#Kahani by Harprasad Pushpak

पुरूस्कार (  लघु कथा)

निष्ठा पूर्वक शिक्षण कार्य करते हुए। सीधे सरल और शान्त स्वाभाव पांडे जी ने विगत पांच बर्षों में एक भी अवकाश नही लिया था । स्टाफ रूम में बैठे साथी अध्यापको में मिश्रा जी ने चुटकी लेते हुए कहा- क्यों पांडे जी अवकाश बचाकर कहां ले जाओगे ?तभी तपाक से यादव जी ने कहा-अरे ! भाई भावी जी से वहुत डरते हैं,इसी लिये तो कोई अवकाश नही लेते है ।मिश्रा जी फिर बोले-अरे! यादव जी भाबी जी तो एक दम  गऊ है वेचारी! पांडे जी झैंपते हुए बोले -जब कोई आवश्यकता ही नही पड़ी तो क्या करता अवकाश लेकर ।

कालेज प्रबन्ध समिति की बैठक में शिक्षक प्रतिनिधियों में से एक सिंह साहब ने यह सोचकर पांडे जी का प्रसंग उठाया कि समिति पांडे जी की प्रशंसा करेगी और उन्हे सम्मानित करेगी।तभी समिति के एक सदस्य नेआशंका व्यक्त करते हुए आपत्ति जताई – यह सम्भव ही नही है ।हो सकता है पांडे जी अपना काम

कालेज टाईम में ही निकाल लेते हो ?इस की जांच होनी चाहिये ।यदि दोषी पाये जाते है तो उनके विरूद्ध कड़ी कार्यवाही होनी चाहिये ? तभी एक अन्य सदस्य ने कहा –

अगर पांडे जी निर्दोष साबित हुए तो ? अध्यक्ष ने कहा हम क्या कर सकते हैं? यह उनका अधिकार था, उन्होने उपभोग क्यों.ही किया।

दोनों शिक्षक प्रतिनिधि सोच रहे थे। चोबे जी ….आये थे छब्बे जी होने ,दुबे जी होकर लोटे।हमने तो सोचा था…..

वेचारे !पांडे जी  हमारी वजह से अपमान और हो गया उनका ।

हरप्रसाद पुष्पक

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