#Kahani by Sanjay Kumar Avinash

डरकडोर

माँ थी! पूर्ण माँ!  एक-एक कर तीन बेटियों की माँ। शादी के चार-पांच वर्षों के अंदर ही दो-तीन-चार से पांच हो गई। उस समय खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही थी,  जब सौरी घर के करीब से आवाज आई, “अरी! लक्ष्मी आई है”, वहीं आदित्य के पिता बोल रहे थे, “चलो, ठीक-ठाक से हो गया न….. पुत्र होता तो अभी से जश्न मनाना शुरू कर देता…. फिर भी कोई बात नहीं, बेटी है तो क्या हुआ…. थोडी परेशानी बढेगी।”

उसी समय सासू माँ बोली, “आप चिंता न करें, रास्ता खुल गया न, सब भगवान की कृपा है।”

फिलहाल एक की बातों में मातृत्व की प्राप्ति थी तो दूसरे की नजरों में अभी नहीं;  पुत्र प्राप्ति के बाद संपूर्ण माँ कहलाती है।

नीमा जो साधारण परिवार से थी। मायके लगभग दस-बारह किलोमीटर की दूरी पर। घर की बडी बेटी थी, उम्र लगभग 16-17 वर्ष।गरीबी ने जवान बताया और मजदूर पिता ठीकठाक लडका देख शादी कर दिया। शादी के उपरांत ही आदित्य के माता-पिता यह कहकर घर बसाने के लिए जिद मचा दिया कि खानदान में एक भी बेटी नहीं है, अब तो बेटी हो गई, मेरे साथ ही रहेगी। न चाहते हुए भी नीमा के घरवालों ने विचार किया और फैसला हुआ कि बेटी तो पराई होती है, उसका परिवार है, जहाँ चाहें, वे रखें। एक न एक दिन तो उसी घर में रहना है। और राजी हो गए, नीमा ससुराल रहने लगी।

*

वर्ष भी नहीं होता कि मोटी लगने लगती। घर भर में खुशी होती थी, इस बार वंश बढाने वालों की उत्पत्ति होगी। फिर सबकी निगाहें नवें महीनों पर। कानाफूसी भी होती थी,  न जाने कब पूरा होगा, फिर आपस में बातें होती, “अरे! फिर विलंब हो रहा है, बेटी ही जन्मेगी।न जाने कैसी अभागिन घर में आ गई है, कर्ज ही पैदा करने के लिए उतावली है। इस बार भी अगर बेटी हुई तो, आदित्य के लिए विपत्त ही है।”

कुछ ही दिनों बाद ईश्वर ने सुन लिया और दर्द शुरू हो गया। इस बार सास-ससुर जी आसपास नहीं मंडराते थे। वे दोनों सोच रखे थे, शुभ समाचार सुनने के बाद ही घर आऊंगा। पडोस की दाई आई और कुछ ही घंटों में खबर फैला दी, “लक्ष्मी आई है।” सुनते ही मातम तो छा गई, लेकिन विकराल रूप धारण करना बाकी था। सासू माँ लक्ष्मी आने के आठ-दस घंटे बाद घर आई और अनमने ढंग से बोलने लगी, “भगवान भी गजबे है, किसी को बेटा पर बेटा देता है तो किसी को बेटी, सिर्फ बेटी। अरे! जोडी तो लगा देते, एक बेटी-एक बेटा। जिनगी कटते रहता। आज के जमाने में दो-दो बेटियां पहाड उठाने जैसा है?” फिर शांत हो गई थी।

