kahani by Neerja Mehta

–                                                          –  “सच्ची लगन”

मैं ऑफिस में काम करते करते थक गयी थी । सोचा एक कहानी लिख लूँ। तभी भाई का ध्यान आ गया। कैसे हम आधी आधी कहानी लिखते थे फिर एक दूसरे की कहानी पूरी करते थे।मैंने सर पीछे कुर्सी से टिका लिया और आँखें बंद कर लीं। कुछ देर बैठे बैठे  फिर से वही दृश्य आँखों के सामने आ गया।याद आ गयीं वो बरसों पुरानी बातें। सब कुछ सामने आगया।
हम दो भाई बहन थे।भाई मुझसे बारह वर्ष बड़े थे। मैं पाँच वर्ष की थी तभी मेरे पिता का दिल के दौरे से देहांत हो गया। माँ ने बहुत परेशानियाँ उठाकर हम दोनों को पाला। भाई ने भी बीस वर्ष के होते ही नौकरी ढूँढी । शहर से बाहर उनको नौकरी मिली। हर छुट्टी में वो घर आते। मुझे याद आया वो मुझको बहुत प्यार करते थे। मुझे हमेशा छुटकी कहकर बुलाते थे।धीरे धीरे समय बीतता गया। मैंने दसवीं पास कर ली।तभी से हमको कहानी लिखने का शौक पड़ा। मैं कहानी लिखना शुरू करती तो उसको पूरा भाई करते। वो लिखना शुरू करते तो मैं उसको पूरा करती। राखी भाईदूज पर मैं बेताबी से भाई का इंतज़ार करती। आधी कहानी लिखकर रखती।
हमेशा की तरह उस दिन भी वैसा ही मौसम था। सुबह की भीनी धूप के बाद छाये काले बादल और सावन की रिमझिम बारिश ने मन मोह लिया था।एक कहानी भी मैंने लिख ली थी जिसको भाई को पूरा करना था।अरे, यह क्या? आज भाई अभी तक नहीं आये।माँ बोली”अरे फ़ोन तो लगा भाई को अब तक नहीं आया।” फ़ोन लगाया पर वो भी बंद आ रहा था।मैंने माँ से कहा शायद बैटरी खत्म हो गयी होगी । ये सोच हम बैठ गए। तभी मैंने माँ से पूछा, “माँ आपने भाई की पसंद की चीज़ें बना लीं। माँ बोलीं, ” मैंने उसकी पसंद का नाश्ता और खाना दोनों तैयार कर लिए हैं।”मैंने भी राखी की थाली खूब प्रेम से सजा ली थी।रोली, अक्षत, नारियल, दीया, मिठाई और खूब प्यारी सी चन्दन की राखी सब रख लिया था। धीरे धीरे एक बजा दो बजे और ऐसे ही राह देखते देखते शाम के पांच बज गए पर भाई नहीं आये।
मैं राखी की थाली लिए ,अधूरी कहानी लिए और माँ नाश्ता और भोजन लिए दिन भर इंतज़ार करते रहे। तभी घर की घंटी बजी। यह सोच कर कि भाई होंगे मैं दौड़कर गयी और दरवाज़ा खोला। देखा तो कुछ पोलिसकर्मी खड़े थे। बोले कि किसी लड़के का एक्सीडेंट हो गया है जिसमें वो चल बसा। उसकी जेब से कुछ कागज़ और पर्स मिला है जिससे यहाँ का पता मिला है, आपलोग चलकर लाश की पहचान कर लें। हमें काटो तो खून नहीं, हम जड़ हो गए। समझ नहीं आया कि क्या करें ।किसी तरह खुद को संभाला पड़ोस के अंकल को बुलाया माँ को उठाया और उनके साथ हो लिए। रास्ते भर यही मनाते रहे की भाई न हों।वहां जाकर देखा तो भाई ही निकले।हमें चक्कर आने लगा। भाई को देख कर लगा मानो सो रहे हों। छुआ तो तन बर्फ की तरह ठंडा। हम जड़वत हो गए। किसी तरह अंकल की मदद से भाई को घर लेकर आये। सबको खबर करी। घर में कोहराम मच गया। पिता पहले से ही नहीं थे। माँ बीमार और भाई अब रहे नहीं। भाई के अंतिम संस्कार के बाद कुछ दिन बीतने पर जब सब चले गए तब लगा की घर का खर्च कैसे चलेगा। मैं सिर्फ बारहवीं पास थी। कौन देगा नौकरी मुझे, कैसे माँ का इलाज कराऊँ। यही सब सोचते हुए मुझे लगा कि मन पक्का करना पड़ेगा। सब कुछ भूलकर आगे  बढ़ना होगा।
