#Kahani by Arun Kumar Arya

फिर होगा कि नहीं ?

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पापा पापा अमोला टूट जाएगा।

टूट जाने दो ,फिर हो जायेगा।

पता नहीं फिर होगा कि नहीं, इसे बचा लीजिए।

इसे बचा लीजिए, इतना सुनते ही दिवाकर ने बच्चे को गोद में उठा लिया, मानो उसके दिलोदिमाग पर किसी ने हथौड़ा चला दिया हो ,वह बच्चे को सीने से लगाकर लगा रोने।खेत में पाटा चलाने के लिए वह अपने प्रथम पत्नी के एकमात्र संतान प्रभात को लेकर आया था।प्रभात अभी मात्र सात साल का बालक था।बच्चे की इस बात पर पता नहीं फिर होगा कि नहीं इसे बचा लीजिए।यह दिवाकर के कानों में बार बार गूँजने लगा,उसे व्यथित करने लगा।बार बार वह अपने बेटे प्रभात को अपने सीने से चिपकाकर कभी चूमता ,कभी गले लगाता ,कभी उसे बाहों में जकड़ लेता। जैसे आँखों से आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था।

 

आख़िर प्रभात के एक वाक्य ने ऐसा क्या कर डाला कि दिवाकर में एकाएक ऐसा परिवर्तन आ गया वह खेत में पाटा न चलाकर बच्चे को अपने बाहों में भरकर रो रहा था। उसके आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।वह सब सुध-बुध खो बैठा था। उसके पीछे ऐसा क्या रहस्य छिपा था ?

 

दिवाकर  नौजवान था।दस साल पहले उसका विवाह ऊषा से हुआ था ।ऊषा के आने से घर में रौनक आ गयी।बूढ़े माँ- बाप को भी सहारा मिल गया।खेती- गृहस्थी का कार्य सुचारु रूप से चलने लगा।समय बीता ऊषा ने प्रभात को जन्म दिया, जन्म क्या दिया परिवार पर दुख का पहाड़ आ गिरा।सारी ख़ुशियाँ काफूर हो गयी।हँसता हुआ घर रोने लगा ,चहरदिवारियाँ खड़ी सारी दुर्दशा देखने लगी।प्रभात को जन्म देना ऊषा के जीवन का अन्तिम दिन था।प्रभात को जन्म देकर उसे एक नज़र देखी, फिर उसकी नज़रें सदा सदा के लिए पथरा गयीं, लोग कहने लगे यह कैसा संयोग है।यह संयोग नहीं विचित्र  वियोग था ।बेटे का माँ से, पति का पत्नी से,सास ससुर का बहू से, घर के सुख, हँसी -खुशी का विलुप्त होना, क्या कम था ? पलक झपकते प्रलय मच गया, दुख का अम्बार लग गया।जन्मजात बच्चे को सम्हालना सबके लिए कठिन हो गया।

 

कालचक्र अपनी गति से चल रहा था।एक एक पल बोझिल था। किसी तरह दिन कट जाता था लेकिन रात को बड़ा कष्ट होता था।बच्चे को दूध देना ,मल मूत्र त्यागने पर विस्तर बदलना माँ के अतिरिक्त हर एक को बोझिल लगता है लेकिन माँ का ही तो अभाव था आख़िर उसकी पूर्ति कैसे हो ? प्रश्न चिह्न बनकर समाधान ढूँढ़ रहा था। समाधान था दिवाकर का दूसरा विवाह।राय देने वालों की क्या कहीं कोई कमी होती है, जो आता अपने अपने ढंग से समझाता।बात भी ठीक थी।अभी दिवाकर की पूरी उम्र बैठी थी दूसरे बच्चे को सम्हालना एक विकट समस्या बनकर खड़ी थी। आख़िरकार वह घड़ी आ ही गयी।इन्तजार खत्म हुआ।शहनाइयां बज उठी।घर में नयी नवेली दुल्हन के रूप में रजनी का आगमन हुआ।फिर से घर में ख़ुशियाँ लौट आयी।पायल की रुमझुम बजने लगी।

