#Kahani by Rajender Palampuri

” माँ ~~~~~~~”

एक ऐसा अतुलनीय शब्द , जो कानों में पड़ते ही बस मिसरी सा रस घोल देने की क्षमता रखता है !  मां किसी भी भाषा या फ़िर बोली में कहा जाने वाला सबसे मीठा लफ़्ज़ है ! स्वार्थ का तो इसमें दूर-दूर तक का भी रिश्ता नहीं है ! और न ही कोई अन्तर जानता है यह लफ़्ज़ ! बस एक यही बह ऐसा शब्द है जिसमें लिंग , जाति ,धर्म , वर्णभेद और रँग कोई मायना नहीं रखता , कोई अर्थ नहीं रखता ! यह एक ऐसा वटवृक्ष है जिसकी छाया में बस प्यार और दुलार के सिवा और कुछ नहीं…कुछ भी नहीं ! स्वर्ग की अनुभूति या उसकी कल्पना मात्र करना भी निरर्थक है , मां की गोद , मां के आँचल के आगे तो ! ज़रा सा लौटें अपने  बचपन की ओर , और झाँके अपना अतीत ! हम , मां के आँचल में अठखेलियाँ करते हुए दूध पीते हों ,या फ़िर मां के सीने से चिपके हुए उसके बालों से खेलते या उसके वक्षों से सटी कमीज़ को अपनी नर्म उँगलियों से पकड़े भींच रहे हों ! उसपर हमें कोई लाख बहकावे देता पुकार रहा हो ” अलेले ~~ले~~~ले~~यह देखो दीदी क्या कल लही है ~~~भैया का खिलौना….लो बह पापा आ गए ~~~~वोह देखो पापा त्या लाए~~~~”  बगैरह-बगैरह !  लेक़िन हम हैं जनाव कि टस से मस नहीं हुए मां की गोद से ! वाह क्या बेताज़ बादशाह थे हम मां के आँचल , उसकी गोद में ! और फ़िर शरारतें करते-करते कब बिना लोरी के ही मीठी नींद आ गई ,पता ही न चलता ! जी हाँ यही है बह * मां * ! जिसके गर्भ ने जन्म तो दिया ही ,बल्कि इतना प्यार और दुलार भी दिया कि इस मां के आगे भगवान भी सर झुकाते हैं जैसे कौशल्या के ” राम ” !
विभिन्न प्रान्तों में , भिन्न-भिन्न स्वरों में  ” मां ” पुकारा जाना कभी भी , कहीं भी निरर्थक न लगा ! हमारे यहाँ भी मां को  कई तरह से बुलाने या पुकारे जाने का प्रचलन है !  आई….बीब्बी….अम्मां….बीजी….माई….बेब्बे….माता….अम्मी….मम्मी….. मैया….और यहाँ पहाड़ में तो ” औजे~~~” और ” भाभी ”  कहने का भी रिवाज़ या आदत थी कहीं-कहीं  , जिसे मैने ख़ुद सुना है ! मुझे बहुत अच्छे से याद है स्कूल जाती बार ,  पिता जी की उँगली थामें चलते हुए बार-बार पीछे मुड़कर देखने की आदत  से पिता जी रोज़ परेशान तो रहते ही थे , मगर कई बार थप्पड़ भी जड़ देते थे  , और उसपर बिल्कुल अनमने भाव से पाठशाला की ओर बढ़ते कदम , मां की बस इक आवाज़ सुनने को तरस जाते ! किन्तु सुबह-सुबह ही ग़रमी-सरदी के दिनों में अपने बच्चों को स्कूल भेजते हुए बच्चों की  ऐसी दशा को  सिर्फ़ और सिर्फ़ मां ही समझ सकती है ! सारा दिन स्कूल में पढ़ाई कम शरारतें ज़्यादा होतीं ! और फ़िर जैसे ही छुट्टी की घण्टी बजती ,घर के आँगन के बाहर से ही हो-हल्ला करते हुए ,जहाँ-कहीं अपना अव्यवस्थित और मटमैला बस्ता , तख़्ती के साथ ही वहीं कहीं उल्टा-सीधा फैंक देते ! फ़िर सीधे मां के साथ लिपटने का बिल्कुल यही सिलसिला बरसों चलता रहा ! हाथ-मुहँ प्राय: काले-नीले लिये हुए ही आते घर हम सब ! कई बार तो मां की टाँगों से लिपटे-लिपटे ही मार भी खाई है….