#Kahani by Arun Kumar Arya

मेरी अम्माँ

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मेरी अम्मा,जबकि कहना चाहिए हमारी अम्मा।केवल मैं ही तो उनकी अकेला सन्तान नहीं था और भी बहन एवं भाई थे।सबसे बड़ी उनकी विशेषता थी कि आस पड़ोस के हम लोगों से जो कुछ उम्र में बड़े थे वे सभी उनको अम्माँ कहते थे, कभी कभार अगर हमारे आफिस के लोग भी आ जाते थे तो वे भी उन्हें अम्माँ कहते थे। वे बहुत नपी तुली बात करती थी।समझने वाले  गणित के सूत्र की तरह उसको हल करते थे ,नासमझों की बात ही छोड़ दीजिए।प्रतिदिन वह और पिताजी आर्य समाज मन्दिर हवन करने जाया करते थे, जाते समय अम्माँ मेरी पत्नी से अवश्य पूछती थीं कि कौन सी सब्ज़ी ले आना है ? कुछ विशेष जो रसोईं में उपलब्ध नहीं रहता था उसको लाने के विषय में ये(मेरी पत्नी) बोल देतीं थी कि माता जी अमुक सब्ज़ी ले लीजिएगा अन्यथा कह देतीं थी कि माताजी जो समझियेगा ले लीजिएगा।लौटते समय सब्ज़ी मण्डी से कुछ सब्जियां ले आती थीं ।

आप इस बात को इतने हलके में मत लीजिए।इसमें बहुत बड़ा मनोविज्ञान छिपा है।सब्ज़ी तो आना ही है अगर वही एक सास बहू से पूछकर लाती है तो बहू यह सोचती है कि देखिए मेरी सास मुझे कितना सम्मान देती हैं।रिश्तों की प्रगाढ़ता का यह एक सूत्र है।मेरी माँ का जन्म सन् 1928 के लगभग का था।देश परतंत्र था। नारी शिक्षा का धीरे धीरे विकास हो रहा था उस जमाने में वे कक्षा 5 तक पढ़ी थीं।आज के बच्चों को सुनने में थोड़ा अटपटा सा लगेगा लेकिन वैसी परिस्थिति में मेरी माँ कक्षा 5 तक पढ़ीं थी ,मैं अपने को गर्व का अनुभव करता हूँ कि मेरी माँ कक्षा 5 तक पढ़ीं थी।

लड़कियों के माँ- बाप का सोच देश के आज़ादी के दसकों बाद तक भी यही था कि इनको बस चिट्ठी-पत्री लिखने तक आ जाए काफ़ी है।लड़कियों के नौकरी करने का सोच तो शायद उस जमाने में  किसी को था।हाँ जो लड़कियाँ कुछ पढ़ी लिखी होती थी वे रामचरित मानस, पुराण, गीता आदि धार्मिक पुस्तकों में रुचि रखती थी जिसका आजकल अभाव होता जा रहा है।मेरी अम्माँ महाभारत पढ़ने में ज्यादा रुचि लेती थीं जबकि आज भी बहुत से लोगों की मान्यता है कि इसे रखने से घर में रोज़ रोज़ महाभारत (लड़ाई -झगड़े ) होते हैं।क्षुद्र अंधविश्वासी मान्यताओं को उन्होंने अपने विवेक में कभी स्थान नहीं दिया उनका कहना था कि यदि समाज एवं राष्ट्र का सर्वोन्मुखी विकास करना है तो महाभारत सर्वोत्तम ग्रन्थ (पुस्तक) है।

हाँ यहाँ तक तो मैं अपनी अम्माँ के जीवन के कुछ प्रसंगो को रखा। हमारे परिवार में कई सदस्य थे, पड़ोस में मेरी चाची भी थी।बड़े भाई का विवाह हो चुका था।भाभी थी उनके एक दो बच्चे भी हो चुके थे। हर एक की अपनी अपनी अपने ढंग की भूमिका थी।अगर ताश के पत्तों के हिसाब से नामकरण किया जाय तो हमारी चाची लाल  ईंट की बेगम थी और चाचा लाल ईंट के बादशाह।मैंनें ऐसा इसलिए कहा कि वे अपनी ग़लत नीतियों से ऐसा व्यवहार करती थीं कि आदमी कच कच से बचने के लिए ज़मीन पर कब्जा करने को छोड़ देता था जिस पर हमारे लाल ईंट के बादशाह यानी हमारे चाचा बहुत ख़ुश होते थे और लोगों से कहते थे कि देखिए सब उसी(चाची) की ही देन है।मैं अपने अम्माँ को ताश के नहले की संज्ञा देता हूँ पिताजी को भी उनके सीधे साधे स्वभाव के कारण नहले की ही संज्ञा दे रहा हूँ।वह इसलिए कि संख्या 9(नौ) चाहे स्वयं में हो या अपने दो चार दस गुना के योग का हो 9 (नौ) ही होता है। यह संख्या इकाई की सबसे बड़ी संख्या होती है यानी मेरी अम्माँ सबसे बड़ी होते हुए भी समझौता कर लेतीं थी और मन को तसल्ली देने के लिए कह देती थीं कि क्या किसी को कुछ लेकर जाना है ?