 

रजनी के आगमन से घर मुस्कुरा उठा।परिवार में फिर से ख़ुशियाँ लौट आयी। जैसे वह सबके लिए बैशाखी बनकर आ गयी। दिवाकर को जीवन साथी के रूप में पाकर वह बहुत ख़ुश थी,उसके बेटे प्रभात को वह अपना जाया मानकर उसका तल्लीनता के साथ पालन पोषण करने लगी।दिवाकर जो पूर्व पत्नी ऊषा के मरने के बाद बहुत गुमसुम रहता था उसकी भी ख़ुशियाँ लौट आयी।पिता परमेश्वर और माँ सविता भी अपनी नयी बहू रजनी का बहुत देखभाल करने लगे, वे हमेशा इस बात का ध्यान रखते थे कि उसे किसी प्रकार की कोई कमी न हो।रजनी भी अपने सास ससुर की सेवा में कोई कमी नहीँ रखती थी।कुल मिलाकर एक आदर्श परिवार का स्वरुप उपस्थित था।

समय गतिशील है।समय का चक्र बलशाली, अपराजेय है ।कहाँ कोई अभी तक समय को रोक पाया है।न वह कभी रुका है और न ही वह कभी रुकेगा।वह निर्बाध रूप से चलता आया है और चलता ही रहेगा ।पल पल करते हुए सहस्त्रों लाखों वर्ष बीत गये उसके चाल में आज तक न कोई कमी आयी और न ही वृद्धि।देखते ही देखते दिवाकर और रजनी के दाम्पत्य जीवन के पाँच वर्ष बीत गये लेकिन रजनी को कोई सन्तान नहीं हुआ।हर स्त्री को अपने निज के सन्तान की चाहत होती है।मातृत्व का सुख नारी जीवन का सर्वोच्च सुख होता है।सन्तान पाने के लिए वह तरह तरह के षट्कर्म करती है, यथा डाक्टर को दिखाना, देवी- देवताओं से मन्नत मानना, आस पड़ोस से इस सम्बन्ध में बातें करना ,इतना ही नहीं झूठे, मक्कार ओझा,सोखा के चक्कर में पड़ना आदि आदि।

नारी स्वभाव के कारण रजनी भी दिवाकर को लेकर कभी डाक्टर के पास तो कभी इस मन्दिर तो कभी उस मन्दिर कभी इस बाबा तो कभी उस मुल्ला मौलबी, ओझा सोखा के यहाँ घूमती फिरती रहती थी ,जो जैसा कहता वह वैसा करती रहती थी।बहुत से तथाकथित बाबाओं ,साधुओं ,मुल्ला, मौलबियों ,ओझाओं , सोखाओं के चेले चापट के जाल में कितने बर्बाद हो गये फिर भी उनका वर्चस्व जारी है,उनकी माया ही विचित्र होती है।वे ऐसा भ्रमजाल बिछाते हैं कि बड़े बड़े चतुरों की बुध्दि फेल हो जाती है।जब तक वे अच्छी तरह आर्थिक रूप से निचोड़ नहीं लिए जाते हैं तब तक उनकी बुद्धि ही नहीं खुलती है।इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो जेल की हवा खाते हैं।इनके चक्कर में शारीरिक और मानसिक शोषण भी जमकर होता है।इनकी इतनी माया होती है कि कुछ इनके द्वारा बताए गये द्रव्य इस धरती पर इनके सिवा किसी और को मिलेगा ही नहीं, शायद ईश्वर से उस चीज़ को बनाने में भूल हो गयी है।ये जो सामान कहते  हैं वह सामान इनके चक्कर में फँसे लोगों तक पहुँच ही नहीं पाता है।बहुत से तो सोना-चाँदी या अन्य जवाहरात तक की माँग कर देते हैं।मुर्ग़ा,शराब,गाँजा, भाँग तो सामान्य चीज़ है।

