#Kahani by Arun Kumar Arya

छोटी बहू की हार
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आखिर वह दिन आ ही गया जब छोटी बहू वर्षों से मन में दबे गुब्बार को एक एक कर विस्फोट करने लगी।कब तब वह बर्दाश्त करती ? बरदाश्त करने की भी एक सीमा होती है।बरदाश्त करते करते उसे तीस साल से ऊपर हो गए, सोचती रही चलो अब सुधर जाएंगी, अब सुधर जाएंगी, सुधरने को कौन कहे,रोज किसी न किसी बात को लेकर अड़ोस-पड़ोस व रिश्ते नाते के लोगों से शिकायत करना उनका धंधा बन गया था।एक तो सेवा भी करो दूसरे शिकायत भी सुनो, जब से वह व्याह करके इस घर में पैर रखी तब से इनके आतंक के साए में वह जीती रही ।हद तो तब हो गयी जब छोटी बहू के पैर टूटने के बाद भी बूढी सास के आदत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।जो ऊपर चढ जाती थी तो फिर नीचे उतरने का नाम ही नहीं लेती रही। इधर -उधर जाने के लिए पैरों में जान था लेकिन खाना लेने के लिए नौकर जरुर चाहता रहा।आज छोटी बहू अपनी आपा खो चुकी थी,उसकी बड़ी बहन और जीजा भी आए थे लेकिन बे रोक टोक के वह बोले जा रही थी। दो दिनों से खाना भी बनाना बन्द कर दी थी और जिद्द कर बैठी थी कि जिसको जरुरत पड़े वह खाना बनाये और खाये,न तो मैं खाना बनाउँगी और न ही खाऊँगी।
घर की विषम परिस्थितियों को देखकर ही उसके पति ने अपने साढू को बुलाया था ताकि मामला कुछ शांत हो जाय।बाहरी व्यक्ति को किसी अन्य के परिवार के विषय में बहुत सोच विचार कर निर्णय लेना पड़ता है ताकि उसे कोई भला बुरा न कह सके।हालात को देखते हुए साढू चुप हो सब सुनते रहे, कुछ देर बाद वे चाय का डिमांड किए, तब जाकर छोटी बहू ने चाय बनाना शुरु किया,हाँ इतना जरुर की कि गुस्से के बावजूद भी वह सब के लिए चाय बनायी , सभी लोग साथ बैठकर चाय पिये, उसके बाद खाना भी बना और सब लोग संग बैठकर खाना खाए।
छोटी बहू एक बड़े शहर की लड़की थी उसके पिता सेंट्रल गवर्नमेंट के अन्तर्गत एक उच्च अधिकारी थे ।वह एम ए पास थी।उसके योग्य शहर में लड़का न मिलने के कारण उसका विवाह गाँव के एक सम्पन्न परिवार में पढे लिखे लड़के से कर दिया गया। जब वह ससुराल में आयी तो वहाँ का वातावरण देखकर उसके होश उड़ गए। नहा धो कर गिले कपड़े में ही खाना बनाना, जब तक खाना न बन जाय तब तक रसोईं से बाहर न निकलना, सारे कपड़े उतार कर लेट्रिन में जाना,फिर स्नान करना,यह सब उसके लिए अजीबोगरीब दुनिया थी, लेकिन उसे अपना भाग्य मानकर उसी परिवेश में वह ढलने लगी,जिसका परिणाम हुआ कि कुछ ही दिनों के पश्चात् उसे सर्दी,खाँसी, बुखार ने जकड़ लिया।ससुराल में सास ने उसे रोगी की संज्ञा दे दी ।जब यह बात छोटी बहू के पिता को पता चला तो वे उसे अपने घर ले गये,इलाज कराने पर जब वह स्वस्थ हो गयी तो पूछने पर डाक्टर ने कहा कि इसे कोई रोग नहीं है, केवल जो बेवकूफी का कार्य कि घंटो तक गीले कपड़े में खाना बनाना हो रहा है,उसी का यह परिणाम है।इतना जानकर छोटी बहू के पिता उसके ससुराल जाकर अपने समधी से बोले कि आप लोग चाहे जैसे खाना बनाइए और खाइए ,मेरी बेटी गिले कपड़े में खाना नहीं बनाएगी ।दुनिया कहाँ से कहाँ तक पहुँच गयी और आप लोग अभी रसोईं से बाहर भी न आ सके।उनका इतना कहना क्या था कि उनके समधी ने तुरंत निर्णय लिया कि आज से बहू गिले कपड़े में खाना नहीं बनायेगी, हाँलाकि समधिन नाराज हुँई लेकिन अधिकारी समधी के आगे कुछ बोल न सकीं।
