kahani by Dharambir Dhull

गुरू घर** लघु कथा       **
सरदार गुरचरण सिंह अपनी लडकी विमल कौर की शादी करने के बाद खुश थे,मानो उनके उपर
से बोझ उतर गया हो।ससुराल में विमल कौर का तालमेल कुछ कम हुआ। उसे बडा परिवार
पसंद नहीं आया।वह कई बार बीच में आए गए की चाय बनाने से इनकार कर देती,बर्तन मांझने से यह कहकर इनकार कर देती,मुझ से  इस देश के बर्तन नहीं मांझे जाते।वह रूठ कर अपने घर चली गई। गुरचरण उदास हुआ,उसने अपने दामाद व अन्य परिवार सदस्यों से बातचीत की और समस्या का कारण जानना चाहा।उसके दामाद ने बताया कि वह छोटे छोटे कामों से भी इनकार कर देती है,एक ही बात उसके मुहं में रहती है मेरा इस भीड में दम घुटता है।सरदार  गुरचरण सिंह ने अपनी बेटी के मन को समझा और एक दिन उसे अपने साथ गरू घर ले गया।
वंहा लंगर चखा और बेटी को बर्तन मांझने की सेवा करने के लिए कहा,स्वयं भी सेवा में जुट
गया।शाम होने तक दोनो बिना थके काम करते रहे।गुरचरण सिंह अपनी बेटी से बोले,बेटी,
लगता है थक गयी हो। नहीं पापा,मैं आज बहुत खुश हूं।मैंने आज पहली बार यंहा गुरू सेवा की
है,सरदार जी ने देखा,वास्तव में उसका चेहरा खिला हुआ था। वह अपनी बेटी को सीने से
लगाते हुए बोला,बेटी,यदि ध्यान से देखो,ससुराल भी गुरू घर की तरह है। वंहा पर
सास,ससुर,ननद की भीड कैसी हो गई, बेटी। हम सब गुरू की ही नेक संताने हैं ,बेटी। सेवा
करोगी तो गुरू जी का आर्शीवाद तुम्हें जरूर मिलेगा।वह अपने पापा के सीने से लग गई।आज
उसके पापा उसकी भावनात्मक स्वीकृति  को भांपकर बहुत खुश थे।

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