#Kahani by Pratik Palor

लघु कथा: साइकिल
सात वर्ष की उम्र से ही हेमन्त को अपने दोस्तों को साइकिल चलाते हुए देख कर बड़ा अरमान होता था की उसकी भी एक चमचमाती, सुन्दर, आधुनिक रूप वाली छोटी-सी साइकिल हो । किसी पर रौब पड़े या न पड़े, पर अपनी साइकिल पर घूमने का आनन्द ही शानदार होगा । ऐसे धनाढ्य परिवार से तो था नहीं की इधर आवाज़ की और उधर साइकिल आ गई । तो उसने सोचा पहले सीख लूँ और फिर माँग लूँगा, किसी जन्मदिन पर ।
कभी दोस्तों से मन्नतें कर और कभी एक-दो रुपये से किराए पर ला कर सीखने लगा । इसी क्रम में तीन-चार जन्मदिन बीत गए । पर हेमन्त बड़ा धैर्यवान और शालीन था । कभी ज़िद या जल्दबाज़ी नहीं की । हाँ, हर बार जन्मदिन पर नाना जी साइकिल लाने के लिए कुछ रुपये उपहार में देते थे, तो आस जगती थी । लेकिन वो रुपये जाने कौनसी भविष्य निधि में जमा कर दिए जाते ।
उस दिन जैसी ख़ुशी हेमन्त को शायद पहले कभी नहीं हुई, जब उसके पापा ने उसे एक दोस्त की स्टाइलिश साइकिल पूरे सन्तुलन के साथ चलाते देखा । वो कहाँ मौका जाने देने वाला था । उसने भी ज़रा करतब दिखाए और अपनी कुशलता दर्शाई । पापा के हावभाव में स्वीकृति जो दिख रही थी । अगले जन्मदिन पर पापा ने कहा “चल तेरी साइकिल लेने चलते हैं” । हेमन्त की आँखें ऐसी चमकी मानो अपनी दुल्हन देखने जा रहा हो ।
दुकान पहुँच कर हेमन्त थोड़ा असमंजस में पड़ गया । चमचमाती, सुन्दर, आधुनिक रूप वाली छोटी-सी साइकिल तो नज़र नहीं आई । पापा से पूछा तो बोले “वो देख अंकल अभी जोड़ कर बना देंगे” । २२ नंबर की एटलस साइकिल जो गाँव में दूध वाले भैया ले कर घुमते हैं, या फिर किसानों के बच्चे । हाँ मगर, एकदम नयी थी और सब से मज़बूत भी । हेमन्त के मन में आश्चर्य और हताशा और सवाल “पापा ने मेरे लिए ये साइकिल चुनी!!” वो बिना कुछ बोले अपनी आँखों को काबू करते हुए अकेला ही घर लौट आया । और मम्मी से बोला “आ चुकी मेरी साइकिल” ।

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