#Kahani by Sanjay Kumar Avinash

कल किसने देखा🌹

मन-मस्तिष्क में अठखेलियां जब हुंकार भरने लगे तो उसे नजरअंदाज करना संभव नहीं। आज भी उस रात की याद आती है तो मन व्याकुल हो उठता। नस-नस में कंपन शुरू हो जाती; मेरी जिन्दगी में अनायास आई और चली भी गई। अप्सरा या कोई देवी नहीं, वह मेहनत व मजदूरी करने वाली, सुशील व कर्मठ महिला थी, जो अपने साथ दो-दो बच्चों के भी बोझ उठा रखी थी। सुबह उठकर घर का काम करके, दोनों बेटी को साथ ले, निकल जाती। बडी बेटी गुनगुन को रास्ते में सरकारी स्कूल में छोड देती थी, जो तीसरी कक्षा में पढती थी। छोटी बेटी मुन्नी को आंचल से लपेटे, खेत तक साथ रखती। यह कहानी है उन दिनों की जब राहुल 17-18 वर्ष का था, अब तो 15बसंत और जुड गया। उसी बीच राहुल खेत आया और गहरी निगाहों से देखने लगा। उसकी टकटकी निगाहें घंटों तक लगी रही। पास में ही घर से आवाज आई, “राहुल! बेटा राहुल! कहाँ हो? आकर खाना तो खा लो।”

यह आवाज राहुल की माँ की थी।आती आवाज को नजरअंदाज करना राहुल के हिस्से में नहीं। झटपट घर के अंदर गया और माँ से बोला, “खाना तो मैं बाद में भी खा सकता हूँ। इतनी परेशान क्यों हो रही हो? कितना अच्छा देख रहा था, वो कितनी खूबसूरत है।” धीमी आवाज में बुदबुदाया।

“किसकी बातें कर रहे हो? कौन खूबसूरत है?” माँ बोली।

राहुल चुप हो गया और क्षण भर में बोला, “कोई नहीं।”

इसी तरह प्रत्येक दिन खेलने के बहाने खेत की ओर आता और भरी निगाहों से काम करने वाली महिला को देखता रहता। जब माँ की आवाज कानों से टकराती तो मन-ही-मन लाल हो जाता।

माँ राहुल से पूछने लगी, “रोज-रोज बाहर क्या देखने जाते हो? कौन खूबसूरत है?”

राहुल जल्दबाजी में बोल दिया, “चिडिया है, जो बहुत खूबसूरत है,  मनमोहक भी। उसे ही देख रहा था। अपने पीछे वाले खेतों में रहती है और एक सुंदर-सा बच्चा भी साथ में है।”

मां बिना सोचे, मुस्कुरा दी। राहुल भी मुस्कुरा, बातें बंद कर दिया।

दूसरे दिन भी वह खेत आई। हरेक दिनों की भांति मुन्नी को पेड के नीचे, फटे-पुराने कपडों के टुकडे को बिछाकर सुला दी और अपनी साडी के पल्लू को घुमाकर, गांठ बना कमर के अंदर खोंस ली। लंबे बालों को भी जूडा बना समेट ली और खुरपी के साथ काम में मगन हो गई।

दीवार की ओट से देख- देखकर राहुल प्रफुल्लित हो रहा था।

उल्टे हाथों से जब पसीना पोंछती तो पूरे गाल पर एक अलग रंग दिखाई पडता। मानो, सतरंगी के बाद भी कोई रंग उतर आया हो। धूप में काम करती रहती और पसीने को भी ठहरने नहीं देती।

अब इन्द्र भी खुद को रोक नहीं पाए और कृपालु न होकर आतुर हो गये। गर्जना के साथ जब बादलों ने बूंदें रूप में सिर को चूमते हुए, गालों पर ठहरती न नजर आई तो राहुल सुकून महसूस किया। इधर कमला को चिलचिलाती धूप में, बारिश की बूंदों ने शीतलता प्रदान करने में मदद पहुंचाया। जैसे ही बूंदें नासिका पर क्षण भर के लिए ठहराव बनाई, राहुल के मन में इन्द्र के प्रति अपार स्नेह प्रस्फुटित हुआ।फिर तो होंठों से होते हुए, गोल-मटोल उरोज के बीच से खिसकना चाह रहा था। मानो, रास्ता खुद अख्तियार कर लिया हो।यह देख राहुल भाव-विभोर हो चला, खुद को रोक नहीं पाया और भीगता हुआ कमला के करीब आकर बोला, “कमला—मैं–।”

कमला राहुल को देखती हुई बोली, “क्या? इस बारिश में यहाँ?”

