#Kahani by Arun Kumar Arya

भगवान मिल गये

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राष्ट्र की सेवा ऐसे ही नहीं होती है उसके लिए त्याग और तपस्या की ज़रूरत होती है।दिन क्या होता है, रात क्या होती है ? गर्मी की दोपहरिया हो या जाड़े की रात , लू हो या बर्फ़ीली हवाएं , झमझमाता बरसात हो या उफ़नते सागर की लहरें, सबसे संघर्ष करना पड़ता है।संघर्ष ही जीवन है मानने वाले ही राष्ट्र के नायक बनकर उभरते हैं, उनके लिए आराम हराम होता है।चरैवैती उनकी आदत बन जाती है। हिमालय का दुर्गम क्षेत्र, रात्रि का समय, ठंड का मौसम ,बर्फ़िली हवाएं, रास्ते उबड़-खाबड़, आदेश का पालन आवश्यक। सेना की एक टुकडी को एक स्थान से दूसरी स्थान जाने का मेजर का आदेश, साथ में स्वयं मेजर का चलना।सब फटाफट।खटपट करते कदम चल पड़े दुर्गम पहाड़ियों पर।कन्धे पर रायफ़ल का बोझ, कुछ और आवश्यक सामान लिए आपस में बातें  करते हुए जवान आगे बढ़ रहे थे लेकिन सर्द हवाएं बाधक बन रहीं थीं।वह जवान क्या जो सर्द हवाओं से घबरा जाए।सब चलते रहे। कभी कभी इधर उधर झांक लेते थे कि कहीं कोई चाय की दुकान मिल जाय ताकि एक कप चाय पीकर शरीर में कुछ गर्मी आ जाए और अपने गन्तव्य स्थान को ठीक ठाक पहुँच जाय लेकिन उस निर्जन स्थान में आदमी तो दिखायी ही नहीं पड़ रहे थे तो कैसे कोई दुकान दिखायी पड़ेगा ? खैर चाह को राह मिल ही जाता है।रास्ते में एक चाय की दुकान दिखायी पड़ी लेकिन उसमें ताला बन्द, अब करें तो क्या करें, जान के लाले पड़ रहे थे। विकल्प यही था कि चाय पीनी है चाहे जैसे पीया जाय, इसका एकमात्र उपाय था किसी तरह दुकान को खोला जाय।दुकान खोलने के लिए कोई ताली तो थी नहीं,उपाय ढूँढ़ा गया कि चलो ताला तोड़कर किसी तरह चाय बनाकर एक एक चुस्की लिया जाय ताकि शरीर में कुछ गर्मी आए।ऐसा ही किया गया।सभी ने चाय बिस्कुट का आनन्द लिया, फिर कन्धे पर बैग और रायफ़ल ले आगे चलने को तैयार हुए लेकिन मेजर को यह गँवारा नहीं था कि बिना चाय बिस्कुट की क़ीमत चुकाए कैसे आगे की ओर बढ़ें ,उसने एक हज़ार का एक नोट को निकाला और चाय की केतली के नीचे उसे दबाकर अपनी टुकड़ी के साथ आगे प्रस्थान किया।

समय बीतते देर नहीं लगा ।देखते देखते तीन महीने बीत गये। फिर वही टुकड़ी वापस अपने स्थान को चल दी।वही रास्ता, वही लोग लेकिन समय दिन का था।चलते चलते फिर उसी चाय की दुकान पर सेना की टुकड़ी आ रुकी और चाय वाले बूढ़े व्यक्ति से  एक एक कप चाय लेकर पी।उसी जवानों में से किसी ने कहा बाबा यहाँ पर कैसे रह लेते हो , क्या कमाई हो जाती होगी कि परिवार चला लेते होगे ?

बाबू सब ऊपर वाला भगवान है। जैसे ले चलता है वैसे ही जिन्दगी बसर कर लेता हूँ।

तुमको भगवान पर इतना भरोसा है।

वह है तभी तो भरोसा है

वह है तुमको मालूम है

बिल्कुल है,आप उस पर भरोसा करके देखो

तुम्हें भरोसा है

भरोसा नहीं रहता तो कैसे कहता ?

क्या तुम उसे देखे हो ?

बाबू अभी कुछ दिनों की बात है आतंकवादी मेरे बेटे को उठा ले गये थे उसे बहुत मारे पिटे, उसके इलाज के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे।आतंकवादियों के डर से कोई उधार भी देने को नहीं तैयार था, भरोसे के लिए भगवान के अलावा अब कोई नहीं रह गया था । दुकान बन्द करके रुपये की तलाश में इधर उधर भटकता रहा लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ, बच्चे को अधमरा घर छोड़कर दुकान पर आया कि चलो कुछ बिक जाएगा तो बच्चे का इलाज करा लेंगे, आते ही देखा कि केतली के नीचे एक एक हज़ार का एक नोट दबा पड़ा है।मैं भगवान का शुक्रगुजार करते हुए उस रुपये को लेकर अपने बच्चे का इलाज कराया।बाबू आज वह एकदम ठीक ठाक है।अब आप ही बताओ कि कैसे कहूँ कि भगवान नहीं है ? वह किसी की नहीं सुनता है।

सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे।सब जवानों की निगाहें अपने मेजर पर जा टिकी। मेजर आँखों से इशारा किया कि इसे उस दिन के घटना के विषय में कुछ मत बताना।आज सभी जवानों को एहसास हो गया कि किसी का कुछ नाजायज़ तरीक़े से नहीं लेना चाहिए, बिना दाम चुकता किए आगे नहीं बढ़ना चाहिए।हमारी छोटी सी मदद हमें इन्सान से भगवान बना देती है।आज मेजर की आँखें बूढ़े चाय वाले की बात सुन सजल हो उठी।उसके मन में एक प्रश्न कौंधने लगा कि मान लो हमलोग चाय पीकर बिना रुपये रखे चल देते तो चोर कहे जाते , चाहते तो सभी लोग चाय पीकर  चले जाते, वहाँ था ही कौन देखने वाला ,जो हम सब को कुछ कहता लेकिन हम लोगों की आत्मा सदैव हमें चोर कहती’ जब जब वह बात याद आती, आत्मा से धिक्कार सुनने को मिलता ।बूढ़े की आत्मा सदैव हम लोगों को कोसती ,उसका लड़का इलाज दवा के अभाव में मर जाता तो बूढ़े की दुनिया उजड़ जाती, बूढ़ा अपने सामानों को देखकर हम लोगों को पता नहीं क्या क्या श्राप देता ? आज समझ आ रहा है कि किसी के साथ न्याय करने का क्या महत्व होता है। न्याय करने वाला व्यक्ति सम्मान का पात्र होता है, लोग परमात्मा को न्यायाधीश कहते हैं।उस रात चाय पीकर हमने जो उसके साथ न्याय किया आज उस न्याय ने उसके निगाह में हमें भगवान बना दिया।

(यह घटना जम्मू कश्मीर के कूपवाड़ा इलाक़े का है जिसे फेसबुक पर पढ़कर कहानी का रूप दिया)

अरुण कुमार आर्य

प्रधान, आर्य समाज मन्दिर

मुग़ल सराय,चन्दौली।

 

 

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