कुछ तो ऐसे चरित्रहीन होते हैं जो स्त्रियों को अपने वाग्जाल में फँसाकर या बलात् उनका यौन शोषण भी करते हैं।घर वालों को जाने अनजाने में वे मूर्ख बनाए रहते हैं।स्त्रियाँ भी सन्तान की लालसा में या लोक लज्जावश किसी से कुछ कह नहीं पाती हैं। ओझा,सोखा तो ऐसे होते हैं जो अपने लाभ के चक्कर में इनका भूत है तो उनका भूत है कहकर कई परिवारों को लड़ाकर उनके सम्बन्धों में कटुता पैदा कर देते हैं , एक दूसरे से सारे सम्बन्ध विच्छेद हो जाते हैं।ये यहाँ तक यह अधम होते हैं कि कार्य की सिद्धि के लिए किसी के बच्चे तक की बलि चढ़ा देते हैं।यही कार्य दिवाकर के परिवार में भी होने वाला था।

रजनी जब सन्तान प्राप्ति के लिए हर प्रयास से हार गयी तो एक तथाकथित बड़े ओझा के शरण में गयी।उससे अपना सारा हाल कह सुनाई। पहले तो उसने आर्थिक रूप से खूब चूसा और अन्त में अपना अन्तिम हथियार चलाते हुए बोला :- बच्चा तुम्हारा कोख बलि माँगता है।बच्चे के बदले बच्चा।

रजनी:– बाबा कोई और उपाय बताइए ।मैं बच्चा कहाँ से लाऊँ ?

बाबा :- तुम्हारे घर में ही है तुम्हारे सौतन का बेटा है।

रजनी :- आप क्या कह रहें हैं ? उसको मैंने अपने बच्चे की तरह पाला है।यह काम मुझसे नहीं होगा ।

बाबा :- तब बाँझ बनकर घूमो।

बाबा का यह वाक्य तब बाँझ बनकर घूमो ,उसके कानों में गूँजने लगा।सोते ,बैठते, उठते, जागते “तब बाँझ बनकर घूमो” गूँजने लगा।एक तरफ़ प्रभात जिसे उसने अपने बेटे की तरह पाली थी दूसरी तरफ़ “तब बाँझ बनकर घूमो” दोनों का द्वन्द होने लगा। संकल्प विकल्प के संघर्ष से वह व्यथित थी और एक दिन उसका विकल्प जीत गया कि चलो बाँझ के बोझ से उत्तीर्ण होने के लिए प्रभात की बलि दे ही दी जाय।

हिम्मत जुटाते हुए एक दिन वह बड़े प्यार से दिवाकर से बोली:- हम लोग कब तक इस प्रकार यहाँ वहाँ चक्कर काटते रहेंगे सारा प्रयास असफल हुआ।अब क्या किया जाय ?

दिवाकर :- जो तुम बोलो

रजनी:- मैं क्या बोलूँ, सोचती थी कि गोद में एक बच्चा आ जाता तो बाँझ कहाने से बच जाती।

दिवाकर– एक बच्चा तो गोद में है।तुम उसे अपने बच्चे की तरह पालती हो।उसी से अपनी इच्छा पूरी कर लो।

रजनी — बात तो सही कह रहे हो परन्तु बाँझ के कलंक से कैसे छुटकारा मिलेगा।कब तक बाँझ के शब्दों को सुनती रहूँगी ?

दिवाकर — कहने दो लोगों को।कहने वालों को तुम कब तक रोकोगी ?

रजनी– जब तक कि माँ नहीं बन जाती। माँ बनी कि सबकी आवाज़ बन्द।

दिवाकर — सारे प्रयास तो किये पर सफलता हाथ नहीं लगी।तुम्हीं कोई उपाय बताओ।

रजनी– मैं बड़े ओझा के पास गयी थी उसने कहा कि एक जान पाने के लिए एक जान चाहिए।

दिवाकर– क्या मतलब ?

