#Kahani By Arun Kumar Arya

पत्नी नहीं कह सके

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क्या खुशहाल था वह दिन, जिस दिन रीना दुल्हन बन पति के संग गँठबन्धन कर ससुराल आयी थी।मन में तरह तरह के लड्डू फूट रहे थे।आँखों में हसीन सपने थे।दूल्हा तो बढ़िया था ही उस पर से  राज्य सरकार के अन्तर्गत अधिकारी भी था। परिवार के लोग सीधे साधे सभ्य जन थे। खेती-बारी भी थी। अन्तर बस इतना था कि उसका पति अमन गाँव का रहने वाला था जबकि वह शहर की रहने वाली थी।परिवार कुछ दिनों तक बहुत ही अच्छे ढंग से चला। तीन बच्चे भी हुए । मायका दूर न होने के कारण प्राय: उसका मायके आना जाना लगा रहता था। जिन्दगी पटरी पर चल रही थी लेकिन जब वह अपने भाई की शादी में गयी तो एक मोड़ ऐसा आया जहाँ तूफ़ान खड़ा हो गया , रीना ने बस एक रट ही लगा ली कि अब आप मुझे लेकर अलग रहिए जो उसके पति को स्वीकार नहीं था क्योंकि अमन के भाइयों के बीच बहुत ही अच्छा तालमेल था। रीना मायके में ही रहने लगी।मायके में रहने के कारण नि:संकोच हो वह सब बातें कहती थी। उसके माँ बाप भी उसकी बात का कोई विरोध नहीं करते थे।अब अमन के सामने एक विकट समस्या आ खड़ी हुई कि अब वो क्या करे तो क्या करे।एक बेटा उसके पास था और दो बेटे उसकी पत्नी के पास।उसने उसे मनाने की बहुत कोशिश किया  लेकिन पूर्णत: असफल रहा। अड़ोस पड़ोस जाति बिरादरी के लोगों से भी उसने इस मामले को सुलझाने का बहुत प्रयास किया परन्तु सब निरर्थक सिद्ध हुआ। मायके में रहकर रीना अपने दोनों बच्चों को पढ़ाते हुए माँ बाप के साथ जीवन बिताने लगी।समय कटता गया रीना को अपने भविष्य का कोई ख़याल नहीं रहा।त्रिया हठ वह चरितार्थ कर बैठी थी।माँ-बाप,भाइयों का सहारा और समर्थन प्राप्त कर वह अपने को शेरनी समझ बैठी थी।इतना ही नहीं अमन के द्वारा यह मामला न्यायालय  तक तलाक़ को लेकर पहुँचा फिर भी वह समझौते को तैयार नहीं हुई , माँ बाप भी ऐसे थे कि अपनी लड़की को सही दिशा देने की अपेक्षा उसका मन बढ़ाते रहे। उसने अपने और बच्चों के लिए गुज़ारा भत्ता का न्यायालय से गुहार की। मान्य राशि को उसका पति अमन 5 या 6 माह का एक मुश्त रक़म गुजारे का दे देता था, वह अधिकारी था ही उसके पास रुपयों की कहाँ कोई कमी थी। कमी थी तो पत्नी की जिसको लेकर उसके सारे प्रयास असफल थे। उसकी पूरी उम्र बैठी थी, साथी के रूप में पत्नी की आवश्यकता उसे सदा खलती रही , राय देने वालों की कहाँ कोई कमी होती है। किसी ने उसे दूसरी शादी की राय दी, लेकिन सरकारी अधिकारी होने के कारण उसे हर कदम फूँक कर चलना पड़ता रहा, चतुर व्यक्ति हर समस्या का निदान ढूँढ़ ही लेते हैं ।बहुत सोच समझकर बात यहाँ तक पहुँची कि किसी ख़ास रिश्तेदार के लड़की से उसकी शादी करा दी जाय ,वह भी बहुत गुपचुप तरीक़े से किसी को भी पता न चले और ऐसा ही हुआ। अधिकारी पति को पाकर कौन पत्नी ख़ुश नहीं होगी।अब अमन का जीवन ढंग से चलने लगा।

प्रतिद्वन्दी अटकलों से बहुत सी बातों का पता लगा लेते हैं।यह बात कानों कानों  रीना के भाई  तक पहुँच ही गयी। उसने इस बात को सिद्ध करने के लिए प्रमाण ढूँढ़ना प्रारम्भ किया। लेकिन असफल रहा जो उसे कबूल नहीं था।उसने इस शादी को प्रमाणित करने के लिए दूसरे झूठे पण्डित और गवाह तक को जूटा लिया लेकिन वकील के एक ही जिरह पर वे दोनों टूट गये। लड़की पक्ष वाले एक के बाद एक मुकदमा ठोंकते रहे जिससे लड़के वाले निपटते रहे और एक दिन ऐसा आया कि तलाक़ हो ही गया।लेकिन रीना का भाई कब मानने वाला था ,उसने एक नया झूठा  मुकदमा ठोंक दिया। बात वही हुई खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे।जैसे तैसे सब मामला रफा दफ़ा हुआ।अभी तक जो कानून के निगाह में पति पत्नी थे।अब वे उस रिश्ते से मुक्त हो गये।