लगातार दो बेटियों ने मेरे लिए अभिशाप तो घरवालों के लिए चिंता का विषय बना दिया। उसी समय फोन की घंटी बजी और सासू माँ फोन उठा, बेटे आदित्य से बोलने लगी, “बेटा, तुमरे माथे एक और बोझ बढा दी है। न जाने किस पैरा की लडकी से बियाह हुआ है। मैं बोला करती थी, अभी शादी बियाह नहीं करना है। पढ-लिखकर कोई ढंग का काम मिले तो संस्कारी परिवार में शादी होती। लेकिन मेरा सुनने वाला कौन? उस समय तो पिताजी बोल गये, गरीब घर की लडकी है, सुशील है।अब भला गरीब घर व सुशील ही वंश को बढाएगा? एक ऐसी होती है, जिसके कदम पडने मात्र से ही पूरे घर में बदलाव आ जाती है,  सुख-चैन की जिन्दगी मिल जाती है। और यह नीमा? नाम भी नीम की तरह कसैला। फिर एक बेटी जन्मी है। आशा, विश्वास, मनौती पर भी पानी फिर गया है। सब बेकार गया। आज तक मेरी मांग को देवी माँ नहीं ठुकराई थी। जब तुम पेट में था तो, छठ मैया से मांगी थी, एक सूप चढाने की बात कही थी और एक ही सूप में तुम तीन-तीन भाई हो। लेकिन इस बार….. क्या बताऊँ। ठूँठ पेड भला जो जलावन में भी काम आए, लेकिन यह….? आदित्य, एक बार और देख लो, इस बार जगह बदल देंगे। ऐसे जगह का क्या दोष, फिर भी बूढा-पुरान कहते हैं।”

आदित्य की आवाज नहीं आ रही थी। हालांकि मैं उन्हें जानती थी, समझती भी थी। बेटी होने से उन्हें कोई तकलीफ नहीं। वे समझदार थे।यह तो बेरोजगारी की देन है और कम उम्र में शादीशुदा होने की सजा जो दिल्ली जैसे शहरों में काम करने के लिए मजबूर हो गए। माँ की बात सुन कर हताश हो गई थी। ठूँठ पेड तो और भी विस्मित कर गई। हाँ, आखिर में यह भी आवाज आई थी, “अभी परसौती घर में है, बाद में बात कर लोगे।” शायद आदित्य बात करवाने की इच्छा जताई होगी। वे दिलाशा जरूर देते। हताश होने को नहीं कहते, लेकिन उनकी इच्छा को दबाकर फोन काट दी थी, सासू माँ ने। अब मैं उस दर्द को भी परखना चाह रही थी,  बेटे को जन्म देने में और बेटी में। इन दोनों बेटियों से सैकडों गुणा अधिक भी दर्द हो तो सहन कर लूंगी। पूर्ण माँ तो कहलाऊंगी। ठूँठ से भी निजात मिल जाएगी।

धीरे-धीरे जख्म भरता जाता लेकिन उसकी गहराई से औरों को आभास होता कि कभी जख्म हुआ था। उस दिन तो घुट-घुट कर रह गई थी, जब ढोलकिया के साथ दो नचनिया भी आए थे। संयोग से ससुर जी घर में ही थे। जब से दो बेटी की माँ बनी थी, तब से एक धक्का देने के लिए आ ही धमकते थे। ढोलकिया को देखते ही सासू माँ से बोले, “पमरिया आया है, अब देखो न, एक तो साले-साल करमघट्टी जनमती है और ऊपर से ठगने वाला आ पहुंचता है। बेटा रहे तो अपना दहेज वाला थरिया भी दे देता, इसके लिए काहे को परेशान होऊं। तू अपना संभाल लेना।” इतना बोल पिछवाडे से निकल गये।उन दोनों के आंगन में प्रवेश करते ही गाना-बजाना शुरू हो गया। सासू माँ झुंझलाती हुई बोली, “अभी जाईये, रिलेशन में घटना घट गई है, ई सब सुहाती नहीं।” फिर भी वे दोनों जिद मचाये हुए थे, लक्ष्मी जो आई है। ढोलक पर ताल दे, बोल रहा थे, “मैया, तू दादी बन गई है, इसी से संसार है, भगवती समान बौआ है, सबको उद्धार कर देगी।” फिर भी सासू माँ छमकती हुई बाहर चली गई।

उसके बाहर जाने के बाद, मेरी गोद से बाबू को ले लिया और दोनों नाचने लगे।मुझसे भी कहने लगे, “तू तो मैया है न…. तुझसे ही इसका जीवन है, तू निर्मात्री है, देवी! दे दे अपना पायल। वरना, नन्हीं देवी को लेते चला जाऊँगा।”

