#Kahani by Pratik Palor

लघु कथा: दीदी

शालिनी चचेरी बहन थी सुबोध की । बस कुछ महीने ही तो बड़ी थी । तीन साल की उम्र से ही सुबोध के लिए बहन कहने को वही थी और सगी है या नहीं, इसकी समझ आने में अभी वक़्त बहुत था । वैसे शालिनी ने कभी एहसास भी नहीं होने दिया की ऐसा नहीं है । सुबोध को जो आत्मविश्वास, सम्बल और ख़ुशी शालिनी से मिलती थी, वो सुबोध के लिए आत्मा समान थी । सुबोध को शालिनी में बहन के साथ दोस्त और माँ भी मिलती थी । पढ़ाई में भले ही थोड़ा बेहतर था लेकिन पढ़ाई की चर्चा शालिनी से करना मानो उसे रंग में भंग डालने जैसा लगता ।

बड़ों के घर अलग हो जाने के बाद मिलना-जुलना घट गया, लेकिन हृदय के तार और पक्के जुड़ गए । त्यौहारों और शादियों में ही मिल पाते थे । तभी सुबोध जी भर के शालिनी को निहार लेता और कभी-कभी उसी की आँखों से काजल ले कर उसे काला टीका लगा देता । शालिनी के प्रति उसके मन में श्रद्धा ऐसे बढ़ती गई कि बड़ा होते-होते वो शालिनी को दीदी कह कर बुलाने लगा और मौका देख कर उसके पैर भी छू लेता था । बचपन से ही बेहद शर्मीले सुबोध को हाथ पकड़ कर नाचने के लिए शालिनी ही ले आती थी । और उसे अपनी दीदी के साथ नाचने में ऐसा आनन्द आता कि ये भी भान नहीं रहता कि सब उसे देख कर हँस रहे होते थे

अभी सपने देखने की उम्र भी नहीं हुई थी कि नियति ने जैसे सब कुछ पलट दिया । सुबोध छुट्टियों में अपनी नानी के घर था और खबर आई कि प्रेत-बाधा से जूझते हुए शालिनी के प्राण साथ छोड़ गए । ना रोया, ना कुछ बोला, ना किसी से कुछ पुछा । ईश्वर से इतना रुष्ठ था कि शिकायत करने को भी तैयार नहीं था । किसी के प्राण रह जाएँ, लेकिन आत्मा चली तो जाए तो क्या हो!

जाने कहाँ से एक अध्यात्म की पुस्तक हाथ लगी और पढ़ते-पढ़ते जीवन, ईश्वर और आत्मा की अमरता पर विश्वास लौट आया । जीवन फिर पटरी पर लौट रहा था । पहले से अधिक परिपक्व, मृदुभाषी लेकिन गम्भीर सुबोध ऐसा दिखता था मानो कोई निरन्तर आशीर्वाद दे रहा हो । कई बार सपनों में शालिनी के दर्शन हुए । ऐसी उज्जवल, शान्त और स्पष्ट छवि जैसी उसने कभी प्रत्यक्ष भी नहीं देखी थी । और अब तो उसे नाचने में भी संकोच नहीं होता था । एक विवाह के संगीत समारोह में मञ्च पर ऐसी प्रस्तुति दी की लोग वाहवाही करते न थकते । और जब कोई पूछता की नाचना किससे सीखा तो सुबोध गर्व से कहता “मेरी शालिनी दीदी से” ।

 

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