राहुल बिना कुछ समझे उदगार को बाहर निकालना चाहा, “मैं तुमसे प्रेम—-।” फिर रुक गया।

ऐसी बातें सुन कमला हताश हो गई, और बारिश की बूंदों को भी लील गयी। राहुल की अपूर्ण में पूर्ण अभिव्यक्ति। राहुल की निगाहें नीचे की ओर हो चली।

कमला राहुल को देखती रही और बोल भी रही थी, “ऐ बाबू! हम विधवा हैं,  दू-दू बच्चा भी और उमर में भी डेढगुनी। आपके माथे पर जमींदारी की रेखा भी। भला हमरे साथ ई प्रेम कैसा?”

“यह आत्मा की आवाज है। मन से तुम्हें मान चूका हूँ; इसमें उम्र और जमींदारी की बात कहाँ से आ गई? क्या तुम्हें पसंद नहीं?” राहुल ने कहा।

कमला सोच में पड गई। आनन-फानन के साथ मुन्नी को उठाई और घर की ओर चल दी। घर पहुँच कर सोचने लगी, हो क्या रहा है। अब मैं क्या करूं। काम पर भी जाना है, विरोध करने पर भी हो- हल्ला। एक-न-एक दिन समाज से भी गिर जाऊंगी। विधवा जो हूँ,  मेरी तरफ ही ओछी हरकत शिरकत करेगी। आखिरकार सोची, वहाँ काम ही नहीं करूंगी।

राहुल खुद में हताशा पाल रखा। उसे कमला की रूष्ट व्यवहार ने कमजोर कर दिया। कई दिनों तक इंतजार करता रहा। अपनी गलती को अकेलेपन से कोसे जा रहा था।

*

कमला की भी जिन्दगी काम के बिना कटने वाली नहीं। उसकी मायुसी तय थी। ठंडी हो या गर्मी, खेतों में काम हो या न हो, राहुल के पिता काम देते थे। कुछ भी हो, जीवनयापन के लिए अधिक सोचना नहीं होता। राहुल के पिता संवेदनशील इंसान थे। गरीबी और भरी जवानी में विधवा हो जाने का तरस था, उनमें।

सुबह-सुबह सुनने को मिला कि छोटे मालिक की तबीयत बिगड गई है। कमला तेज कदमों के साथ राहुल के घर पहुंच गई। मानो, कोई सगा संबंध हो या फिर आत्मीय। दरवाजे पर कदम रखी ही थी कि जमींदार साहब से नजरें मिल गई। उन्होंने देखते ही कहा, “काम पर नहीं आ रही हो? पगार लिए बिना चली गई, कम-से-कम रूपये तो ले लेती।”

कमला चुपचाप नजरें को दौडाती रही लेकिन कुछ नहीं बोल सकी।

जमींदार साहब कुछ बोलने ही वाले हुए कि कमला बोल पडी, “अब हम नहीं आएंगे,  मजूरी दे दीजिए।”

उन्होंने रूपये देते हुए कहा, “कमला, जब कभी जरूरत पडे, बेहिचक आ जाओगी।”

कमला अब धीमी कदमों से दरवाजे के बाहर निकल रही थी और निगाहें राहुल की ओर जो बगल वाले कमरे में लेटे हुए था। कदम-दर-कदम बढाती जाती, शायद राहुल की भी बेचैनी बढती जा रही थी। राहुल की आंखों से कमला ओझल हो चली। रास्ते भर कुछ से कुछ सोचती हुई घर पहुंच गई। राहुल से रहा नहीं गया। वह भी चुपके से कमला के पीछे-