रजनी–  किसी की बलि

दिवाकर– बकरे , मुर्गा, सुअर जिसका कहो उसका बलि चढ़ा देवें।

रजनी —–जानवर का नहीं इंसान का

दिवाकर– इंसान कहाँ से लाऊँ ( क्रोध से तमतमाते हुए)

रजनी — आप गुस्सा क्यों होते हैं ?

दिवाकर – तुम्हारी बात पर

बात आयी समाप्त हो गयी।लेकिन प्रारम्भ हो गया रजनी का मौन रहना।उसने नारी का अमोघ अस्त्र फेंका, वह काम तो सब करती रही परन्तु दिवाकर से दूर रहने लगी ,उससे बोलना बन्द कर दी।आख़िरकार विवश होकर दिवाकर को उसके समक्ष नत मस्तक होना पड़ा।

दिवाकर– बताओ ऐसा कब तक चलेगा ? (रजनी का बाँह पकड़ते हुए)

रजनी– मैं आपसे कुछ कह तो नहीं रही हूँ। घर का सारा काम काज तो कर रही हूँ।अब क्या चाहते हो ?

दिवाकर — जिस तरह तुम मुझसे दूर रहती हो,क्या यही रहने का तरीक़ा है।

रजनी—तुम्हीं बता दो कैसे रहूँ ? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, मुझे तुमसे कुछ अपेक्षाएं हैं जब तुम उसे पूरा ही न कर सको फिर पति किस काम के, क्या मैं लोगों से बाँझपन के ताने सुनती रहूँ ?

दिवाकर— जो कहो करें।

रजनी— ऐसा तो नहीं यह तुम्हारा स्वाँग है ? कहकर मुक़र जाओ।

दिवाकर — क्या कभी ऐसा हुआ है ?

रजनी— कौन जाने अभी भावावेश में बोल रहे हो बाद में कहोगे कि यह कैसे होगा ?

दिवाकर:- कहकर तो देखो

रजनी—मेरे बाँझपन को दूर करने के लिए कोई व्यवस्था करो

दिवाकर — तुम्हीं बता दो किसके बच्चे की बलि दूँ  ?

रजनी —- ढूँढ़ो शायद कहीं मिल जाय

दिवाकर– वह भी तो किसी के दिल का टुकड़ा होगा

रजनी—- तो अपने ही दिल के टुकड़े की बलि चढ़ा दो

दिवाकर– अर्थात् अपने बेटे प्रभात को

रजनी– क्या हुआ एक बेटे के जगह दूसरा बेटा आ जायेगा ,तुम बाप के बाप बने रहोगे, मैं माँ बन जाऊँगी, फिर मुझे बाँझ कहने वाला कोई नहीं रहेगा,लोगों के तानों  से मुक्ति मिल जाएगी।

दिवाकर— यह मुझसे नहीं होगा

रजनी –मैं कह रही थी कि तुम बात से मुक़र जाओगे,तुम्हारे बात का कोई भरोसा नहीं है।

दिवाकर—- या तुम असम्भावी प्रश्न ही उठा दी हो ,मैं पुत्रहन्ता बनूँ। दुनिया मुझे क्या कहेगी ?

रजनी– तुम्हें दुनिया क्या कहेगी इसकी चिन्ता है, मुझे क्या कहती है इससे कोई मतलब नहीं है।

रोज़ रोज़ के कच कच से घर का वातावरण विषाक्त होता जा रहा था।शान्ति की सूखी रोटी बहुत प्रिय होती है।एक तो खेती बारी का बोझिल काम,दूसरे पत्नी के अप्रिय निवेदन से दिवाकर का मस्तिष्क काम नहीं कर रहा था।लोग दूसरे से अपनी बात कहकर अपने मन के बोझ को हलका कर लेते हैं परन्तु यह बात तो ऐसी थी कि कहें तो किससे कहें।कहना,सुनना,निर्णय लेना सभी कुछ दिवाकर को था।यह एक ऐसा निर्णय था जहाँ अपने हृदय के टुकड़े की बलि देनी थी, परिवार के चिराग को बुझाना था, पता चलने पर समाज की उपेक्षा सहनी थी,कानून के शिकंजे में कसना था।पत्नी का हठ से परिवार में अशान्ति के द्वन्दों का जाल बिछा हुआ था।कहीं भी मुक्ति नहीं समझ आ रही थी,मानसिक विक्षिप्तता की स्थिति बनी हुई थी।एक दिन अपनी सारी इच्छाओं का दमन करके विक्षिप्त सा दिवाकर ने निर्णय ले ही लिया और रजनी से बोला — बताओ अपने बच्चे की बलि कैसे चढ़ाऊँ, तुम्हें भी मेरे साथ रहना होगा।

