#Kahani by Arun Kumar Arya

परायी बेटी

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और इतनी बात पर वह आग बबूला हो गयी।उसके पति ने उसे बहुत समझाने का प्रयास किया लेकिन सब बेकार था।पति महोदय ने भी सोच लिया कि इस समय इससे बातें नहीं करूँगा , जब इसका गुस्सा शान्त हो जाएगा तब ही इससे बातें करूँगा। जहाँ उसके पति मौजूद रहते हैं वहाँ पर वह और ही अपना रौद्र रूप दिखाती है।लेकिन आज का गुस्सा होना उसका स्वाभाविक था, क्योंकि वह माँ थी जिसने लड़की को जन्म दिया था,उसे पाली-पोषी थी,उसके पूरे पढ़ाई लिखाई की समुचित व्यवस्था की थी।उसके हर माँग को यथा सम्भव पूरा करती थी। उसके विवाह में लेन देन, खाने पीने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आस पड़ोस रिश्ते नाते के लोग भी व्यवस्था से बहुत ख़ुश थे।शादी, विवाह ठीक ठाक  से बीत गयी। बेटी भी ससुराल चली गयी। पहली बार ससुराल से आयी तो सब कुछ ठीक ठाक था लेकिन जब दूसरी बार आयी तो उसके चेहरे पर उदासी थी,उसके  हँसते हुए चेहरे पर मायूसी थी। कितनों कोई छिपाए चेहरा पूरा राज खोल ही देता है। पढ़ी लिखी लड़कियों का यह दोष होता है कि वह पूरी बातें बताती ही नहीं हैं ताकि उसके माँ बाप परेशान न हो, मौन हो सब सहती रहती हैं लेकिन माँ बाप कहाँ कम होते हैं, वे भी बेटी के हाव भाव और बात करने के अन्दाज से उसे पढ़ ही लेते हैं, और उससे ऐसा ऐसा प्रश्न करते हैं कि वह टूट जाती है और रो रो कर अपना सारा दुखड़ा कह सुनाती है।

 

माँ बाप इस नाज़ुक रिश्ते पर पहले तो गम्भीर चिन्तन करते हैं कि इसका समाधान कैसे ढूँढ़ा जाय ,कैसे बेटी को नर्क से मुक्ति दिलायी जाय।इसके लिए पहले वे मध्यस्थ को ढूँढ़ते हैं, रिश्ते नातेदारों से बात करते हैं ,जब हर जगह से हार जाते हैं तो कानूनी कार्यवाही करने का फ़ैसला लेते हैं, लेकिन कानूनी कार्यवाही करने के पूर्व चतुर माँ बाप हज़ार बार सोचते हैं और मूर्ख तुरन्त निर्णय ले लेते हैं, बिना सोचे समझे निर्णय लेने से बेटी की जिन्दगी बर्बाद हो जाती है , आगे चलकर वह कहीं की नहीं रहती है ।यहाँ वही कहावत सिद्ध होती है कि धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का। परायी घर से आयी बेटी जो आज इस घर की बहू थी उस पर  केवल सास की ही नहीं क्रूर दृष्टि थी , ससुर, देवर, ननद सभी एक ही रंग में रँगे थे।बस वह पति के प्यार, अपनत्व, सहानुभूति के सहारे ससुराल में पड़ी थी, सब कुछ सहती रही।एक दिन ऐसा भीआया ,जब उसका ससुर नीचता की सारी हदें पार कर उसे गन्दी गन्दी गाली तक देने लगा , यहाँ तक बोल उठा कि मारो साली को नंगे कर, किसी ने उसके पति को फ़ोन किया कि तुम्हारे घर में तुम्हारी पत्नी के साथ बुरा हाल हो रहा है।वह बेचारा अपने नौकरी से भागा भागा आया और अपनी पत्नी को उसके मायके पहुँचा दिया।

अध्ययन करने पर यह पाया गया  कि इन सबके मूल में लड़के की कमाई थी ।कारण कि पहले जो वह कमाता था, अपनी  माँ को दे देता था । शादी के बाद पता चला कि उसके बाप पर बहुत कर्ज है। कर्ज क्यों है ? पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि माँ बाप का खर्च अनाप शनाप था। बहुत सी अनावश्यक वस्तुएँ केवल रईसी दिखाने के लिए ले ली जाती रहीं ,शादी में भी इसी रईसी के कारण अनावश्यक रुपये खर्च किए गये और बहू को गहने चढ़ाने के लिए आर्टीफिसियल गहनों का प्रयोग तक किया गया। भीड़ भाड़ में लड़की वाले उन गहनों पर ध्यान ही नहीं दिए वर्ना शादी के दिन ही विवाद उत्पन्न हो जाता।हर व्यक्ति अपनी अपनी सोच का पुतला होता है।देखिए ससुर महोदय ने अपनी बेटी की शादी की, उनकी लड़की ससुराल जाते ही अलग होने का स्वाँग रचने लगी। उसका साथ उसके माँ बाप भी दिए।पहली ही बार जब उनकी लड़की मायके आयी तो फिर ससुराल जाने का नाम ही नहीं ली।कोर्ट कचहरी कुल हुआ। मारपीट तक की नौबत तक आ गयी।अन्त में तलाक़ हो ही गया, फिर उसकी दूसरी शादी हुई वहाँ जाकर उसने फिर वही खेल रचा कि जो ससुराल का ज़मीन जायदाद है, उस पर उसका भी नाम चढ़ाया जाय, अरे अभी जुमा जुमा एक सप्ताह भी नहीं हुआ, कैसे लड़के वाले नयी बहू के नाम जमीन, जायदाद कर दे। इस बार भी लड़की के माँ बाप ने लड़की का खुलकर साथ दिया , परिणाम जीरो निकला। लड़की फिर आकर मायके में  बैठ गयी।वहाँ  के सारे चढ़ाए गहने उनकी लड़की साथ ले आयी। ऐसे सोच के माँ ,बाप, बेटे, बेटी जहाँ हो, वहाँ पर पराए घर से आयी बेटी का क्या होगा ?

एक बात और थी, उनकी बहू उस पूरे खानदान में सबसे अधिक पढ़ी लिखी थी, उनके सभी लड़की लड़कों से भी अधिक। इस बात का उन्हें गर्व न होकर उससे ईर्ष्या होने लगी थी।उसके आगे की पढ़ाई में उसके  मार्गं में बहुत रोड़े अटकाए गये लेकिन उनकी बहू अपने शिक्षा के लक्ष्य को पूर्ण करके ही दम ली।सास ससुर के व्यवहार से बहू तो परेशान थी ही उनका बेटा भी रोज़ रोज़ के किचकिच से अलग होकर किराए पर मकान लेकर अपने माँ बाप से अलग हो गया और बडे ख़ुशी से जीवन व्यतीत करने लगा। अच्छे संस्कारों में पली बढ़ी उनकी बहू आज भी अपने सास ससुर का आर्थिक मदद करती रहती है लेकिन पुन: उनके साथ रहने में उसकी रुह काँपती है।बेचारी सास अब खुद अपने पति और  बच्चों के लिए खाना बनाती है जिसमें उनकी अपनी बेटी योगदान देती ही नहीं है, जब अधिक कार्य करने से वह ऊब जाती हैं तो उन्हें बहू की याद आती है। समय रहते नहीं सोच पायीं तो अब क्या होगा जब चिड़ियाँ चुँग गयी खेत।

 

अरुण कुमार आर्य

मुग़ल सराय, चन्दौली।

 

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