#Kahani By Arun Kumar Arya

आख़िर चल ही बसे

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आख़िरकार सन् 2001 का वह दिन आ ही गया जब सबेरे सबेरे मेरे कानों में यह आवाज़ आयी कि प्रधान जी इस दुनिया से चल बसे।जो बात वह हमसे कई महीनों पूर्व से कह रहे थे कि मन्त्री जी 21वीं सदी के आते आते मैं इस दुनिया से विदा हो जाऊँगा ।मैं प्रत्युत्तर में कहता था ,चुप रहिए चाचा जी, बे मतलब की बातें करते रहते हैं।बैठे बैठे आलतू फ़ालतू बातें सोचते रहते हैं और मेरा सिर खाते हैं ।मेरे इस बात पर वे खूब हँसते थे और पुन: अपनी बात को ज़ोर देते हुए कहते थे कि सही कह रहा हूँ, मज़ाक नहीं कर रहा हूँ ।मुझे क्या पता कि यह बात सच निकलेगी।क्योंकि जब व्यक्ति उम्र के एक पड़ाव  पर आता है तो प्राय: यह कहता है कि अब और जीने की इच्छा नहीं है, कुछ ही दिनों का मेहमान हूँ लेकिन जब कोई स्वस्थ व्यक्ति हँसकर कहता है तो इसको हँसी मज़ाक में ले लिया जाता है।आख़िर वे ऐसी बात बार बार क्यों कहते रहे ? निश्चित है कि इसके पीछे अवश्य कुछ रहस्य छिपा रहा होगा।वह रहस्य क्या था ? उसका विश्लेषण करने पर यही बात समझ आयी कि निश्चित ही वे हँसकर अपने भीतर के भयंकर तूफ़ान को रोकने की कोशिश करते थे।

हाँ तो मैं जिनकी बात कर रहा हूँ।वे एक लम्बे चौड़े हँसमुख प्रकृति वाले आकर्षक व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। अल्प आयु में व्यापार सम्हालने के कारण वे शिक्षा अधिक नहीं ग्रहण कर सके, जिसका मलाल उनको सदैव सताता रहा।मेरे सम्पर्क में आने के कारण उन्हें समाज में ऊँचे पद मिलने लगे।मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ कि वे मंच पर बोलने से कतराते थे और यही कहते थे कि मेरे जैसा अनपढ़ व्यक्ति क्या बोलेगा ? और मैं यही कहता था कि सामने बैठे लोगों को जब आप अपने से अधिक अनपढ़ समझेंगे तो सब कुछ बोल लेंगें।एक बार एक गोष्ठी राष्ट्रीय स्तर की थी जिनकी अध्यक्षता उनको करनी थी।गोष्ठी के पूर्व पत्रकारों की एक बैठक होनी थी।बैठक का दिन समय स्थान निश्चित हुआ और जब जाने की बारी आयी तो फैल गये, कहने लगे कि मैं नहीं जाउगाँ ,उनके प्रश्नों का मैं क्या जवाब दूँगा ? मेरे सामने असमंजस की स्थिति आ गयी कि अब मैं क्या करुँ ? मैंने बहुत ज़ोर देकर कहा कि केवल आपको वहाँ उपस्थित रहना है,सारा जवाब तो मुझे देना है, चलिए उठिए वहाँ सब आपकी इंतज़ारी करते होंगे , इतना कहना क्या था कि वे सफ़ेद लकालक चमकता हुआ खादी का कुर्ता और धोती पहनकर मेरे साथ चल दिए।मैं भी उन्हें महन्त जी के तरह कुर्सी पर बैठाकर आगे के कार्यक्रम से निपटने लगा।मज़ा तो तब आया जब उस गोष्ठी का वह दिन आ गया, जिसकी उन्हें अध्यक्षता करनी थी। वे जिद्द कर बैठे कि मैं जाऊँगा ही नहीं ,यह बात उनके नहीं मेरे प्रतिष्ठा को झँकझोरने लगा ,अब मैं करूँ तो क्या करूँ ? ऐसे समय में भगवान ही याद आते हैं।मैं भगवान को मनाने लगा कि हे भगवान इन्हें सद्बुद्धि दो।मैनें बहुत ज़ोर देकर उनसे कहा कि क्या आप मेरी बेइज्जती करने पर ही उतारु हो गये हैं ? मैं आपका अध्यक्षीय भाषण एक सप्ताह से तैयार कर रखा हूँ ,जिसे कार्यक्रम के संयोजक डाक्टर साहब भी पढ़ चुके हैं।किसी तरह मैं उन्हें तैयार किया। कार्यक्रम में देश की गौरवमयी मानी जानी हस्तियां मंच पर आसीन थी जिनके मध्य ये अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजित हुए ,बारी बारी से लोगों ने राष्ट्रधर्म के विषय में बोलना प्रारम्भ किया , कार्यक्रम के अन्त में वे मेरा लिखा हुआ अध्यक्षीय भाषण पढ़ें। ज्योंहि कार्यक्रम समाप्त हुआ मैं मंच के पास लपक कर पहुँच गया।मेरे पहुँचने पर उन्होंने कहा कि मैनें ठीक पढ़ा ? मैंने कहा ए वन।इसके बाद उन्होंने कहा कि मेरे तरफ़ से इस कार्यक्रम के लिए रुपये 1000/- की घोषणा कर दीजिए और मैनें ऐसा ही किया, वर्ष 80 के दशक में  एक हज़ार रुपये का बहुत महत्व हुआ करता था। उनके विषय में उनके ही परिवार के कुछ सदस्य कहते थे कि कैसे आप उनसे इतने रुपये खर्च करा लेते हैं।कभी वाद विवाद प्रतियोगिता में ,कभी खेल कूद, कबड्डी में, कभी सामान्य प्रतियोगिता में यहाँ तक कि समाज का एक तल तक बनवा दिये ( हालाँकि समाज का भवन ब्याज रहित लोन पर उन्होंने बनवाया था) मैं एक ही लाइन में उन लोगों को उत्तर देता था कि वो क्या चाहते हैं ? उसको पढ़कर मैं वैसी परिस्थिति उनके सामने उपस्थित कर देता हूँ, फिर क्या मन की बात अगर सामने दिखाई पड़े तो पैसे वाले दिलेरों से रुपये खर्च कराना बहुत आसान होता है, जो कि उनके साथ मैं करता हूँ।हाँ तो मैं उनके जीवन की उस तथ्य से पीछे हो गया जो मेरी समझ से उनके मौत का कारण बना।