रजनी— सोच समझकर कह रहे हो।

दिवाकर– सोच समझकर नहीं तुम्हारी कामना पूरी करने के लिए कह रहा हूँ।बताओ कैसे प्रभात की बलि चढ़ायें ?

रजनी:– ———————-(कुछ देर तक सोचने के बाद) खेत जोत दिया गया है धान रोपने के लिए खेत में पाटा चलाना है।बैल के पीछे लगे पटरे पर तुम खड़े होते ही हो प्रभात को भी खड़ा कर देना। बच्चा है कीचड़ में पाटे के नीचे दब कर खत्म हो जाएगा कोई कुछ कहने वाला भी नहीं होगा और अपना काम भी हो जाएगा।

बरसात के दिनों में इधर उधर कहीं जामुन के पौधे तो कहीं आम के पौधे नमी पाकर उग जाते हैं।प्राय: अमोला (आम के छोटे छोटे पौधे) अधिक दिखाई पड़ते हैं।लोग आम बड़े चाव से खाते हैं और उसकी गुठलियों को जहाँ तहाँ फेक देते हैं जो बरसात के समय काफ़ी संख्या में दिखायी पड़ते हैं बच्चे इन पेड़ों को देखकर बहुत ख़ुश होते हैं।दिवाकर, रजनी और प्रभात खेत में पाटा चलाने को चल दिए। खेत में बैल ले जाकर उसके गले में रस्सी बाँधकर पाटा भी बाँध दिया गया। पाटे पर दिवाकर खड़ा हुआ अपने बगल में प्रभात को भी खड़ा कर लिया और बैल को हाँका, प्रभात ने रस्सी को कसकर पकड़ लिया और पाटा चल पड़ा।

जीव का सबसे बड़ा लक्षण है अपने जीवन की रक्षा। जिन्दगी सबको प्यारी होती है चाहे छोटा जीव हो या बड़ा । मृत्यु से सब भय खाते हैं ।मृत्यु से बचने और अधिक दिन तक जीने की हर प्राणी को लालसा रहती है।मृत्यु किसी को प्रिय नहीं है। प्रभात भी अपने अनुसार अपने को सतर्क कर लिया था।

 

बड़ों का जिस ओर ध्यान नहीं जाता है या वे उपेक्षित समझकर उस ओर ध्यान ही नहीं देते हैं, प्राय: बच्चों का ध्यान उसी ओर छोटी छोटी चीज़ों पर जाता है।निश्छल और निर्द्वन्द होने के कारण बच्चे लोगों का ध्यान उस ओर आकृष्ट करा ही देते हैं। मानना न मानना बड़ों पर निर्भर करता है।

पाटा चलाते समय अमोले को देखकर प्रभात ने कहा–पापा पापा अमोला  तब दिवाकर ने कहा टूट जाने दो फिर हो जाएगा लेकिन जब प्रभात ने कहा कि पापा पता नहीं फिर होगा कि नहीं, इतना कहना ही था कि दिवाकर की आँखें खुल गयी,उसके मस्तिष्क में उसका शब्द गूँजने लगा पता नहीं फिर होगा कि नहीं, पता नहीं फिर होगा कि नहीं, पता नहीं फिर—————-। वह बैल को रोककर प्रभात को सीने से चिपका कर रोने लगा कभी उसका गाल चूमता तो कभी उसके बालों में हाथ फेरता, यह सब दृश्य रजनी देख रही थी। वह उसके पास आकर बोल ही बैठी कि आख़िर अपनी बात से मुक़र ही गये । उसकी इतनी सी बात सुनना क्या था दिवाकर उस पर टूट पड़ा और उसे मारने लगा।रजनी इस अप्रत्याशित घटना से अनभिज्ञ थी उसे जरा भी आभास नहीं था कि उसके ऊपर एक नयी आपदा आ जाएगी।

