#Kahani by Arun Kumar Arya

रईस चाचा

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रईस चाचा के पास अपार सम्पत्ति थी। उनका अपना बड़ा सा भू भाग था। शहर के मध्य में रहने के कारण उसका बहुत महत्व था, उसमें दो दो अर्द्ध सरकारी प्रतिष्ठान थे, उसके किराए से उन्हें  अच्छी आमदनी हो जाती थी।अनेकों दुकानें थी लेकिन सब खाली पड़ी थी।क्योंकि उनका किराएदारों से कभी पटा ही नहीं।उनसे मार-पीट, गाली-गलौज, पुलिस थाना सब कुछ हुआ , ऐसा कोई करम नहीं था जो बाकी  रहा हो, उनके लड़के भी उनके ही पदचिह्नों पर चलते रहे।कुल मिलाकर उन लोगों का पास पड़ोस, रिश्तेदारों, नातेदारों किसी से कभी पटा ही नहीं।इसका कारण था कि वे लोग अपने को बहुत बड़े रईस समझते थे।रईसी अच्छी बात है लेकिन उनकी रईसी ऐसी थी कि वे अपने आगे सबको तुच्छ समझते थे।वे ये नहीं जानते थे कि और जो लोग हैं वे आपके दया पर तो नहीं जी रहे हैं।वे अपना कमा रहे हैं, खा रहे हैं फिर आपका ताव क्यों सहें ?

चाचा कुछ पढ़े लिखे अवश्य थे लेकिन अंग्रेज़ी में एक आध लाइन बोलने के बाद रुक जाते थे।अपना प्रभाव जमाने के लिए अहंकार के मद में कभी कभी किसी को इडियट, नानसेंस तक बोल जाते थे जबकि जिसे वे ऐसा कहते थे, वे लोग विशुद्ध स्थानीय भाषा में अपशब्दों को बोलकर  उनके अहंकार की खुमारी उतार देते थे, जिससे वे लोग अपना सा मुँह बनाकर दुबक जाते थे।आदत से मजबूर चाचा के साथ ऐसा अनेकों बार हुआ। बगल वाले भी इनसे ऊबकर इनकी ओर दीवार खड़ी कर दिए और इनसे बोलना चालना, निमन्त्रण सब कुछ बन्द कर दिए।

धन का तो इतना बड़ा अहंकार हो गया था कि अपने पिता के उम्र के भाइयों को भैया तक कहने में उन्हें शर्म आती थी,यही बात उनके बच्चों की भी थी।दूसरों से बात करते समय भाइयों को नाम से सम्बोधित करते थे उनके नाम के साथ भैया भी नहीं लगाते थे, शायद भैया शब्द उनके अहंकार को झँकझोरता था।उनके इसी आदत से लोग उनके पास उठते-बैठते ही नहीं थे जबकि उनके पड़ोस में रहने वाले लोगों से लोग बहुत ढंग से मिलते जुलते थे।वे बड़ों को नाम के रिश्तों का सम्बन्ध देकर बुलाते थे।यही बात उनके बच्चों में भी थी।जब उनके पास किसी कारण से कोई जाता था तो वे कुर्सी लाकर दे देते थे, यहाँ तक की चाय पानी तक पूछते थे।वे लोग सामान्य व्यक्ति थे लेकिन उनमें सामाजिकता कूट कूट कर भरी हुई थी।उनके पास कुछ देर तक बैठकर लोग वार्तालाप भी करते थे। यह बात रईस चाचा के लिए धनवानों या उच्च पदों पर रहने वालों तथा उनके चाटुकारों को छोड़कर अन्य किसी के लिए था ही नहीं।