बेचारे किसी कारणवश अधिक नहीं पढ़ पाये थे, कम पढ़ने का मलाल उन्हें सदैव सताता रहा, अब तो वे पढ़ भी नहीं सकते थे लेकिन अपने कमी को अपने बच्चों के माध्यम से पूरी करना चाहते थे इसलिए दो बच्चों को उन्होंने बहुत हीअच्छे से स्कूल में पढ़ने के लिए नाम लिखाया । देखने में व्यक्तित्व तो अच्छा था ही, टेबल टाकिंग में भी अच्छा तर्क दे लेते थे।कहीं भी जाते थे तो उन्हें देखकर ही लोग प्रभावित हो जाते थे और हँसकर जो बात करने का उनका स्वभाव था वह और ही अच्छा प्रभाव डालता था। न होने वाले कार्य भी वह अपने प्रभाव से करा लेते थे।किसी अच्छे स्कूल के सभी बच्चे तो प्रतिभाशाली बन नहीं निकलते हैं। जिज्ञासु , परिश्रमी और उच्च आकांक्षा से अच्छे लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ने वाला ही अपनी मंज़िल पाता है केवल खानापूर्ति करने वाले समय और सम्पत्ति की बरबादी करते हैं।बच्चे अच्छे स्कूल में भी उसके अनुरूप अपने को नहीं ढाल सके, एक तो एक दो सत्र पढ़ने के बाद ही लौट आया और दूसरा वहाँ कुछ वर्षों तक पढ़ा, कितना पढ़ा, क्या पढ़ा न तो उन्होंने मुझे कभी बताया और न ही मैंने कभी उनसे पूछा।क्योंकि जब मैं उनके लड़के के विषय में कोई बात छेड़ता था तो वे बातों के सिलसिला को दूसरी ओर मोड़ देते थे।समय गुजरता रहा, नित्य प्रति उनसे बातें होती रहीं।कभी कभी ऐसा भी होता था कि किसी कारणवश अगर मैं दो तीन दिन उनके पास नहीं जा पाता था तो वे मेरे घर पर चले आया करते थे या किसी को भेजकर मुझे बुलवा लेते थे और जब तक मुझसे जमकर बातें नहीं कर लेते थे तब तक उनकी इच्छा पूरी नहीं होती थी।मेरी समझ से वे बातें करके ही अपनी दबी वेदना को हलका करते थे।

जब व्यक्ति के सोच के अनुसार कार्य नहीं होता है तो उसे दुख होता है और जब उसका भावी सपना ही विखरता नज़र आवे, उस पर तुषारापात हो जाए, सारे अरमान विखर जाय ,उस समय उस पर क्या बीतती है, वह वही व्यक्ति ही जानता है।कुछ तो दूसरों से कहकर अपना मन हलका कर लेते हैं, कुछ लोग आँसू बहाकर जी लेते हैं और कुछ  ऐसे होते हैं जो अन्दर ही अन्दर घुटते रहते हैं, अपनी बात को कहनी जैसे उनके स्वाभिमान का विषय बन जाता है।वे दूसरों से अपनी बात कहना अपना उपहास समझते हैं।ऐसे ही लोग उच्च रक्तचाप, ब्रेन हैमरेज, हार्ट अटैक आदि के शिकार होते हैं। आशा का पूरा न होना एक अलग की बात है और ठीक उसके विपरीत होना जैसे भयंकर तूफ़ान ,बवंडर का तोड़- फोड़ और उत्पात् मचाने जैसा होता है ।जो हृदय को उद्वेलित और मस्तिष्क के तन्तुओं को तहस नहस करके रख देता है।यही स्थिति किसी के मौत का कारण बनती है।ऐसे लोग चटपट में इस दुनिया से विदा हो जाते हैं।ऐसे लोगों का जाना किसी को पता चलता है और किसी को नहीं।

