#Kahani by Arun Kumar Arya

बाबू जी डिप्रेशन में

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बाबू जी रिटायर हो चुके थे लेकिन उनके शान शौकत में कोई कमी नहीं आयी थी।शाम को वे फिटफाट होकर घूमने निकल जैसा करते थे।क्लीन दाढी मूँछ ,बालों में ढंग की की गयी कंघी, जूते में चमाचम पालिश , कपड़े में कहीं कोई सिकन नहीं ,ऐसा लगता था कि साहब कार्यालय जा रहे हैं। चाल में जवानों जैसा दम खम, बोली में वही रुतबा,मालूम ही नहीं पड़ता था कि बाबू जी रिटायर हो चुके हैं।

 

बाबू जी को दो बेटियाँ और दो बेटे थे।वे दोनों बेटियों की शादी कर चुके थे।दोनों अपने अपने ससुराल में सुखी और खुश थीं।बाबू जी केन्द्रीय सरकार के अंतर्गत अधिकारी पद से रिटायर हो चुके थे , वे लड़कियों की शादी करते समय बहुत छानबीन किए थे लेकिन जब लड़के की शादी करने के लिए लड़की देखे तो उसकी सुन्दरता पर मंत्र मुग्ध हो गये।न किसी से कुछ पूछना न जाँचना, तुरन्त शादी करने के लिए स्वीकृति दे दिए।देते क्यों नहीं ? उनके लड़के की अपेक्षा लड़की बहुत ही सुन्दर,पढी-लिखी थी। विवाह ठीक ढंग से सम्पन्न हो गया।बहू घर में आयी,उसे जो भी देखता उसके सुन्दरता की बड़ाई करता, जिसे बाबू जी सुन कर गदगद हो जाते थे।

 

बहू सुन्दर पढी-लिखी थी लेकिन उनका लड़का जिसे हम अगर बदसूरत नहीं कह सकते थे तो उसे खूबसूरत कहने का प्रश्न ही नहीं उठता।उसमें सारे ऐब थे।जुआ खेलना , सिगरेट और शराब पीना,गाली देना, घर से पैसे चुराना उसकी जिन्दगी बन चुकी थी। बाबू जी ने उसे दुकान कराया , कुछ ही दिनों में कुल पूँजी चाट पोछ कर उसने बराबर कर दिया। छोटे लड़के की भी उन्होंने शादी कर दी, दूसरी बहू भी सुन्दर और काफी पढी-लिखी थी।वे छोटे लड़के को भी अच्छी खासी दुकान करा दिए, दुकान चल निकली लेकिन उसे चटपट करोड़  पति बनने की लालसा ने बर्बाद कर दिया, उस पर बहुत कर्ज हो गया जिस की भरपाई मजबूरन बाबू जी को करनी पड़ी, उसकी भी दुकान बन्द हो गई।छोटे लड़के में भी बड़े लड़के वाले सारे अवगुण आ गये। यह उससे भी बड़ा शातिर निकला। बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ  शुभान अल्ला।बड़ी बहू को एक लड़की भी हो गयी ।घर के खर्च का बोझ बढने लगा, अब घर में दिन ब दिन कलह प्रारम्भ होने लगा।

 

बड़ी बहू तंग आकर घर के बाहर कदम रख दी उसे एक फाइनेंस कम्पनी में नौकरी मिल गयी ,उसके परिचय का दायरा बढने लगा,उससे मिलने के लिए लोग घर पर आने लगे ,जो बाबू जी को नागवार लगता था। हद तो तब हो गयी जब बहू घर आने में काफी देर करने लगी। कभी कभी वह किसी दूसरे सहकर्मी के साथ अन्य शहर को चली जाती और दूसरे दिन आती थी,यह बाबू जी को कहाँ बरदास्त होने वाला था। उनका बड़ा लड़का अपनी पत्नी को कुछ नहीं बोलता था बल्कि उसके समर्थन में वह बाबू जी को भला बुरा कह देता था क्योंकि उसे खाने पीने, जुआ खेलने को पत्नी से पैसे मिल जाते थे ।छोटा लड़का तो लोगों से कर्ज लेकर जुआ खेलने लगा।बाबूजी के मान सम्मान को बच्चों ने बेच दिया।बड़ी बहू और बेटों के व्यवहार से वे बहुत टूट चुके थे।बड़ी बहू को वह फूटी आँख भी नहीं देखना चाहते थे ,उसे घर से निकालने का दबाव बनाने लगे।बड़ी बहू घर छोड़ने को तैयार भी हो गयी परन्तु कुछ उसके शुभ चिन्तक उसे ऐसा न करने की सलाह दिए और पुलिस,थाने से मिलकर बाबू जी पर इलजाम लगा दिए कि वे अपनी बहू पर बुरी नजर रखते हैं।वह बाबू जी को थाने बुलायी और उन्हें जेल में बन्द करने की योजना बना डाली परन्तु उनके उम्र को देखते हुए उन्हें जमानत पर छोड़ दी।बाबू जी कभी स्वप्न में भी नहीं सोचे थे कि उनकी बेटियों से उम्र में काफी छोटी उनकी बहू उन पर ऐसा घिनौना इलजाम लगाएगी।वे बहुत टूट गए ,रह रह कर रोने लगते थे,जान देने तक की बात कह देते थे और दिन रात इसी विषय पर सोचते सोचते  डिप्रेशन में चले गए।