मग़र फ़िर वही बात कि ” दो पईय्याँ, किद्धर गईय्याँ …चार पईय्याँ स्हार लैईय्याँ ” हम सबपर पूरी चरितार्थ होती यह कहावत ! छुट्टी के समय किसी कारणवश यदि मां , घर पर नहीं मिलती या नहीं दिखती तो लगता जैसे दुनियां उजाड़ दूँ , किताबें फाड़ दूँ और गुस्से में बड़ी ” दी ” के बालों को बिना बजह झझकोरना मुझे अभी तक भी सालता है , टीस देता है ! किन्तु बहन के प्यार-दुलार में , मेरे लिये कभी कमी आई हो , नहीं कह सकता ! मां के आगे नँग-धड़ँग बैठ जाना नहाने के लिये तो रोज़मर्रा की ज़िन्दग़ी का अहम हिस्सा था , इस सिलसिले में कब बदलाव आया , पता ही न चला ! हाँ स्कूल से वापिस घर आकर बस्ते और तख़्ती के हवा में फैंक देने की परम्परा कब हवा हुई , नहीं पता है ! लेक़िन  मां का चेहरा-मोहरा अब भी वैसा ही दिखता है, जो होश सम्भालते ही दिखने लगा था ! आज भी उसकी आँखें वही प्रश्न लिये रहतीं हैं ” भूख़ तो नहीं लगी …..चल कुछ खा ले ”  मां की आँखों में अब तक भी वही प्यार ,वही दुलार सावन की फ़ुहारों सा बरसता है !
> हम भाई-बहनों में कम-अस-कम मुझे तो यह कभी महसूस नहीं हुआ कि मां का प्यार सिर्फ़ मुझे ही मिला हो ! मेरी बड़ी बहन का भी मां को पूरा ध्यान रहता ! उस ज़माने में भी , जबकि  लड़कियों को इतना महत्व ही नहीं दिया जाता था ! उसके बालों की कँघी-तेल ,और स्कूल से छुट्टी वाले दिन तो माँ उसके बाल बड़ी तन्मयता , तल्लीनता और गम्भीरता से देखतीं थीं ! पिता जी को कई बार मां पर चिढ़ते और कहते सुना था मैंने -” यह क्या आँगन में इसका सिर खोलकर देखने बैठ जाती हो तुम……..लोग समझते होंगे , इसे ” जूँ ” पड़ी है ! ” लेकिन मां उनका कहा , अनसुना करते हुए ,बस अपने काम में व्यस्त रहती ! हालाँकि बहन के सिर में कुछ होने न होने का प्रश्न ही नहीं उठता था ! मां हमारी ही नहीं , बल्कि सारे घर की सफ़ाई व्यवस्था और स्वास्थ्य का स्वंय ध्यान रखती थी ! मुँह अन्धेरे , नहा-धोकर , बुहार , झाड़ू-पौंछा और दिन भर के लिये पीने के लिये पानी उबाल कर रखना मां की दिनचर्या में शामिल था ! फ़िर उसपर यदि कोई