यही स्थिति प्रधान जी जिन्हें मैं चाचा कहता था उनके साथ हुआ ,जब मैं उनके उस बेटे को जिसे बहुत दिनों से नहीं देख पाया था के विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि आजकल वह मुम्बई फिल्म इण्डस्ट्रीज में चला गया है, उसकी भोजपुरी फिल्म आने वाली है।वह फिल्म कब आयी और कब चली गयी उसका क्या नाम था आज 15 साल के ऊपर हो जाने के बावजूद भी मैं नहीं जान सका। कुछ दिनों के पश्चात् पता चला कि उसकी मँगनी होने वाली है। मँगनी हुई मुझे उस कार्यक्रम में भी जाने का अवसर मिला।लड़की देखने में सुन्दर थी ,मँगनी हुई।लेकिन उसी के पश्चात् एक ऐसे मोड़ पर वे आ गये जहाँ घनघोर अँधेरा था, चारों तरफ़ खायी ही थी निकल भागने का कोई रास्ता नहीं था।हुआ यूँ कि वही लड़का जिसके विषय में मैं चर्चा कर रहा था ,मार्केटिंग करने के लिए शहर गया और वहाँ से फ़ोन किया कि मेरा कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया है।स्वाभाविक है कि पिता को घबराहट होगी तत् क्षण बुद्धि सही ग़लत के विषय में चिन्तन न कर उसके बचाव के विषय में आवश्यक उपाय ढूँढ़ा होगा।यही उन्होंने किया पुलिस थाने में एफ आई आर दर्ज हुई ,पेपर में अपहरण के विषय में निकला।जंगल में आग की तरह बातें चारों ओर फैल गयी।लड़का अपने को बहुत सयाना समझता था।मोबाइल प्रचलन में बहुत कम था लेकिन उसके पास मोबाईल था जो उसके लिए घातक सिद्ध हुआ।कभी वह अपने को कहे कि मुझे अपहरण कर्ता अमुक शहर ले गये हैं तो कभी कहे अमुक शहर। यह सिलसिला चार पाँच रोज़ चला। पुलिस को सारी न्यूज मिलती रही उसका मोबाईल नं0 सर्विलांस पर लगा दिया गया था जिससे वह अनभिज्ञ था और तीन चार रोज़ के बाद पता चला कि उसका कोई अपहरण वपहरण नहीं हुआ था, यह सब पिता को बेवक़ूफ़ बनाने की उसकी साज़िश थी। वह उनसे कुछ रुपये ऐंठने के चक्कर में था परन्तु उसकी साज़िश सफल नहीं हुई, पुलिस द्वारा लड़के को पकड़े जाने पर जब सारा खुलासा हुआ तो इन्हें पुलिस के सामने झुकना पड़ा। दहाड़ने वाला शेर पिञ्जरे में मौन था जिसे कहीं से निकलने का मौका ही नहीं मिल रहा था।

किसी तरह उसकी शादी हुई, बहू घर आयी लेकिन अन्दरुनी परिस्थिति भी उनके मनोनुकूल नहीं हो पायी। ये वो बात  कहें तो किससे कहें ,किसी से कह नहीं पाये अन्दर ही अन्दर घुटते रहे, एक दिन बहू भी घर छोड़ कर चली गयी।एक के बाद एक घटनाएँ  तूफ़ान बनकर ऐसी आयीं कि वे  बेचारे उसके प्रवाह को झेल नहीं पाये,तूफ़ान उन्हें यमलोक उड़ा ले गया, अपनी बात बिना किसी से कहे इस जग से वे चल बसे।उनकी बेटे को आगे बढ़ाने की सारी इच्छाएँ अधूरी धूमिल रह गयी, स्वप्न यथार्थ न बन सका , जिन बच्चों के कन्धे पर वे अपने स्वप्नों की नींव खड़ा करना चाहते थे,वे उस नींव की एक ईंट भी उठा न सके ।हाँ उनके लाश को श्मशान तक जलाने के लिए अवश्य ले गये।जब चिता की लपटें उठ रहीं थी तो जैसे पता चलता था कि उनके सारे अरमान बाहर आकर कह रहे थे कि माँ बाप बेटे के भविष्य के विषय में क्या क्या सोचते हैं और बेटे हैं कि उन्हें तिनका समझकर आग लगा देते हैं, धूल समझकर उड़ा देते हैं ।वे ये नहीं समझते हैं कि मेरे माँ-बाप मेरे लिए क्या क्या कैसे कैसे जुगाड़ बनाते हैं। वे जीवन के अमूल्य समय को प्रकाशित न करने की अपेक्षा धुआँ  बनाकर अपनी तो अपनी,अपने माँ बाप के भी जिन्दगी को भी कालिमामय बना देते हैं।

 

अरुण कुमार “आर्य”

पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर

मुग़ल सराय, चन्दौली।

 

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