#Kahani by Harprasad Pushpak

अभिनय (लघु कथा )

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लम्बी दूरी की रेलगाड़ी जंक्शन पर आकर रूकी।यहां से कुछ डिब्बे और जुड़ने थे ।इस लिये टे्न को कुछ समय रूकना था ।अचानक एक दस बारह साल का एकलड़का रोता हुआ डिब्बे में चढ़ा ।हाथ में कटोरा लिये चीख चीख कर आंसू बहा रहा था वह हाथ से ईशारा कर कहता जा रहा था वह दूर चादर में लिपटा मेरा बाप थोड़ी देर पहले ही मरा है उनके पास मेरी मां बैठी है ।हमारे पास उनका संस्कार करने के लिये फूटी कोड़ी भी नही है। हमारा यहां कोई नही है ।अगर संस्कार नही हुआ तो मेरे बाप की आत्मा को शान्ति कैसे मिलेगी। यह कहते कहते वह फिर दहाड़े लगाने लगा ।

लड़के के दुख में सहानुभूति दिखाते हुए कुछ लोगों ने

भावुक होते हुए उसके कटोरे में सौ,पचास ,बीस के नोट डाल दिये । एक व्यक्ति ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा ।मैं ही सारे संस्कार की व्यवस्था कर देता परन्तु इस समय सफर में होने के कारण मजबूर हूं और उसने पांच सौ रूपये का नोट उसके कटोरे में डाल दिया । इतने में गार्ड ने झंडी दिखा कर बिसिल बजाई ।इंजन के हार्न के साथ

गाड़ी धीरे धीरे रैंगने लगी और लड़का झट से उतर गया ।

गाड़ी के रैंगने के साथ ही अब भी कुछ लोग खिड़की और गेट पर खड़े होकर चादर में लपटे उसके बाप को देख.रहे थे । अचानक उसका बाप झट से चादर फैंक उठ कर खड़ा हो गया । अब दोनों पति पत्नी कभी हाथ जोड़ तो कभी हाथ हिला कह रहे हो ।क्यों हमारा अभिनय कैसा लगा?

हरप्रसाद पुष्पक

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