उसकी बातें सुन, असमंजस में पड गई। कुछ विलंब के बाद ही नन्हीं को लेकर जाने लगे। मेरी छटपटी बढ गई। उसे रोका और गुहार लगाती हुई बोली, “मैं क्या दूंगी, घर के मालिक तो हैं नहीं। वे तो बाहर रहते हैं।” वे दोनों कुछ भी सुनने से इंकार करते रहे और बाबू को लिए आंगन से बाहर जाने को कदम बढा दिया।आखिरकार मैं एक साडी और काफी जिद मचाने के बाद एक जोडी बिछिया जो मेरी माँ छुपा कर दी थी, उसे देते हुए विनती किया और बाबू को अपने पास पा खुश हो गई। वह भी मेरी मजबूरी को भांप चुका था, साडी और बिछिया को नन्हीं के साथ, मेरे माथे पर निहोछ कर, खुशी-खुशी जाते हुए कहता गया, “भगवान ने माना तो इस बार सोने की अंगूठी लूंगा।” क्षण भर के लिए खुशी तो हुई, लेकिन सोने की अंगूठी सुन, निगाहें वर्षों पुरानी पेटी को झांकने लगी।

चार-पांच महीने बाद आदित्य भी घर आ गया। उन्हें आना था छठ पूजा में, लेकिन घर की रवैया देख आना जरूरी समझा। माँजी, पिताजी से थोडी बहुत बातचीत के बाद संध्या पहर मुझसे भी बातें हुईं। उन्होंने हँसी-मजाक में ही कहा, “जानती हो नीमा।” इतना बोलने के बाद चुप हो गए। शायद मेरी उत्सुकता को भांप रहे थे। मैं भी उनकी बातों को सुनने के लिए एक टक से मुंह निहार रही थी। आंखों के साथ कान भी लगाई हुई थी, कि वे बोल पडे, ‘मियाँ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी।’ सुनते ही मेरी हँसी निकल आई और वे बाबू को लेकर आंगन में घूमने लगे। नन्हीं की आंखें भी टकटकी लगाई हुई थी। कभी छटपटाने लगती तो कभी पहचानने की जिद में निहारती भी थी। उम्र भी छह-सात महीने की हो चुकी थी।

माता-पिता से बराबर बातचीत होती रहती थी। पिताजी तो एक ही रट लगाए थे, पंद्रह-सोलह साल में जवान होगी, इससे पहले बडी बेटी अंतिका हो जाएगी, अभी शादी में लाखों खर्च, न जाने उस समय कितना……. दो-दो बेटी हो गई है, जीवन भर खून सूखाते-सूखाते बूढा हो जाओगे। तुम तीन भाई ही थे, तब तो मेरी हालत खराब हो गई। पढाई-लिखाई बडी जतन से किया था, लेकिन न जाने ऊपर वालों को क्या सूझा, तुम तीनों भाई नौकरी से दूर ही रह गए। बेटी रहती तो न जाने और क्या होता?” उनकी बातें सुन, आदित्य एक ही जवाब दिया, “किसकी बेटी कुंवारी है?” इतना सुनते ही ससुर जी तुनक कर घर से बाहर निकल गये थे। फिर सासू माँ आ धमकी, वह भी वही बात बोलने लगी, “किस घर से उठा लाए हो, इसकी माँ भी पांच-पांच बेटी जन्माई है। आखिर नसल तो उसी का है न?”

आदित्य कुछ बोलना चाहा लेकिन, ‘सांप छछूंदर वाली गति’ में अटक गया। माँ बोलती रही और वे सुनते रहे। आखिरकार माँ बोल ही गई, “अब जाओगे तो इसे भी साथ लेकर जाओगे, बूढा-पुरान कहते हैं कि जगह बदलने से भी शुभ काम होता है। बेटी तो पराई घर की होती है, बेटा तो कंधा देगा।” फिर आंचल फैलाकर दोपहरी की धूप में बुदबुदाने लगी, “हे सूरज देवता, एगो पुत दै दहो।” फिर मेरी ओर इशारा करती हुई बोलने लगी, “इतना भी अकल नहीं कि भगवान से मनौती मांगू. …. भला, बिना मांगे कौन देता है?”

