था कि नये कपडे कब पहने थे उसे तो छोटे कपडे भी वन जाते और बडे लोगों के भी,
अब तो आदत सी हो गई थी जो जैसा करने को कहता वह कर दिया करता था, क्योंकि, रोटी और कपडों के अलावा उसकी अपनी कोई जरूरते ही नहीं थी।
अब किसी परिचित व्यक्ति से कुछ पैसे उधार देने की खातिर वहां पहुंचा पैसे तो मिले लेकिन वहाँ किसी ने पानी तक को नहीं पूछा वो कहते है न कि घर से खाके निकलो तो गैर भी पूछ लेते हैं और खाली पेट अपने भी विसार देते है।
आटा खरीद कर सीधा अपने कमरे पर जाकर रोटियाँ बनाना आरम्भ किया ।आज बिना किसी सब्जी के नमक की रोटियां बडी स्वादिष्ट लग रही थीं । वो आज भी उनका स्वाद नहीं भूला न दुनिया के किसी खाने में वह स्वाद मिला।यही सोचता रहा…..इस कालचक्र की चाल अटल है।

अर्चना शैली दुबे
फरीदाबाद

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