उनकी इसी सरल प्रकृति के सब कायल थे अगर कोई नहीं थे तो बगल के वे लोग जिनकी सोच सदा स्वार्थ की थी।हाँ तो हमने ईंट के लाल बेगम की बात की थी ,बेचारी इसी सोच में रहती थी कि कैसे इन लोगों को परेशान करें कि कुछ और ज़मीन पर कब्जा कर लें,उनके इस सोच को उनके परिवार वाले अपनी आत्मा को बन्धक रखकर स्वीकार कर लेते थे। प्राय: ऐसे व्यक्ति असामाजिक होते हैं, इनका समाज इनके ही जैसे लोगों का होता है जो झूठ, साँच को ताश के पत्तों की तरह बदल देते हैं।स्वार्थ सिद्धी में ऐसे लोग परमात्मा की झूठी कसमें भी खाने में भयभीत नहीं होते हैं।हाँ तो चाची हमारी आए दिन कुछ ऐसा पैंतरा बदलती थी कि विवाद उत्पन्न हो और मेरी माताजी इससे बहुत घबराती थी।घबराने वालों को ही तो लोग परेशान करते हैं जब उनसे कोई बीस मिल जाता है तो उनकी बुद्धि कुछ दिनों तक तो संघर्ष करती है फिर असहाय होकर दूसरा मार्ग ढूँढ़ती है।

यहाँ यह बात मैंने इसलिए कहा कि चाची के व्यवहार से पानी सिर के ऊपर चढ़ चुका था हम लोग बचने का मार्ग ढूँढ़ रहे थे।ढूँढ़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी, हमारी भाभी कछारा मारकर ताल ठोंक दी, पता चला कि यह पहलवान तो उनसे बीस क्या इक्कीस है।चाची जो करती थीं भाभी उससे बढ़कर उनके सामने समस्या रख देती थीं।अब मिला था अच्छा जोड़ का तोड़।चाची का व्यवहार कुछ नर्म पड़ने लगा लेकिन वह दूसरों के माध्यम से मौका ढूँढ़ती रही।मैनें इस बात को इसलिए छेड़ा कि भाभी के इस व्यवहार पर मेरी अम्माँ चिन्तन कर एक दिन मुझसे बोली- देखो बेटा आज मुझे अच्छा लग रहा है लेकिन कल तुम्हारे भाभी का यही व्यवहार हम लोगों को झेलना होगा जो अक्षरश: सत्य निकला।इस बात को मैं और नहीं छेड़ना चाहता हूँ, यह तो घुमा फिराकर घर घर की कहानी है।बस इतना ही कहना था कि उन ग़लत मान्यताओं को कभी भी मत स्वीकारो जो समाज के लिए अहितकर हैं अन्यथा जब अपने पर पड़ेगा तो हाय करने की अपेक्षा कुछ नहीं बचेगा।