इसी प्रकार चर्चाएं होती रहती थी।

कुछ ही दिनों बाद आदित्य काम के लिए दिल्ली निकल गया। जाते-जाते बोलते गये थे, इस बार दिल्ली बुला लूंगा।उनके जाने के बाद ही ‘आठो पहर सूली पर रहना’ नियति बन गई। हर हमेशा बेटी, बेटी, बेटी। बातों को सहती हुई, महीनों गुजारती रही। फिर वही, जैसे हर सुबह होने पर सूर्य की लालिमा से दिन होने का अहसास होता है, लेकिन मेरे लिए तो सूर्य की लालिमा आग की तरह जलन पैदा करने लगी थी, डर समाई रहती थी, कहीं काली घटाओं के बीच फंस न जाऊँ।इससे अच्छा होता कि अब कोई बच्चा ही न हो। कहीं फिर बेटी हो गई, तब? इसी सोच के साथ, इनलोगों से दूर आदित्य के पास जाने को ठान ली थी। घरवाले भी तो यही सोच रहे थे।

महीना बाद आठ माह के पेट लिए जाने को तैयार हो गई। ससुर जी किऊल रेलवे स्टेशन छोडने आए थे।दिल्ली जाने वाली ट्रेन बिक्रमशिला भी समय से दो घंटे विलंब थी।ऐसे तो हावडा-दिल्ली मेन लाइन होने के कारण घंटे में चार-पांच गाडी गुजर जाती थी, लेकिन हमलोगों के लिए बिक्रमशीला ही अच्छी गाडी थी। प्लेटफार्म पर पहुंचते ही उन्होंने कहा, “कनियन, आदितवा के फोन कैर देलिए। ऊ प्लेटफारम पर आय जैतैय।” और हिदायत भी दे रहे थे, “दुजीबा छो, रेल पर सरकार सब सुबिधा करने छैय, इन्ने-उन्ने उतरहियो नैय।” इतने में गाडी की सीटी बज गई, और वे टिकिट के साथ सौ रूपये देते हुए कान के पास हौले से बोले, “एकरा संभायल के रखियो। आर, ई जे सौ रुपया छौ, अप्पन जी-मुंह समेट के जमा कैलिए। पोता के लिए एगो करिकबा डरकडोर आर एक नंमर वाला करूआ तेल खरीद लिहो, ओकरे से मालिश करिहो।” तब तक गाडी आगे बढ चुकी थी, उनकी आवाजें हवा के साथ बहती जा रही थी।

किऊल रेलवे स्टेशन से दिल्ली की दूरी तय करने में लगभग 20-22 घंटे लगती थी। दूरी भी लगभग 1100-1200 किलोमीटर। ट्रेन पर बैठे लोग एक बार ध्यान से निहारते जरूर। दरअसल,  अकेली थी और गर्भ से भी। भला सात-आठ माह के पेट लिए कहाँ छुपाती।मेरी दशा देखकर सवार एक पैसेंजर ने बैठने की जगह बना दिया, मैं बैठ गई। अगला स्टेशन बडहिया में उतरते हुए, उन्होंने कहा, “बेटी, आपकी स्थिति खडे-खडे जाने लायक नहीं है। सीट को छोडना मत, वरना, कोई आकर बैठ जाएगा, मानवता मिट चुकी है।” उनकी बातों में मेरी भी सहमति थी। हामी में सिर हिलाती रही। फिर नीचे उतरते हुए बोले, “घर परिवार खत्मे होगा, भला ऐसी स्थिति में अकेली स्त्री को दिल्ली भेज दिया।”

