#Kahani by Arun Kumar Arya

बहू का दर्द
****
आखिरकार उसे अपनी अटैची और झोला समेटकर ससुराल के दहलीज को अलविदा कहनी ही पड़ी।ससुराल वाले काफी सम्पन्न थे, किसी चीज की कहीं कोई कमी नहीं थी ,कमी थी तो शौचालय की।वे लोग देहात में रहते थे,जहाँ शौच के लिए लोग खुले में जाते थे जो शहर के बहू के लिए पहाड़ उठाने जैसा था, बिजली की आपूर्ति भी ठीक नहीं थी।काम के नाम पर खाना बना खा कर दिन भर घर में अकेले पड़े रहना था।अकेले पड़े रहना उसकी नियति बन गयी थी। पति,देवर और ससुर दिन भर दुकान पर रहते थे और सास का काम दरवाजे पर बैठकर लोगों से बहू की शिकायत करना था, जब कभी उससे उन्हें फुर्सत मिलती थी तो वह घर में जाकर बहू को खरी-खोटी सुना आती थी । सास क्या आफत की पुड़िया थी।उनके गुस्से के आगे घर में किसी व्यक्ति का कोई वश नहीं चलता था।बात बात में बहू में नुक्श निकालना उसका स्वभाव बन गया था।लेकिन बहू थी कि एक चुप तो हजार चुप। उसकी यही चुप्पी सास के गुस्से को और बढा देती थी। वह चाहती थी कि बहू कुछ बोले तो उसे जली -भुनी, खरी-खोटी सुनायें,लेकिन बहू बोले तो क्या बोले ? किसके ताकत पर बोले ? उसका पति भी तो उसका रहते हुए भी उसका अपना नहीं था।सास जब सब षट्कर्म करके हार गयी, उन्हें कुछ बोलने को नहीं रहा तो बहू को पागल है ही कहना शुरु कर दी।बेटा भी अपनी माँ के डर के कारण अपनी पत्नी से बात तक नहीं करता था।कुल मिलाकर सास यह मान बैठी थी कि बहू को इतना परेशान करो कि वह खुद यहाँ से भाग चले।अपने यहाँ से उसे हटाने की वह पूरी योजना बना रखी थी।
जब यह बात लड़की के पिता को पता चला तो वे बेटी के ससुराल पहुँचे।अगल बगल के लोगों को बुलाया गया।लड़की को लोगों के बीच में बुलाकर जब उससे उसकी समस्याएं पूछी गयी तो उसने सबसे पहले शौचालय की समस्या और उससे होने वाले कष्टों की चर्चा की,फिर उसने सास की ओर इंगित करके कहा कि ये दिन भर मेरे पीछे पड़ी रहती हैं ।मैं इनके इतना बोलने पर भी इनका कोई जबाब नहीं देती हूँ तो अब कहना शुरु कर दी कि मैं पागल हूँ और जबाब देती तो कहती कि लड़ाकिन है,इनके यहाँ किसी विधि से मेरी खैर नहीं है।मैं घर का सारा काम काज करती हूँ, कोई मेरा हाथ भी नहीं बटाता है।इनसे पूछिए कि क्या कभी मुझसे खराब खाना बना है ? क्या मेरे खाना बनाने में इन्हें कभी कोई कमी नजर आयी है ? क्या ये मेरे हाथ से बनाये हुए खाने को नहीं खाती हैं ?साफ सफाई के मामले में चलिए आप लोग देख लीजिए कि घर के साफ सफाई में कोई कमी है ? न जाने मेरे में क्या कमी है कि जब इनके मन में जो आया खरी खोटी सुना देती हैं।इनके कहे का जवाब न देना मेरी पागलपंती है।मेरा पति इनके कारण ही अब मुझसे कटा कटा रहता है।आप लोग मुझसे कुछ पूछकर देखिए कि क्या मैं पागल हूँ ? मैं पागल नहीं हूँ। हाँ इतना जरुर है कि किसी दूसरे घर की लड़की यहाँ आकर कुछ दिन में अवश्य पागल हो जाएगी, बहुत समझाने बुझाने पर कुछ दिन तक माहौल शान्त रहा लेकिन समय के साथ फिजाँ में फिर वही रंग घुलने लगा।