शाम को उनकी दुकान पर चाटुकार जम कर बैठते थे और उनकी प्रशंसा के पुल बाँध देते थे जिससे वे फुलकर कुप्पा हो जाते थे।ऐसे लोगों को बैठने की जगह चाहता था और चाचा को उनसे अपनी प्रशंसा सुनने की लालसा होती थी।दोनों का तालमेल बहुत अच्छा था लेकिन अहंकारी व्यक्ति को कब तक कोई ढोएगा।एक एक कर एक दिन वे सब भी इनसे जुदा हो गये। बाप बेटे अपने में बात कर अपने को तसल्ली दे लेते थे।चाची सीधी सादी थी।वे सम्बन्धों को कुछ जीना चाहती थीं लेकिन चाचा के व्यवहार के कारण उनका यह व्यवहार भी शिथिल होता चला गया। ये लोग अपने को इतना बड़ा समझते थे कि विशेष अवसरों पर धनवानों को तो निमंत्रण देते थे लेकिन पैसे से कमज़ोर अपने खास रिश्तेदारों, नातेदारों को नहीं। उनके इस व्यवहार  से वे लोग भी उनको नहीं पूछते थे अगर पूछते भी थे तो मात्र औपचारिकता निभाने के लिए।जिसे वे लोग अपनी रईसी समझते थे, अन्य लोग उसे उनका दुर्भाग्य मानते थे।बड़ी लड़की थी जिसकी शादी हो चुकी थी। वह अपने बाल बच्चों ,परिवार के साथ अपने ससुराल में रहती थी। बड़े लड़के की शादी सम्पन्न परिवार में किए, बहू आयी, कुछ दिन तक सब कुछ ठीक ठाक चला लेकिन अपने आदत से मजबूर वे लोग उस पर भी अपनी रईसी की धौंस जमाने लगे ,उन लोगों के इस व्यवहार से ऊबकर बहू जो एक बार मायके गयी फिर अपने ससुराल की ओर झाँककर भी नहीं देखी। चाची भी अस्वस्थता के कारण एक दिन इस संसार से विदा हो गयीं। घर में बचे तीन लोग। नौकरानी के भरोसे घर की साफ़ सफ़ाई हो जाती थी और भोजन मिल जाता था।इसी परिस्थिति में ये रईस लोग जीते थे।उनका छोटा लड़का तो और तेज था उसकी पूरी दुनिया घर से दुकान और दुकान से घर था। समाज क्या होता है ? समाज में लोगों से कैसे मिला जुला जाता है जैसे उसे इसका ज्ञान ही नहीं था।हालाँकि उसकी भी  शादी उनके पड़ोसी ने सारा हालात जानते हुए भी अपने रिश्ते में कराया।शादी बड़ी धूमधाम से हुई।कुछ दिन यह भी बहू रही, एक दिन वह भी इन लोगों के रईसी स्वभाव से ऊबकर अपने मायके में जा बैठी। एक बार तो उसकी हालत बहुत ख़राब हो गयी परन्तु रईस महोदय के परिवार से कोई व्यक्ति उसके पास तक नहीं गया। यह बात जो सुनता वही थू थू करता लेकिन उन लोगों के ऊपर कोई प्रभाव नहीं।सबके सब चिकने घड़े थे।बाप बेटे सभी एक ही मिट्टी के पुतले थे।मानवता जैसे रईसी के पैरों तले दबकर आहें भर रही थी।

उनकी रईसी को देखकर अन्य लोग उनके पीछे उनकी खूब हँसी उड़ाते थे।बेटों को तो इतना तक तमीज़ नहीं था कि वे किसी के उम्र, पद, रिश्ते का ख़याल कर उनका अभिवादन कर सके, उनको बैठा सकें।इसमें रईस चाचा का ही दोष था कि वे अपने बच्चों को समाज के अन्य लोगों से मिलने जुलने ही नहीं दिए, जिसके कारण उनके पास सामाजिकता के गुण का विकास हो ही न सका।एक बड़ी विचित्र बात इन लोगों के पास और थी कि ये लोग अपने को बड़ा सिद्ध करने के चक्कर में दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ते थे, यदि किसी व्यक्ति की कमियाँ पेपर में छपती थी तो उसकी कटिंग तक ये लोग रख लेते थे।उनकी रईसी केवल धन दौलत को देखकर उसका बखान करने तक ही सीमित था जहाँ खर्च करने या चन्दे देने की बात आती थी उनकी रईसी के परखचे उड़ जाते थे।बेचारे असहाय से प्रतीत होते थे।