पीछे चलता रहा। वह घर के अंदर चली गई थी और राहुल

बाहर से ही लौट आया।

दरअसल,  कमला पढी-लिखी के साथ समझदार भी थी। समय ने पति को छीनकर असहाय बना दिया था। पति रामेश्वर, राहुल के मामाजी के यहाँ ही मुंशी का काम करता था। अचानक उसे जाना था और कार दुर्घटना में राहुल के मामा समेत, वे भी चल बसे। उस समय से ही कमला के प्रति दया भावना छूटने का नाम ही नहीं लेता। अच्छे- बुरे दिनों में मदद करना इंसानियत जैसा था, ऐसी बातें अपने पिता से राहुल सुना करता था।

सुबह-सुबह राहुल खेत की ओर झांक रहा था, देखा कमला खडी है। उसी तरह साडी की पल्लू को कमर में ठूंसे जा रही थी और अपनी बालों को जैसे ही लपेटना चाही, राहुल नजदीक आ, हल्के हाथों से स्पर्श करना चाहा। कमला के हाथों से बाल फिसल कर चेहरे को ढंक लिया। राहुल बाल को हटाते हुए कहा, “कब आई?”

“अभी ही।” कमला दूर हटती हुई बोली।

“तुम तो काम छोड चुकी हो, कैसे आना हुआ?”

“अपने लिए—–आपके लिए भी।”

“मेरे लिए? ” राहुल ने कहा।

“आप गरीबों का कद्र करना जानते हैं। उसकी प्रतिष्ठा को समझते हैं, चाहते तो घर के अंदर भी आ जाते, लोक-लिहाज को ताक पर रख देते, आपका कुछ नहीं बिगडता लेकिन आपने वैसा नहीं किया।” बोलती हुई कमला काम में लग गई।

“तो तुम स्नेह को परख ली हो, प्रेम की भाषा समझ गई हो?”

“स्नेह? यह तो किसी के लिए भी संभव है, लेकिन यह प्रेम? कैसे प्रेम कर सकती हूँ,  आप इतने बडे घर में रहने वाले, जमींदारी ओहदे से लिपटे हुए और मैं, खेतों में काम करने वाली, मजबूरी की लकीर माथे पर, जो अमिट है। भला आसमान जमीन पर आ सकता है,  आ भी जाए तो सहन कौन कर पाए—- नहीं न? इन दोनों का मिलन संभव ही नहीं— तो मेरा प्रेम कहाँ?”

कमला कुछ और बोलती कि राहुल शुरू हो गया, “पता है या नहीं– जमीन के बिना आसमान अधूरा है, ठीक उसी तरह आसमान के बिना जमीन। दूर-दूर तक निगाहें फैलाओ तो दोनों एक दूसरे में समाहित नजर आती है। अमीर और गरीब छोड इंसानियत की बात की जाए तो यह सम्मिलन का ही नाम है। जरूरत है निगाहें फैलाने की, संकुचित मन को दूर फेंकने की।”

राहुल की बात सुन कमला खिलखिलाकर हँस पडी और बोली, “ठीक है, मैं भी उस अधूरे शब्द को परखना चाहूंगी, इसलिए तो काम पड आ गई।अब आप जाईये, तेज धूप है, तबीयत भी खराब चल रही है।”

“तुम इतनी तेज धूप से जूझती हो, पसीने से तरबतर रहती हो, उसका क्या?”

“राहुल बाबू! यह मेरे हिस्से की बात है।हरेक आदमी का शरीर सांचे की तरह ढला होता है। जैसा उसे ढाला जाता है,  वह उसी रूप में तैयार होता है। मैं बचपन से ही धूप और धूल-मिट्टी से जूझ कर बडी हुई हूँ और आप महलों में रहकर। इसलिए आप इसे जाने दें, फर्क तो रहेगा ही।”

राहुल खीझकर बोला, “फिर फर्क की बात?”