खास दिन-त्यौहार , उत्सव , पर्व होता,  तो फ़िर बात ही क्या ! सारे परिवार की ” लाईन ” लगा देती थी मां !  – ” सारे मिलजुल कर घर की सफ़ाई करेंगे कल सुबह से ही ”  और बस यह आदेश दशहरा-दिवाली या फ़िर किसी भी त्यौहार-उत्सव से पहले समय रहते हो ही जाते ! गली-मौहल्ले में भी साफ़-सफ़ाई के मामले में , जहाँ भी सफाई की बात होती , मां का ज़िक्र ज़रूर होता ! मुझे पता है आस-पड़ोस की कुछ बातूनी औरतें मां से कटतीं थीं , लेक़िन मां की बला से ! मां  तो बस ” अपने काम से काम ” रखने के मुहावरे को हमेशा की ही तरह चरितार्थ करते नज़र आई मुझे ! समय में कई बदलाव आए , किन्तु मां के स्वभाव , मां के रवैय्ये या मां की दिनचर्या में कोई अन्तर आया हो , नहीं कह सकता ! बड़ी बहन को डाक्टर बनाने और उसकी घर-गृहस्थी बसाने के बाद मां ने ,  मेरी शादी की जो ज़िद्द लेकर बैठी तो , मुझे घोड़ी चढ़ाकर ही दम लिया ! शादी के समय ” दुद्धु-घुट्टु ” जैसी एक रसम , एक रिवाज़ के मुताविक दूल्हे के घोड़ी चढ़ने से पहले मां द्वारा , बेटे को अपने वक्ष से दूध पिलाए जाने का ” शगुन ” निभाते वक्त , मुझे हिचकिचाता देख मां बोली ” चल-चल , जल्दी कर मुहुर्त निकला जा रहा है ”  और अपना वक्ष मेरे मुहँ में स्पर्श करवाते , महिलाओं का हँसना , मुझे अभी भी एक अनौखी सी झुरझुरी देता है ! घर की दहलीज पर मां की ओर से नई नवेली दुल्हन का स्वागत ” आरती ” उतार कर किये जाने से लेकर , एक अच्छी , एक कुशल , एक सुशील और सँस्कारी नारी होने का अर्थ घर की दहलीज पर पाँव रखती बहु ने जैसे अनायास ही सीख और समझ लिया था ! दो-चार दिन शादी का माहौल ख़त्म होते ही मां ने नवेली बहु को कुछ भी समझाया-बुझाया नहीं ! लेक़िन अपनी सासु मां से , बहु ने सारे सँस्कार , अपनी जिम्मेवारियाँ ,अपने दायित्व कब ग्रहण कर लिये , समय ने पता ही नहीं चलने दिया ! फ़िर ज़िन्दग़ी के पड़ाव में कई होनी-अनहोनी घटनाएँ घटीं , किन्तु मां कभी विचलित हुई हो , कभी अनुभव नहीं किया ! यहाँ तक कि पिता जी के देहान्त के बाद भी मां कुछ टूट ज़रूर गई थी ! जाते हुए वक्त के साथ ही मां ने आते हुए हर अच्छे-बुरे समय का सामना और स्वागत बड़ी ग़र्मजोशी और बड़ी संजीदगी से किया ! आज मेरे दोनों बच्चों में  ” दादी मां ” यानि मेरी मां मेरे बच्चों  में मुझे ही तलाशती नज़र आती है ! और वहीं  अपनी पत्नी में मुझे आज अपनी मां की छवि स्पष्ट झलकती है ! ठीक वैसे ही , जैसे स्कूल जाते हुए मां मुझे एकटक निहारती रहती थी ! वैसे ही अपने दोनों लाडलों को पाठशाला भेजते हुए , उन्हें जाते देखती है मेरी अर्धांगिनी ! समय बदला हो , या रिश्ते भी बदल गए हों , लेक़िन मुझे ही नहीं हम सबको लगता है कि सिर्फ़ और सिर्फ़ अब तक भी ” मां ” नहीं बदली ! और शायद यह कभी बदलेगी भी नहीं , बस सिर्फ़  ” मां “~~~~~ ~~~~~~~~~~~~~! ” ———–राजेन्द्र पालमपुरी -सेवानिवृत शिक्षा अधिकारी – मनाली – ज़िला काँगड़ा – हि०प्र० – 9805546753 / 7018903315

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