बेटी के हालात को जानकर फिर एक दिन लड़की के बाप दल बल के साथ उसके ससुराल पहुँचे।घर से चलते समय लड़की के भाई ने अपने संग चलने वालों से कहा कि देखिए आप लोग वहाँ नाश्ता ,खाना पीना मत कीजिएगा,मैं घर से सारी व्यवस्था करके चल रहा हूँ।सब लोग पहले वहाँ लड़के के दुकान पर पहुँचे, पहुँचते ही नाश्ता-पानी आया।सुन्दर सुन्दर मिठाइयाँ सामने देखकर उनमें से कितने के मुख में पानी आने लगी।लड़के के पिता जी द्वारा एक बार नाश्ता करने के लिए कहने पर सब प्लेट की ओर हाथ बढा ही दिए।वे भूल गये कि उन्हें वहाँ नाश्ता पानी और खाना खाने को मना किया गया है।लड़की के भाई को छोड़कर सबने नाश्ता किया, फिर दुकान से उठकर सभी लोग घर पर गए,वहाँ भी सब ने जमकर भर पेट भोजन किया, अगर किसी ने कुछ नहीं खाया तो मात्र लड़की का भाई।खाना खाने के बाद आगे के बड़े कमरे में बैठकर लड़की की समस्या को लेकर बातें शुरु हुई।वहाँ लड़की के पति को छोड़कर करीब करीब सभी लोग उपस्थित थे। बहुत ढूँढने पर भी पति महोदय का कुछ कहीं अता पता नहीं चला।
पता कैसे चलता ? वह तो माँ का आदेश मान कर कहीं छिप गया था। उसकी बागडोर माँ ने खुद थाम रखी थी।आगे का पूरा कमरा और आँगन अगल बगल के लोगों तथा परिवार के सदस्यों से भरा था।वार्ता धीरे धीरे परवान चढने लगी। लड़की रो रोकर अपनी दुखड़ा सुनाने लगी।वहाँ उपस्थित सभी लोग उसकी बात सुनकर द्रवित हो उठे परन्तु उसके सास पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। लगता था ईश्वर ने उसके दिल को पत्थर का बनाया था।वह अडिग थी तो अडिग।ससुर बेचारे बोले तो क्या बोले ? अपनी पत्नी के आगे उनकी कुछ नहीं चलती थी।सारा कमान उनकी पत्नी ने ही सम्भाल रखी थी।पत्नी ऐसी थी कि उसे घर ,परिवार,समाज,गाँव देश, मान-मर्यादा,इज्जत-बेइज्जत की कोई फिक्र ही नहीं थी।जब वह यह कही कि मैं बहू के लिए किसी चीज की कमी तो नहीं रखती हूँ ? खाना- पीना, कपड़ा-लत्ता सभी चीजों से इसे भरी रखती हूँ।उसकी इतनी बात सुनते ही लड़की का भाई उन पर जी जान से बिगड़ गया,बोला कि आप भी चलो और एक दो को अपने संग भी ले चलो।सभी को अपने घर बैठाकर खाना खिलाऊँगा, कपड़े लत्ते की कोई कमी नहीं रखूँगा। फिर उसने वहाँ उपस्थित औरतों की ओर इशारा करके कहा- माता जी, बहन जी आप लोगों की भी बहन,बेटी, ननद होंगी , जिसे आप लोग अट्ठारह बीस साल तक पाली पोषी होंगी।विवाह के बाद जब वह ससुराल गयी होंगी,तो वहाँ अपने पति का प्यार पाकर जैसे यहाँ की सब कुछ भूल गयी होंगी और यहाँ इनकी देखिए कि ये अपने बेटे को बहू से मिलने ही नहीं देती है,उसे अपने पास सुलाती है।जब अपने पास ही बेटे को सुलानी थी तो फिर उसकी शादी क्यों की ?
अभी बात चल ही रही थी कि लड़की ने भरी सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि एक सास होती है कि अपने लड़के बहू को हँसता बोलता देखकर खुश होती हैं और एक मेरी सास हैं कि मुझे अपने पति से मिलने ही नहीं देती हैं, जब वे खाना खाने आते हैं तो अपने खाना लेकर उनके पास पहुँच जाती हैं।खाना,पीना, सोना हर समय उनके पीछे लगी रहती हैं, मैं उनकी छाया तक नहीं देख पाती हूँ। न जाने मेरे किस जन्म के अपराध का ये मुझसे बदला ले रहीं हैं। इनके पास नारी हृदय है ही नहीं ? ये अपना समय भूल गयीं हैं? जब इनके ऊपर या इनके बेटियों पर मेरे जैसी बीती होती तो इन्हें एक नारी का दर्द समझ में आया होता। मैं इन्हें बहुत सम्मान देती हूँ और ये हैं कि घूम घूम कर मेरी बुराई ही करती रहती हैं।ये ऐसा माहौल बना दी हैं कि यहाँ मुझसे कोई बात ही नहीं करना चाहता है।भैया तुम मुझे यहाँ से ले चलो वरना ये लोग मुझे मार डालेंगें।यहाँ इंसान बसते ही नहीं हैं।ये सब हैवान हैं,जीते जी मुझे निगल जाएंगे।
उस लड़की की बात सुनकर वहाँ बैठे कितनों की आँखे छलछला उठी पर उसके सास, ससुर पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।जब गाँव के प्रधान से नहीं रहा गया तो उसने कहा कि नहीं बेटी तुम यहीं रहोगी,इस गाँव की इज्जत बनकर रहोगी।प्रधान जी के हस्तक्षेप से मामला शान्त हुआ परन्तु कुछ दिनों के पश्चात् पता चला कि लड़की के दुर्गति को देखकर उसके भैया उसे वहाँ से ले आए,उसकी दूसरी शादी कर दिए ,वह खाते पीते वाले के घर गयी लेकिन अमन चैन से है।

अरुण कुमार आर्य
आर्य समाज मन्दिर
पं०दीन दयाल उपाध्याय नगर
चन्दौली।

Leave a Reply

Your email address will not be published.