बात यहीं खतम नहीं हुई, बहुत सी बातें वह अपने बाबूजी को बतायी ही नहीं।जब उसको पहली लड़की हुई तो और बहुत से राज खुलकर सामने आये।घुमा फिरा कर फिर वही बात।नहा धोकर खाना बनाना, जब तक खाना न बन जाय, तब तक बच्ची को हाथ न लगाना,चाहे भले ही बच्ची रोती रहे। कोई उसे उठाने वाला नहीं था, न जाने उसकी सास किस मिट्टी की बनी थी कि उन्हें अपनी पोती से जरा भी लगाव नहीं था,उसे छूने में भी उन्हें छूत लगता था,पता नहीं कैसे वे अपने दोनों बच्चों को पाली थी।बच्ची जब रोती थी तो छोटी बहू कुछ बोल तो नहीं पाती थी।अंदर ही अन्दर वह घुटती रहती थी , कभी कभी उसका मन करता था कि जाकर अपने सास का मुँह नोच ले। लेकिन वह एक कैदी की तरह जीवन व्यतीत कर रही थी, जहाँ अपनी बात मनवाने के लिए उसकी सास समय समय पर बातों से थर्ड डिग्री का भी प्रयोग करती थी।उसे तीन बच्चे हुए परन्तु सभी मायके में हुए।ससुराल आने पर फिर वही पुराना वाला ड्रामा शुरु हो जाता था।सभी बच्चों को उसने उच्च शिक्षा दी।चाहे बच्चों का नाम लिखाना हो,कहीं जाकर उनको परीक्षा दिलानी हो,सब छोटी बहू दौड़ धूपकर कर लेती थी।उसे चैन से सांस भी लेने की फुर्सत नहीं मिलती थी।ऊपर से सास का अलग से नखड़ा।
यह नहीं कि यह नियम केवल छोटी बहू के लिए था।बड़ी बहू, सास के रंग में रंग गयी थी लेकिन छोटी बहू के आने के बाद वह उनसे अपना पीछा छुड़ाकर अलग हो गयी।बूढी सास खुद ही चाहे कोई मौसम हो,दोनों समय घड़े में रखे पानी से नहाती थी और फिर अपने सभी भगवानों को भोग लगाने के बाद ही भोजन करती थी,उनका सारा धर्म रसोईं घर तक ही सीमित था।वह किसी शादी विवाह में भी नहीं जाती थी क्यों कि वहाँ खाना बनाने वाले पता नहीं किस जाति के होते हैं , बर्तन पता नहीं कब का कैसा धुला रहता है,जो आया वही खाने में हाथ लगा दिया।यही सोचकर वह घर पर ही रहती थी,जब छोटी बहू कहीं जाती थी तो उनके लिए रोटी गढकर जाती थी।सास का जो षट्कर्म था वह उसके लिए गले के फाँसी से कम नहीं था।जब कभी उसकी सास अपने मायके चली जाती थी तो वह खुली हवा में सास लेती थी।
वह सब कुछ सहती रही लेकिन आज खाना खाने के बाद फिर सास पर उबल पड़ी और कहने लगी कि अब इनका खाना पीना हमसे नहीं होगा,जब खाने का समय आएगा तो ये अटरिया पर चढ जाएंगी, इन्हें क्या मुझे खाना लेकर ऊपर-नीचे करनी पड़ती है। अब हमसे ऊपर-नीचे नहीं होता है।घर भी देखो, दुकान भी देखो , बच्चों की पढाई लिखाई देखो,ऊपर से इनका ताव अलग।अब जहाँ जाना हो जाँय ,जो खाना हो खाँय, केवल हम ही इनका ठीका लेकर थोड़े ही न बैठी हूँ और लोग नहीं हैं क्या ?
अभी तक तो छोटी बहू की सांस सास के आगे रुक जाती थी लेकिन आज सास की ही सांस बहू के आगे रुक गयी थी,वे बोले तो क्या बोले।छोटी बहू जो बोल रही थी,वह सच ही बोल रही थी।आखिर मामला शांत कैसे हो, बाहर से आए साढू ने बीच बचाव कर दोनों को समझाया, बुझाया फिर वे अपने घर को चल दिये,बाद में उन्हें पता चला कि सास के व्यवहार में कोई अंतर नहीं पड़ा और छोटी बहू समाज का इज्जत ढोने के लिए अपनी हार मानकर किसी तरह उन्हें ढो रही है।

अरुण कुमार आर्य
प्रधान आर्य समाज मन्दिर
पं०दीन दयाल उपाध्याय नगर,चन्दौली।

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