 

बाबू जी ,जिनका प्रारम्भिक जीवन काफी संघर्षों में बीता था।माँ की छाया बचपन में ही उठ गयी थी ।पिता का प्यार भी उन्हें नहीं मिला, बहुत परिश्रम कर बड़ी भाभी की प्रेरणा से उच्च शिक्षा प्राप्त किए। रिजल्ट अच्छा होने के कारण नौकरी जल्दी ही मिल गयी।शादी हुई, बच्चे हुए , उनकी पढायी लिखायी में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।अगल बगल,मुहल्ले, रिश्ते-नाते में उनका काफी सम्मान था। बहुत ढंग से जीवन चलता रहा लेकिन उनके बेटे और बहू ने उनका जीवन नरक बना दिया।डिप्रेशन के बा़द वही बाबू जी बात बात में लोगों से उलझ जाते थे, रिश्ते नातेदारों के यहाँ जा जा कर उन्हें जो मन में आता था ,बक जाते थे।धीरे धीरे सबसे सम्बन्ध बिगाड़ लिए। इनके यहाँ लोगों का आना जाना भी कम हो गया,उनकी पत्नी जिसे वह बहुत मानते थे उनको मारने के लिए भी प्राय: उठ जाते थे।अगर प्यार से बातें करते थे तो अपने बेटी और दमाद से, लेकिन वे थोड़े समय के लिए आते थे फिर ट्रेन पकड़े और अपने घर को रवाना हो जाते थे , हाँ बड़े दमाद से यह जरुर कहते रहे कि तुम मुझे भी गाड़ी से ले चलो और जब जमुना नदी से गाड़ी पास होगी  मुझे ट्रेन से ढकेल देना,इसी तरह की वे लोगों से अनाप सनाप अटपटांग बातें करते थे।

 

बाबू जी को डिप्रेशन से उबरने को कौन कहे, बड़े लड़के की असमय में मौत और छोटे लड़के का जुए के कारण घर के गहनों तक को बेच देना ,बड़ी बहू की भी मौत तथा मकान के एक तिहाई हिस्से के बिक जाने से उनका दिमागी संतुलन दिन पर दिन बिगड़ता ही चला गया। वे लोगों से मौत के विषय में पूछते थे,कहते थे कोई मुझे जहर लाकर दे दे, कभी कभी दरवाजा बंद कर के घंटों घर में अकेले पड़े रहते थे।आखिर वह दिन आ ही गया जिस दिन की बाबू जी को प्रतिक्षा थी,उन्हे अपना बर्थ डे याद रहा, उस दिन उन्होंने छोले, बटूरे ,हलुआ अच्छे अच्छे पकवान बनवाये थे, छोटी बहू हलुआ लाकर दी, उसे बड़े प्रेम से खाये और जब उनकी प्रिय चीज छोले बटूरे वह लेकर  आयी तो देखी बाबूजी एक तरफ सदा सदा के लिए लुढक गये।अंत समय में जैसे उनकी खुशियाँ रुठ गयी थी वैसे ही छोले बटूरे भी उनका साथ नहीं दे सका, उनके ओठों तक नहीं पहुँच सका ,जैसे लगा कि वह भी लोगों का देखकर उनसे रुठ गया हो।यह कहावत बाबूजी पर सच ही निकला कि बुरे समय में सब साथ छोड़ देते हैं।

 

अरुण कुमार आर्य

प्रधान,आर्य समाज मन्दिर

दीन दयाल उपाध्याय नगर

चन्दौली।

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