जनवरी का महीना था। पानी की भी जरूरत नहीं। हाँ,  बाथरूम जाने के समय बगल वाले को बोलकर जाती थी और वे मेरी दशा बता सीट को संभाले रखते थे। पूरे रास्ते मुंह-कान को दबाये, बीच-बीच में बगल वालों से पूछती, “अब कितना दूर है?” सहयात्री जानकारी देने के लिए खिडकी की ओर झांकते और बताते अभी दूर है। कुछ घंटों बाद किसी और को पूछती तो वे झुंझलाहट के साथ बोल देते, “चिंता काहे करती हो, हम भी वहीं जाएंगे।” मैं चुप रह जाती। जेनरल डब्बे होने के कारण नींद भी नहीं आती, घुनुर-घुनुर भरो रास्ते होती रही। सुबह की आहट देख लगा, अब पहुंच जाऊंगी। आदित्य से भी सुना करती थी, सुबह आठ-नौ बजे पहुंच जाता हूँ। गाडी दिल्ली स्टेशन पहुंचने वाली थी।लोगों में उतरने के लिए आपाधापी शुरू हो गई। सभी अपने-अपने समान को इकट्ठा करने लगे। मेरे पास तो कोई बैग-बक्सा नहीं, एक थैला था, जिसे आदित्य दिल्ली से ही कभी लेते गये थे; उसी में दो साडी, पेटीकोट, व ब्लाउज के साथ एक चादर रख ली थी। खाने के लिए भी एक पन्नी में चार-पांच रोटी व सब्जी जिसे खाया भी नहीं गया। गाडी धीमी गति से चल रही थी और अचानक झटके के साथ रूक गई। खडे-खडे आदमी एक दूसरे से टकराने लगे। तब तक मैं बैठी हुई थी, मेरी ओर गिरते-गिरते एक को बगल वाला संभालते हुए कहने लगा, “अरे! गाडी तो रूकेगी, जान काहे दे रहे हो?” वह आदमी मुडकर उसे देखा और आंखें तरेरते हुआ बोला, “बे, तेरे को नैई उतरना है तो मत उतर, मेरे को जाना है।” पहली बार महसूस किया कि बिहार से दिल्ली पहुंच गई हूँ। उनकी भाषा सुन, गांव की याद आ गई, जब कोई पडोस के लडके कमा कर घर पहुंचता था तो ऐसे ही तेरे को-मेरे को बोलकर कमाऊ होने का परिचय देता था। चार-पांच मिनट के अंदर ही गाडी खाली हो गई। खिडकी से कई लोग झांककर आगे बढ जाते थे। आदित्य भी खिडकी-खिडकी झांकते हुए पहुंच गया। उसकी नजर पडी और आवाज लगाई, “नीमा।” दो दिन का सफर की परेशानी नाम सुनने मात्र से फुर्र हो गई। फिर हम दोनों घंटे भर के अंदर उस मुहल्ले, जिसे गौतमपुरी, बदरपुर के नाम से जानते थे। अब तक की कूढन समाप्त हो चली थी। अब कोई फिक्र नहीं कि बेटी जन्मे या बेटा। हाँ, ससुर जी ने आते समय जो कहा था, उन बातों पर ध्यान लगी हुई थी।

गौतमपुरी, जिसके विषय में आदित्य बोला करते थे, उससे तो काफी अलग है। बगल में बीटीपीएस, कैंपस के अंदर ही आयुष महाविद्यालय, छोटी-छोटी जगहों में तीन-तीन मंजिले मकान, बाजार में भी काफी भीड, जो अपने मेदनी चौकी, लखीसराय में नहीं। सभी गलियों में चार चक्कों वाली गाडी, जिसे अपने यहाँ शादी-बियाह में भी देखने को नहीं मिलती थी। कल तक इन्हीं से सुना करती थी, झुग्गी-झोपडी कहा करते थे। झुग्गी नाम सुनकर ही सोचने लगती थी, गांव से बाहर डोम का घर बता, समझाते थे, वैसा ही होता है। तब तो आना नहीं चाहती थी। देखकर दंग रह गई, वैसा तो है नहीं। झुग्गी नाम सुनते ही सोचने लगती थी, घर परिवार को चलाने के लिए न जाने कितनी मुसीबतें झेलनी पडती है। यहाँ आकर समझ पाई कि यह तो शहर जैसा है। उनसे पूछने के बाद सभझाने लगे, “जितनी भी गाडियां देख रही हो, ये सब संध्याकाळ से सुबह दस बजे तक दिखाई पडेगी। इसमें से अधिकांश गाडी बडे लोगों की है। यहाँ के ड्राइवर होते हैं, जो छुट्टी के समय गाडी साथ लेकर आ जाते हैं। यह जो चमक-दमक देख रही हो, सब मेहनत का प्रतिफल है।” उनकी बातें सुन, मेहनत में पर ध्यान चली जाती थी। एक दृश्य से पुष्टि होती थी कि यहाँ कम पढे लिखे लोग होते हैं, बच्चों की भीड उम्मीद से अधिक देखती थी।

आदित्य सुबह-सुबह अपने काम से ऑफिस चले जाते थे। हालांकि ऑफिसर नहीं थे, ऑफिस में ही काम करते थे। नये-नये होने की वजह से दिन भर यूं ही समय काटना पहाड जैसा था। बडी बेटी अंतिका व छोटी अवंतिका को ससुर जी ही रख लिए थे। अवंतिका बहुत छोटी थी, लेकिन दादा-दादी से हिल-मिल गई थी। उसकी यादें भी सताती थी, लेकिन उन्हें नाराज भी नहीं कर सकती न। ट्रेन पर भीड बता, छोटी को भी साथ रख लिए थे।