रईस चाचा के जिन्दगी की भी विचित्र कहानी थी।दुर्भाग्य उनका था कि उनके माँ -बाप उनके बचपन में ही गुज़र गये थे।उनका लालन पालन उनके ननिहाल में हुआ था।वहाँ कुछ शिक्षा प्राप्त कर शहर पढ़ने चले आए। किसी तरह वे अपनी शिक्षा को कुछ आगे तक बढ़ाए।फिर लग गये अपने पिता द्वारा शहर में छोड़ी गयी सम्पत्ति के चक्कर में। कुछ दबंग लोगों का साथ मिल जाने के कारण पुराने किरायेदारों से किसी तरह मकान को खाली कराए जिसे बाद में उन्होंने लोगों से नजराना लेकर बनवाया, जब दुकानदारों का दुकान चल निकला तो रोज़ उन्हें परेशान करना प्रारम्भ कर दिए  ताकि दूसरे किरायेदारों से अच्छी नजराना और किराया मिल सके, इसके लिए वे उनके साथ कोई कर्म नहीं छोड़े, पुलिस थाने और कचहरी तक की भी खूब दौड़ लगाए।चाचा चतुर तो थे ही अपना प्रभाव दिखाने के लिए कुछ लोगों को अपने पक्ष में करके किसी संस्था में ऊँचे पद पर विराजमान हो जाते थे फिर अपनी रईसी के रौब के कारण उनका छियालेदर शुरू हो जाता था,लोगों से गाली गलौज तक की भी नौबत आ जाती थी। बाद में इनके आदत  के चलते इन्हें लोग संस्था में रखते ही नहीं थे।बाप के पद का बच्चे खूब उपयोग करते थे , जब संस्था के सदस्य किसी कारणवश उनके पास जाते थे तो बच्चे अपने बाप से मिलाने को कौन कहे ,उन लोगों से खुद अपने ही निपट लेते थे, बहसी बहसा कर लेते थे,उनके पास जाने वाले भी उन लोगों के व्यवहार से अन्यों को भी परिचित करा देते थे , लोगों की गाली सुनने के वे सब लोग अभ्यस्त हो चुके थे।समाज में रहने वालों को समाज का लज्जा और भय होता है लेकिन इससे वे लोग अपने को मुक्त कर चुके थे।जिनकी जिन्दगी घर से दुकान और दुकान से घर हो, उन्हें क्या फर्क पड़ता है ?

बाप बेटों की जिन्दगी में उनको छोड़कर कोई था ही नहीं।जैसे बड़े लोगों की सुरक्षा करने वाले कहते हैं कि कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता उसी तरह इनके घर पर कोई पैर ही नहीं रखता था। ये लोग ऐसा चाहते भी थे कि मेरे घर पर कोई न आवे और कोई इनके व्यवहार के कारण इनके पास लोग जाना भी नहीं चाहते थे।रईसी के कारण जिन्दगी बहुत संकुचित हो गई थी। एक बार चाचा का भीषण एक्सीडेण्ट हो गया था, जान किसी तरह बच गयी, कभी कभार भूले भटके कोई उन्हें देखने पहुँच गया तो वह बेचारा सहानुभूति क्या दिखाए , उनके लड़कों से उस परिस्थिति में भी डिंगे हाँकने वाली बात को सुनना पड़ता था।क्या चाचा की जिन्दगी थी कि मौत सामने खड़ी थी फिर भी किसी से रईसी का गुमान नहीं गया।परिस्थितियों को देखने पर ऐसा लग रहा था कि एक दिन इसी रईसी के बोझ तले इनका दौलत इनका गला दबाकर लावारिस हो जाएगा और लोगों को एक रईस का कहानी सुनाने को छोड़ जाएगा।

 

अरुण कुमार “आर्य ”

मुग़ल सराय,चन्दौली।

 

 

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