लेकिन अभी भी एक रिश्ता जिन्दा था वह था बाप बेटों के बीच का।बेटे बड़े हो चुके थे ,माँ बाप के बीच कटु रिश्ता होने के कारण बच्चे बाप के प्यार से वञ्चित रह गये।अपितु माँ,नानी, मामा द्वारा अपने बाप की बुराई सुनते सुनते उनकी धारणा अपने बाप के प्रति अच्छी नहीं बन सकी ,लेकिन बाप तो बाप होता है, उसे अपने बच्चों के प्रति मोह बना था, उनके भविष्य के विषय में वह प्राय: सोचता था।बच्चे माँ बाप के बीच टूटते रिश्ते, तनाव के कारण उचित शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके।आर्थिक समस्याएँ अपना विकराल रूप धारण कर उनके सामने आ खड़ी हुई ।बाप से जो कुछ बनता था वह उन बच्चों के प्रति करता ही रहा।सरकारी सेवा से सेवा निवृत्त होने के कारण अब अमन और उसके परिवार का जीवन पेंशन पर आधारित हो गया था।

दूसरी पत्नी को यह स्वीकार नहीं था कि पहली पत्नी या उसके साथ रहने वाले बच्चों से उसका पति कोई सम्बन्ध रख सके। उसके अपने बच्चे थे, वह अपने शौतन के बेटे को भी बहुत प्यार से रखती थी।सबका बोझ उसे लेकर चलना था। पति महोदय द्वन्दों के बीच जी रहे थे।उनकी हालत साँप छूछून्दर की थी।किसी तरह वे बेचारे समय समय पर अपनी पहली पत्नी रीना के बच्चों का किसी न किसी बहाने कुछ आर्थिक मदद कर ही देते रहे। दूसरी पत्नी भी असमंजस में ही जी रही थी।वह सबके सामने अधिकार पूर्वक यह भी नहीं कह सकती रही कि मैं इनकी पत्नी हूँ। उसके मन में सदा यह डर समाया रहा कि राज खुल जाने पर बखेड़ा खड़ा हो जाएगा।किसी तरह जीवन चलता रहा । सबसे अधिक दुर्गति पहली पत्नी रीना की रही।उसका बूढ़ा बाप कब का मर चुका था,माँ मरने के किनारे थी, भाइयों में बटवारे हो चुके थे । हर भाई अपने अपने परिवार की देख रेख में लग गये ऐसी परिस्थिति में यही हुआ कि धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।अब न तो बेचारी मायके में सम्मान पा रही थी और न ही सहारा ।पति के साथ तलाक तो हो ही चुका था।दोनों तरफ़ से वह मारी गयी।अब उसे एहसास होने लगा कि मायके वालों के बहकावे  में आकर उसने अपने हरे भरे वाग में आग लगा दी,उसमें शौतन के रूप में काँटा बो दी।भले ही उसकी शौतन अनामिका बन कर उस परिवार का अंग थी परन्तु थी तो।अब उसे महसूस हो रहा था कि किसी विवाहित स्त्री का घर उसका मायका नहीं उसका ससुराल होता है।सदा सदा तक साथ निभाने को पति से बढ़कर दूसरा नहीं होता है ,लेकिन बेचारी उस जुआरी की तरह हो गयी थी जो सब कुछ दाँव पर हारकर हथेलियाँ झारकर मायूस हो चल पड़ा हो। जिन्दगी क्या क्या रंग दिखाती है आज उसे समझ आने लगा कि कब कैसे अपने पराये हो जाते हैं ,आज वह प्रत्यक्ष अनुभव कर रही थी।ऐसे परिस्थिति में भगवान भी करें तो क्या करें, इसने तो स्वयं अपने पैर में कुल्हाड़ी मार ली है।

कभी कभी किसी मोड़ पर दोनों का सामना भी हो जाता था तो एक अपरिचित की तरह दोनों एक दूसरे से कट कर निकल जाते थे।लेकिन आज पार्टी में  पति महोदय अपनी दूसरी पत्नी और उसके बच्चों के साथ उपस्थित हुए थे, वहीं उसकी तलाकशुदा पत्नीरीना भी दिखाई पड़ गयी।शादी विवाह पार्टियों में लोग एक दूसरे का परिचय पूछते ही हैं, खासकर औरतें इस मामले ज्यादा रुचि लेती हैं। एक औरत ने अधिकारी महोदय अमन को रोककर उनका हालचाल पूछने लगी उनके साथ आयी उनकी दूसरी पत्नी को साथ में देखकर पूछ ही बैठी कि आपके साथ ये कौन है ? बेचारे बोले तो क्या बोले, उसका वे जवाब न देकर बच्चों से बात करने में अपने को उलझा दिए।पत्नी के साथ रहते हुए भी उसे पत्नी न कह सके। इतना ही नहीं वे अपने पूर्व पत्नी के बच्चों से  बात कर ही रहे थे कि रीना भी अपने बच्चों के पास आ धमकी दोनों की आँखें चार हुई लेकिन दोनों एक दूसरे से बात न कर सके जब वही महिला ने उनके तलाकशुदा पत्नी रीना के विषय में पूछा तो वे चुप रहे उसे भी पत्नी न कह सके। क्या विडम्बना थी कि जिसकी दो दो शादियां  हुई हो,दोनों पत्नियाँ सामने हो और उनमें से किसी को भी वह पत्नी न कह सके।

 

अरुण कुमार आर्य

मुग़ल सराय, चन्दौली।

 

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