एक दिन अचानक उनकी अनुपस्थिति में ही दर्द शुरू हो गया। पडोस वाली दीदी अच्छी थी, उसके विषय में मुझे बता दिए थे, कैसी भी परेशानी हो, बुला लोगी। जबकि मेरे आने के बाद कभी आती भी नहीं थी, उनके अनुसार ही स्वाभाव से अच्छी थी। उन्हें बुलाकर बताई और वह तुरंत एक ऑटो वाले को बुलायी, झटपट हो आठ-दस किलोमीटर सफदरजंग अस्पताल पहुंच गई। ऑटो से उतरते ही दर्द में कमी आ गई। ज्योंही अस्पताल गेट के अंदर महिला वार्ड तक पहुंचने ही वाली थी कि पानी से पूरी साडी भींग गयी। न जाने इतना पानी कहाँ से आ गया, इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। साथ वाली दीदी वहीं बैठा दी और वह तेज कदमों से आगे बढ गयी। कुछ ही मिनटों में किसी को साथ लिए पहुंच गई। फिर तो अस्पताली काम शुरू। एक-एक कर कई लोग आते गये। कोई पूछताछ करके चला जाता तो कोई सूई लगाकर।अंदर से गुस्सा भी आता, आखिर इतने-इतने लोग क्यों आते-जाते हैं। पहले भी माँ के साथ अपने यहाँ अस्पताल गई थी। इतना तो नहीं आता था। तीन-चार घंटों तक सूई-सलाईन, तो देख-दाख होता रहा। जितना दर्द पहले वाली डिलिवरी में हुआ था,  इस बार सभी गायब। मानों, मैं शौकिया दिल्ली का अस्पताल देखने आ गई। उनलोगों की कानाफूसी सुन रही थी, एक सफेद शर्ट में महिला जो हाथ में आला और उसी हाथ की अंगुली में कलम को पकडी बोल रही थी, “दर्द बढने के लिए हरेक सूई लगवा दी, फिर भी—- यूट्रस भी डायलेट हो चुका है।” ललाट को खुजलाती हुई साथ खडे सहकर्मी को इशारा दी और आगे बढ गयी। संभवतः ऑपरेशन वाली बात कही थी। मुझे तनिक भी मालूम नहीं, क्या होगा। इसी बीच वार्ड में एक पुरूष आया और सेविंग की बात करने लगा। मैं शरमा गई। भला, एक महिला को पुरूष के द्वारा सेविंग ….? उसे डांट कर भगा दी। वह बुदबुदाया, पगली है, किसी देहात से आई होगी। और चला गया। कुछ ही देर में उसी के साथ एक महिला आई और अब मुझे डांटती हुई बोली, “पागल हो गई हो। तुम्हारे लिए कोई डॉक्टर आएगा क्या? करने दो।” मैं फिर भी तैयार नहीं हुई थी। आखिरकार साथ वाली दीदी और उस महिला के सामने वही मर्द ने सेविंग किया। उस समय तो अजीब घबराहट महसूस कर रही थी, जब दूर से ही उसके मुँह से दारू की बू आ रही थी। शायद साफ-सुथरा करना उसी का काम रहा होगा।सकुचाती रही और वह अपना काम करता रहा।साथ वाली दीदी जो बोली-विचार से बिहार की लग रही थी, लेकिन थी वह यू.पी से। वह मुस्कुराती हुई बोली, “अटका बनिया देय उधार।” मैं चुप रही, मुस्कुराना गांव के हिस्से नहीं। अब ट्रॉली पर लिटाकर एक दूसरे वार्ड से होते हुए, कही खून जांच के लिए सैंपल तो कहीं वरिष्ठ चिकित्सकों से गुजरना होता। आखिरकार एक लिफ्ट के अंदर गई और सनसनाता हुआ किसी वार्ड के दरवाजे तक पहुंच गई। अंदर पहुंचते ही लाईट से मुलाकात हुई। प्रकाश गजब का था। हाँ,  दवाई की गंध से उल्टी जैसा महसूस किया। वहाँ भी टेबल पर लिटा दिया और एक-एक कर दो सूई कमर में लगाया। फिर एक डॉक्टर ने कहा, “नीमा, हाथ उठाओ।” अब मैं मानसिक तौर पर कहीं खो गई थी। कितना भी कोशिश किया हाथ ऊपर उठ ही नहीं रहा था। फिर पैर उठाने को कहा गया, पैर भी नहीं उठा पाई। मानो, गले से नीचे कुछ है ही नहीं। कुछ ही घंटों में ऑपरेशन समाप्त। कानों तक आवाज आ रही थी, “नन्हीं परी है। स्मार्ट डाटर्स।”