मै आईने के सामने जाकर खड़ी हो गयी, आंसूं पोंछे और एक कड़ी नज़र खुद पर डाली। एक फैसला लिया अब रोना नहीं है कुछ कर दिखाना है। रोकर ज़िन्दगी नहीं चलेगी।अब मुझे रुकना नहीं है। घर को ,माँ को किसी तरह संभालना है। इस अधूरी कहानी को अब मुझे ही पूरा करना है।मैं निकल पड़ी घर से और सबसे पहले सीधे कंप्यूटर सीखने के लिए खुद का दाखिला कराया, वहां की फीस सुनकर चक्कर आने लगा की कैसे कोर्स पूरा करुँगी। ख़ैर फीस जमा कर दी थी इसलिए उसके लिए उपाय भी सोचना था। मैंने कुछ बच्चों की ट्यूशन ली। मुझे सिलाई का काम आता था तो मैंने एक बड़े बुटीक में सिलाई का काम पकड़ा। अब मैं सुबह कंप्यूटर कोर्स करने लगी दोपहर को सिलाई का काम और शाम को ट्यूशन करने लगी। मेरे पास इतने पैसे आने लगे कि मैं अपनी फीस, माँ का इलाज और घर में सूखी रोटी का खर्च निकाल सकी। इन सब खर्च के बाद कुछ नहीं बचता था। मैंने फिर रात में भी कुछ बच्चों की ट्यूशन ली। इस तरह एक साल बीत गया। मुझे एक ऑफिस में कंप्यूटर की नौकरी मिल गयी। मैंने सोचा की बी.ए. कर लूँ। मैंने पत्राचार द्वारा बी.ए. में दाखिला ले लिया। नौकरी के कारण सिलाई का काम छूट गया।
इस तरह मैंने एम.ए. भी कर लिया। अब मुझे तरक्की भी मिल गयी ऑफिस में। मेरे काम से खुश होकर मालिक ने मेरे पैसे भी बढ़ा दिए। दो वर्ष बीते। कंप्यूटर कोर्स भी खत्म हो गया। माँ अचानक बहुत बीमार हो गयी। उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। मैं ऑफिस जाती तो माँ की देखभाल के लिए कोई न रहता। मालिक ने भी छुट्टी देने से इनकार कर दिया। माँ की बीमारी के कारण मेरी नौकरी छूट गयी। लगा एक बार फिर मैं रास्ते पे आगयी हूँ । मैं अकेले सब सहते सहते टूट चुकी थी। पर फिर से एक बार आँसू पोंछ मैंने सिलाई का काम पकड़ा। माँ कुछ दिन अस्पताल में रहीं पर उनकी तबियत बिगड़ती चली गयी। कुछ दिनों में वो चल बसीं। भाई के जाने के बाद से वो सदमे में ही थीं। मैं निपट अकेली रह गयी।लोगों की आँखें मुझे घूरने लगीं । अब तक जिन चाचा चाची ने कोई खबर नहीं ली थी वो घर हडपने के लिए आ धमके।पूरी तरह बिखर गयी थी मैं।पर जैसे भाई के जाने के बाद मन कड़ा किया था वैसे ही एक बार फिर से मन मज़बूत किया । चाचा चाची को कड़कती आवाज़ में मैंने घर से जाने को कह दिया। मैंने कहा ये घर मेरा है और मैं किसी को इस घर पर हाथ भी नहीं लगाने दूंगीऔर उनको जबरदस्ती घर से बाहर निकाला।फिर एक फैसला लिया आगे की पढाई पूरी की। एक साल तक पढ़ाई में बहुत मेहनत की। बैंक की परीक्षा में बैठी। पास हुई और बैंक की मेनेजर बनी। घर आकर माँ और भाई की तस्वीर के आगे खड़ी हुई तो आँखे भींग गयी। ख़ुशी के आँसू निकल पड़े। हाथ में वही अधूरी कहानी लिए खड़ी रही।और इस अधूरी कहानी को पूरा किया।
तभी अचानक आँख खुली तो खुद को मेनेजर की कुर्सी पर  पाया। आज इतने साल बीत गए पर लगता है कल ही की बात है। आज मेरे पास सब कुछ है। एक अच्छे प्यार करने वाले जिम्मेदार पति, दो प्यारे बच्चे अपना घर , गाड़ी सब कुछ।
मुझे लगा मेहनत और काम करने की लगन इंसान को कहाँ से कहाँ पहुंचा देती है।

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