हम लोग ग़रीबी में तो पले ही थे ,पिताजी की आय कम थी  हम सब भाई बहन पढ़ने वाले थे, किसी तरह खींचकर परिवार चलता था जबकि मेरी अम्माँ ज़मींदार घर की लड़की थी और अपने माता पिता की सबसे बड़ी सन्तान थी।मैंने इस प्रसंग को इसलिए छेड़ा कि आगे जो  लिखूँगा उससे बहुत बड़ी लोगों को सीख मिलेगी।मेरे घर से कुछ दूर पर मेरी अम्माँ के चचेरे भाई रहते थे जो मेरी अम्माँ से उम्र में बड़े थे ,एक दिन वह उनके घर गयीं तो उन्होंने कहा कि देखो जो जमींदारी टूटने के बाद बाण्ड मिला था जिस पर तुम्हारा भी नाम था उस पर तुम्हारे भाइयों ने तुम्हारे नाम पर तुम्हारे भाभी का हस्ताक्षर करा कर पूरा पैसा निकाल लिया तुम चाहो तो कानूनी कार्यवाही कर उसे ले सकती हो।मेरी अम्माँ ने तुरन्त उन्हें जवाब दिया – पैसे तो ले लूँगी पर भाई कहाँ मिलेगा ?  उनके बड़े भाई उनके उत्तर से निरुत्तर हो गये।माँ और मामा लोगों में जीवन के अन्त तक प्यार बना रहा।बड़ी होने के कारण मामा लोग उनका काफ़ी सम्मान करते रहे। मेरे कुल तीन मामा थे, एक बार दुकान को लेकर छोटे और मझले मामा में विवाद उत्पन्न हुआ, बात न्यायालय तक पहुँची जब अम्माँ को पता चला तो वे तुरन्त मायके गयीं और मझले मामा से बोलीं-  क्या अब यही होगा ?

मामा- बहन तुम क्या चाहती हो ?

अम्माँ- देखो छट्टू तुमसे छोटा है ,दुकान उसी को दे दो

मामा – ठीक है (ऐसा कहकर उन्होंने वकील से मिलकर केस उठा लिया। ऐसा मेरी अम्माँ का सम्मान उनके भाई लोग करते थे।)

स्वयं विषम परिस्थितियों से संघर्ष करती रहीं फिर              भी लोगों की मदद करने को तैयार रहती थी ,वह दकियानूसी विचार धारा की प्रबल विरोधी थीं।एक बार की बात है एक तथाकथित भगवान मेरे ननिहाल में आये थे ,मेरी नानीजी,मामीजी उनके दर्शन के लिए गयीं थी,साथ में मेरी अम्माँ भी गयी।सभी लोग तथाकथित भगवान के पैर को छू रहीं थी ,जब मेरी अम्माँ की पारी आयी तो वे नमस्ते कर आगे बढ़ गयी जिस पर मेरी नानाजी ने कहा– बिटिया तुम पैर नहीं छू सकती थी।

अम्माँ – वह मेरे बेटे से भी उम्र कम था।

नानीजी- इससे क्या हुआ ? पैर छूने से क्या तुम्हारी मर्यादा कम हो जाती ?

अम्माँ– इसके लिए मेरे पति काफी हैं।

अब नानी जी इसके आगे क्या बोले, वह निरुत्तर हो गयीं।उनके जीवन की बहुत सी ऐसी घटनाएँ हैं जो प्रेरणादायक हैं।एक बार पड़ोस के एक व्यक्ति का निधन हो गया।उसका परिवार बहुत ग़रीब था।मेरी अम्माँ ने कहा कि देखो बेटा उसका परिवार बहुत ग़रीब है।कफन तो कई लोग देंगें अगर हम लोग पैसे से उसकी मदद कर दें तो अच्छा है।मैनें प्रत्युत्तर में स्वीकृति दे दी और उन्होंने वैसा ही किया।

उनके स्वभाव के सब कायल थे।घर पर दिवाली के समय रंगाई पोताई के लिए जब कभी लेबर लगते थे तो वे उन्हें प्राय: ,अचार सब्जी या दाल दे देती थीं।उनके सूखी रोटी पर उन्हें दया आती थी।कभी कभी तो ऐसा होता था कि जब कोई लेबर यदि किसी कारणवश खाना नहीं लाता था तो उसे रोटी ,अचार, प्याज आदि दे देती थीं और अपने सीधे ,सादे ,सरल स्वभाव के अनुसार कह देती थीं कि भूखा बेचारा क्या काम कर पाएगा।हम लोग खायें और वह देखे।लेबर भी उनके इस व्यवहार से घण्टे आध घण्टे अधिक देर तक कार्य करते थे।एक बुढ़िया थी प्राय: वह दोपहर में भिक्षा माँगने आ जाती थी।मेरी अम्माँ उसे बैठाकर दो रोटी खिला देती थीं ।बुढ़िया आशीर्वाद के शब्दों से उन्हें लाद देती थी और यह ज़रूर बोलती थी कि बचवा आज लड़का पतोह रहते हुए भी ई दिन देखे के पड़त हउए, कउना ना पूछे लन,सोचे लन कहिया ई बुढ़िया मर जाय कि ये से पीछा छूट जाय।