गेट के पास कुछ लोग खडे थे, जिन्हें देख पा रही थी, किसी को पहचान नहीं रही थी। घरवालों की भांति ही उनमें मायूसी झलक रही थी। पता नहीं इनलोगों को कैसी तकलीफ।ये सब मैं महसूस कर रही थी। इसलिए भी कि मन-मस्तिष्क तो काम कर ही रहा था। ऑपरेशन समाप्त होने के बाद ही डॉक्टर बाहर निकल गये, कुछ कर्मी मेरे पास ही ठहर गये। इशारे-इशारों में बात हुई और ओ.टी के बाहर खडे लोग निराशा को साथ लिए चले गए। शायद बेटी सबके लिए परेशानी की सबब हो। ट्रॉली पर बगल में नन्हीं को लिटाए मैं भी थी। ट्रॉली मेन बाहर किसी वार्ड में ले जाने के लिए तैयार था। सामने आदित्य को देख मेरी निगाहें छुपसी गई। अब उसे बेटा कहाँ से दूंगी। ट्रॉली के पीछे-पीछे वह भी वार्ड तक आए। मेरी मायूसी देख, समझाने लगे, “अरी! चिंतित क्यों? तुम्हारी मर्जी से थोडे संभव है? ईश्वरीय कृपा है नीमा! मैं समझ रहा हूँ।” उनकी बातों से साहस बढी। फिर मेरी आवाज निकली, इस बार ईश्वर जरूर सुनेंगे।

आदित्य मुस्कुराता हुआ कहा, “ना-ना! महिला बच्चे जनने की मशीन थोडे है….. अब यही तीनों मेरे लिए बहुत है। ईश्वर को भी मना कर दिया। घरवालों की बोली और तुम्हारी सहनशीलता, मुझे चुप रहने के लिए मजबूर कर दिया, नीमा! इसलिए कि ‘अपना पैसा खोटा तो परखैया का क्या दोष’……… मेरे अपनों में ही दोष था।”

क्षण भर के लिए आवेग से भर आई और अपनी ताकत भर जोर से बोली, “क्या? परिवार नियोजन भी हो गया, मेरी सहमति के बिना?”

आदित्य ने हाथ बढा, मेरे मुँह पर रखते हुए कहा, “नीमा! मेरी मर्जी से। तुम्हारी आत्मा पर मेरा अधिकार नहीं। क्या आत्मा को भी देह की बटखारों से तौलती हो? जब तुम ओ.टी में प्रवेश कर गई थी, तब तक मैं भी पहुँच गया था। डॉक्टर बोल रहे थे, अभी रहने दें, एक पुत्र तो हो जाए, लेकिन मैं नहीं माना और सहमति पत्र पर दस्तखत कर दिया. ……।”

आदित्य की बातें सुन, पलक पसारे निहारती रही मैं। पुरूष होने की मानसिकता को भांपती रही। तत्क्षण ससुर जी वाली कही बात याद आई। इधर-उधर हाथ बढाना चाही, अब तक भी हाथ-पैर काम नहीं कर रहा था। मेरी चहलकदमी को वे समझ गए थे। बताए गए साडी की पल्लू को खोले, उससे सौ रूपये के नोट निकालकर मुझे देने लगे।

मेरी आवाज में नमी ही थी, आदित्य से बोली, “पिताजी आते समय दिए थे और बोल रहे थे, “मेरे पोते के लिए डरकडोर और बढिया वाला करूआ तेल………..।”

आदित्य मुस्कुराने लगा। मैं असमंजस में पडी रही, मैं हूँ कहाँ, आदित्य तो सामने है, ससुर जी की कही बातों में अटक गई थी।

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