“तो फिर आप दूर से ही देखिए, पास आने की कोई संभावना नहीं।”

कमला की आवाज में तिरस्कृत भावना को देख, राहुल घर की ओर चल दिया।

*

कमला काम में लग गई और पास ही हवेलीनुमा घर को बीच- बीच में निहारती रहती। कम उम्र में विवाह व फिर पति को खोने के बाद प्रेम नाम से परिचित नहीं थी। फिर भी आस- पडोस से कुलक्षणी जैसे शब्दों का प्रहार सहन करती रही थी। राहुल के शब्द भाव ने जीने की राह दिखाई। सजना, संवरना और गुनगुनाना तो मानो सपने में ही हो, हाँ,  बेरंग जिन्दगी में रंग की अनुभूति होने लगी।

एक दिन कमला अपनी मुन्नी को सीने से चिपकाए दूध पिला रही थी और उधर राहुल की निगाहें भी लगी हुई थी। गोद में दुबकी मुन्नी मातृत्व का सुकून पहुंचा रही थी और कमला खुरपी के सहारे धीरे-धीरे घास-पात भी उखारे जा रही।कमला समझ चुकी, राहुल की निगाहें मेरी ओर है, फिर भी बच्ची को स्तनपान कराने में मशगूल रही। ऐसी नायाब अनुभूति से अनभिज्ञ थी, जो हरेक मां के लिए बहुत बडी उपलब्धि होती है।

राहुल भी कमला को देख प्रफुल्लित हो रहा था। उससे सहन नहीं हुआ और पास आकर बोल बैठा, “कमला।”

शर्म के मारे कमला कभी खुरपी तो कभी खेत की मिट्टी से बतियाने लगी। राहुल बिना सोचे समझे कमला की होंठों के निचले हिस्से स्पर्श करते हुए उठाया। लज्जा के मारे कमला की आंखे बंद हो गई। फिर राहुल होंठों पर अंगुली रखते हुए कुछ कहना चाहा—-।

इस बार बर्फ की तरह जमी नहीं, न ही पिघली बल्कि शांत हो ठहर सी गई। मानो, हरेक चीजों से अनजान हो—- उसे अंदाजा नहीं कि मैं कहाँ हूँ।

राहुल इतना मात्र बोल पाया, “शाम हो आई है, तुम्हें घर भी जाना है; मैं छोड आता हूँ।”

“नहीं!  मैं चली जाऊँगी।” शांतचित्त हो कमला बोली।

राहुल की कोशिश बेकार गई। कमला फिर सोचने लगी, यह कैसी विडंबना। फिर मन-ही-मन बुदबुदाई, जो भी हो रहा है, अच्छा या बुरा; आप ही जानें।

घर पहुंचने के बाद गुनगुन और मुन्नी को सुलाकर खुद भी नींद को बुला रही, लेकिन वह तो कहीं दूर चली गई थी। आंखों के सामने वही स्पर्श, होंठ, उसकी अबोधपन हिलोरें मारने लगी। बार-बार उठकर चेहरे पर पानी मारने लग जाती, लेकिन भ्रम रूपी अहसास दूर नहीं हटता। ऐसा महसूस करती, चारों तरफ वही साया मंडरा रहा हो। जैसे-तैसे खुद को संभालने के बाद नींद की आगोश में जाने ही वाली थी कि मुन्नी जग गई, इतने में गुनगुन की आवाज भी निकल आई- “माय, तबीयत त ठीक छौ न?”

“हाँ! खाना नहीं खाई, ऐसे नहीं सोते बेटा, सुबह स्कूल भी जाना है न?”

गुनगुन माँ की आवाज को अनसुनी कर गई और सोई रही। कमला समझ गई कि वह सपने में बोल रही है। पल भर में वह भी नींद के साथ हो गई।

इधर राहुल भी असमंजस में पड गया,  न जाने अब क्या होगा। कमला कैसी-कैसी बातें सोच रही होगी। याद कर-करके खुद को कोसे जा रहा। अपने आप पर घिन जैसा महसूस कर रहा। कुछ ही देर में कमला नजर आ गई। इशारे ही इशारों में कल वाली घटना माफ जैसी मालूम पडी। धीरे धीरे सब ठीक-ठाक महसूस करने लगा। पहले की भांति हँसना, गुनगुनाना शुरू। इन दोनों की हालात चकवा-चकैया की तरह हो गई जो दिन-रात आस लगाए बैठे होते हैं, उस बारिश की चाह में जो महीनों बाद आती है और बूंद भर पानी से मिलन होता है।ठीक उसी तरह राहुल मन ही मन बूंदों की आस में आसमान की ओर निहारते रहता।

कभी कभी कमला बेचैन भी हो जाती कि यह अच्छा नहीं। सोचती है, विरोध करना चाहिए, जो मैं किए जा रही हूँ,  उचित नहीं।मानती हूँ राहुल में नादानी है, पर, मैं तो—-!