प्राय: जब कोई व्यक्ति कुछ कार्य करता है तो उसके बहुत से आलोचक हो जाते हैं।मैं प्राय: कुछ न कुछ कार्य करता रहा, मेरे कार्य के सबसे बड़े आलोचक मेरे बड़े भाई साहब हुआ करते थे। एक बार उन्हें भी कुछ करने का शौक चढ़ा ,करना तो कम गाना ज्यादा गाने लगे, उसी पर अम्माँ ने कहा जब अपने पर पड़ती है तो सूझती है और जब सूझती है तो बूझती है। अगर किसी के जीवन में कुछ समस्याएँ आ जाती थी तो  वो द्रवित हो उठती थी जब उनसे समाधान नहीं होता था तो हमें अपने पास बैठाकर वार्तालाप करती थीं और कोई न कोई समाधान का तरीक़ा अवश्य निकाल लेती थीं ।कभी कभी तो जो उनसे ईर्ष्या रखती थी /रखते थे ,उनके प्रति भी उनको दया आती थी उनके इस बात पर परिवार के कुछ सदस्य आपत्ति उठाते थे तो वे यह कहकर पल्लू छुड़ा लेतीं थी कि अपनी करनी पार उतरनी।अगर एक गन्दा हो जाये तो क्या सब उसी मार्ग का अनुशरण करें।अब उनके इस बात का क्या उत्तर दिया जाय।

वे भोर में उठती थीं और सुन्दर सुन्दर भजन गाना प्रारम्भ कर देती थीं।हम लोग समझ जाते थे कि भोर हो गया और अब हम लोगों को उठना है।हम लोग उठ जाते थे और अपने पढ़ाई में लग जाते थे लेकिन पढ़ने में ध्यान लगे तो कैसे उनकी सुरीली भजन जो ध्यान आकर्षित कर लेता था अन्त में मुझे कहना पड़ता था कि अम्माँ अब अपना भजन बन्द करो।ऐसा बच्चों को उठाने का तरीक़ा बिरले जगह मिलेगा।कभी कभी रात के समय बहुत शिक्षाप्रद कहानियाँ भी सुनाती और पिताजी ऐतिहासिक गाथाएं सुनाते थे। उन दोनों का प्रभाव आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक का काम करता है।

आर्थिक स्थिति की सुदृढ़ता के अभाव में कभी कभी वे किसी ज़मीन एवं मकान को ख़रीदने के विषय में मुझसे कहती थीं क्योंकि मैं सरकारी सर्विस में आ गया था।मेरा उनको यही उत्तर रहता था कि अम्माँ हमें अपने दायरे में ही सोचना चाहिए अगर मेरी क्षमता उसे ख़रीदने की हो तो मुझसे कहा करो, क्योंकि उन दिनों वेतन बहुत कम मिलता था।मेरी बात सुनकर वे चुप हो जाती थीं उनकी सरलता ने उनको सम्मान तो बहुत दिया लेकिन हँसकर जीने नहीं दिया।कुछ अपने तन के पैदा हुए ने उन्हें इतना परेशान किया कि वे खुलकर हँस न सकीं और एक वाक्य हमेशा कहती थीं कि एक माँ बाप दस बच्चों को पालते हैं और दस बच्चे मिलकर एक माँ बाप को नहीं पाल पाते हैं।जब मैं किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में पढ़ता हूँ या सुनता हूँ कि अमुक व्यक्ति के माँ-बाप वृद्धा आश्रम में हैं या विदेशों में हैं ।जो उनके बच्चे हैं वे कभी भी अपने माँ- बाप  को देखने तक नहीं आते हैं।यहाँ तक हमने देखा है कि दादा दादी के मरने पर वे अपनी बनावटी संवेदना तो भेज दिए परन्तु अपने माँ- बाप के दरवाज़े तक नहीं आये।इससे अच्छी तो मेरी अम्माँ थी जो कि अभावों में भी जीते हुए सम्मान पायीं और उनकी अर्थी उनके बेटों के कन्धे पर उठी और अर्थी ज्यों ज्यों श्मशान की ओर बढ़ती रही उनका वह वाक्य कानों में गूँजता रहा क्या कोई कुछ लेकर जाता है ?

 

अरुण कुमार “आर्य”

पंडित दीन दयाल नगर

मुग़ल सराय चन्दौली।

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