उधर परमेश्वर और सविता दोनों जब बहू ,बेटे और पोते को गये हुए बहुत देर हुआ तो वे खेत पर पहुँच गये और वहाँ की स्थिति को देखकर सन्न रह गये।उनकी समझ में कुछ नहीं आया।दिवाकर से उन्होंने पूछा–यह क्या हो रहा है ? क्या अब यही रह गया है।

दिवाकर— पिताजी अब कुछ बाकी नहीं है, मैं इसे किसी शर्त पर अब अपने घर में नहीं रखूँगा।इसे इसके मायके पहुँचा दीजिए।

परमेश्वर–आख़िर ऐसी क्या बात हो गयी जो तुम ऐसा कर रहे हो ?

दिवाकर– सुनना चाहतें हो तो सुनिए (वह शुरू से लेकर अभी तक के पूरे वृत्तान्त को सुना दिया) अब यह इस घर में रहने लायक नहीं है।मैं इसकी सूरत तक नहीं देखना चाहता हूँ।

परमेश्वर– आवेश के जगह धैर्य से काम लो।

दिवाकर – पिताजी अब धैर्य कैसा ? आज मेरा बसा बसाया परिवार इसके चक्कर में बर्बाद हो जाता।

सविता– देखो बेटा यह गलती तुम दोनों ने मिलकर की है इसमें तुम भी दोषी हो।पढ़े लिखे होकर भी तुम इधर उधर ओझा सोखा के चक्कर में घूमते रहे, खूब रुपये को बर्बाद किये और अन्त में रजनी के ओझा के कहे बात में तुम भी आ ही गये।तुम्हारे पढ़ाई लिखायी का क्या महत्व रहा।

दिवाकर– कुछ भी हो अब मैं इसे नहीं रखूँगा

सविता – पश्चात्ताप के आँसुओं को देखो ,वह अपने को कितना निरीह समझ रही है।पत्थर की मूर्ति बन गयी है ।

दिवाकर– छोड़ दीजिए इसे ,यहीं अहिल्या बनकर पड़ी रहेगी।

सविता– सम्मान, राम बनकर अहिल्या का उद्धार करने में है।

परमेश्वर– माँ का कहना मान जाओ बेटा, घर की इज्जत घर में ही रहने दो।

रजनी को अपना भविष्य अंधकारमय  दिखायी पड़ने लगा, स्वयं के बच्चे की माँ बनने का नशा उतर गया।प्रभात के प्रति उसकी ममता जाग उठी।वह विक्षिप्त सी दौड़कर उसे अपने सीने से चिपकाकर लगी उसे चूमने।उसे अपने गोद में उठाकर सास, ससुर के चरणों में गिरकर अपने किये गये गलती के प्रति क्षमा माँगने लगी।उसके प्रायश्चित के आँसुओं से सब द्रवित हो उठे उसके इस व्यवहार को देखकर सविता ने उससे कहा जाओ बेटी दिवाकर से क्षमा माँगो, वह तुम्हें अवश्य क्षमा कर देगा,वह आँखों में आँसू भरे दिवाकर के चरणों में लेट गयी।दिवाकर किंकर्तव्य विमूढ़ होकर खड़ा रहा कि अब क्या करें तभी सविता और परमेश्वर ने एक स्वर में कहा – क्षमा करना धर्म है उसे उठाकर अपना लो।

 

(यह घटना सत्य है परन्तु पात्रों के नाम काल्पनिक है।कुछ अंश कहानीकार की कल्पना है)

 

अरुण कुमार ” आर्य ”

प्रधान, आर्य समाज मन्दिर

मुग़ल सराय चन्दौली।

 

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