kahani by RAHUL SHIVAY

कलंक

“अजी सुनिये, मेरे इस दुःख की कहानी तो सुनते जाइए” यह कहते हुये कुएँ ने पत्रकार श्यामलाल तिवारी को आवाज लगाई |
इसपर श्यामलाल ने पूछा “आप कौन बोल रहे हैं, आप सामने आईए” |
“मैं कलंकित अभागा कुआँ बोल रहा हूं , आपने मुझे नहीं पहचाना | आप जिस दंगे की रीर्पोट छाप रहे हैं, लोग मुझे उसका कारन कहते हैं | आप भी अगर मेरे दर्द को नहीं समझेंगें तो कौन समझेगा |”  यह कहते हुए कुएं ने उत्तर दिया |
“क्या हुआ तुम्हारे साथ ?” रामलाल ने कुएँ से पुछा |
कुएँ ने कहा “कुछ साल पहले की बात है, मेरा निर्माण गांव के बीचो-बीच करवाया गया था |  मेरा निर्माण उंची जाती वालों ने करवाया था इसलिए छोटी जाती वाले लोंगों को मेरी ओर देखना भी मना था | मेरी भु-गर्भीय स्थिति के कारन मेरा पानी कभी नहीं सुखता था | एक बार भयंकर सूखा आया और गांव के सारे कुएँ सूख गए | पर मेरा पानी नहीं सुखा | छोटी जाती के लोग प्यास से मरने लगे | चारो ओर हहाकार मच गया था | तभी छोटी जाती के लोगों ने मेरे इस जल को पीने की अनुमति मांगी | पर कोई फायदा नहीं हुआ | विवश होकर उन्होंने विद्रोह कर दिया और लाशें बिछने लगी | कई शव काटकर मुझमें फेंक दिये गये | दंगा समाप्त होने पर बचे लोग मुझे इस दंगे की जड मानने लगे | नया कुआं खुदवाया गया | मेरे चारो ओर खौफनाक सन्नाटा छा गया है | जो भी आता है मुझे कोस  कर चला जाता है | मैं अंदर ही अंदर घुटता रहता हूँ  | इस कलंक की आग में जलता रहता हूँ  | कृपया आप मेरे इस कष्ट का निवारन कीजिए |”

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