इतने में कानों से आवाज टकराई, “कहाँ खोई हुई हो, कुछ मेरी भी सुनो।”

कमला अनायास खुद को तरोताजा दिखाने की कोशिश की और राहुल को देखती हुई बोली, “क्या? ऐसा क्या है जो सुनाना चाह रहे हैं?”

राहुल बिना बोले, अपनत्व और वात्सल्य की आड में कमला का हाथ पकड घर की ओर चलने को जिद ही नहीं किया बल्कि ले चला।घर के अंदर पहुंचते ही कहा, “तुम्हें पता है,  यहाँ क्यों लाया हूँ?”

कमला संकोच के साथ लज्जा में डूब गई। न कुछ कहते बनता, न ही विरोध के स्वर को आगाज कर पाती, फिर भी समय से समझौता कर, बातों से साथ देना मुनासिब समझ बोली, “मुझे क्या पता, आप ही बता दीजिए, मैं भी समझ लूं; खुशी भी मिलेगी।”

राहुल की आवाजों में अपनत्व था। उसने कहा, “अच्छा! पहले आंखे बंद करो, जब कहूंगा खोलने तब खुद समझ जाओगी।”

कमला आंखे बंद कर ली। राहुल हाथ पकड कुछ गज की दूरी तक ले गया और बोला, “अब आंखें खोलो— देखो, तुम कहाँ हो?”

कमला की बातों में सच की रेखा थी, वह बोल बैठी, “आपका कमरा है और तो कुछ नहीं।”

“हाँ! यह कमरा मेरा है। पर, आज की रात इसमें मैं अकेला नहीं,  तुम भी साथ रहोगी।”

कमला राहुल की बात सुन आश्चर्यचकित हो गई। जमीन खिसकने जैसा महसूस की। अभी ही तो दूर होने को सोच रही  थी,  फिर और करीब! पता नहीं जब-जब दूर जाने को सोचती हूँ,  कई गुणे पास की नौबत आ जाती है— ऐसा क्यों?” मन में इसी तरह की बातें उफान भरने लगी।

कमला की मायुसी देख, राहुल पूछ बैठा, “क्या हुआ? खुश नहीं हो?”

“हाँ! खुश तो हूँ!” बोलती हुई घर से बाहर निकल गई।

अनजाने में ही सही, कमला समझने लगी, यह गुनाह है, फिर भी मैं तैयार हूँ। वह मन को दबाकर भी दबा नहीं पाई। जब-जब पिंड छुडाने की कोशिश की,  आगे ही बढती रही। वह सोच रही थी, अब ऐसा नहीं होगा— मैं बहुत आगे जाऊंगी और तब शायद पीछे का नामो-निशान नहीं बचेगा। यही उधेडबुन में झोपडीनुमा घर पहुंच गई।

घर में भी उहापोह की स्थिति बनी रही।रात की वेला सूर्य की किरणों से दूर तो होती है, लेकिन यादों की बरसात भी कम नहीं। किसी न किसी रूप में भटकने को भी आतुरता होती। कब आंखें लग गई,  वह तो पता नहीं लेकिन आने वाला पल के लिए कोई जबाव भी तो नहीं।

रात जब 10बजने को चली तो कमला मुन्नी को लिए राहुल तक पहुंच गई। राहुल भी इंतजार में ही दरवाजा खोल मग्न था। कदमों की आहट ने ही कमला होने का प्रमाण दिया। कमला को ससम्मान अपने कमरे तक लाया, फिर दरवाजा बंद कर दिया।

राहुल की खुशी में तीव्रता थी और कमला शांत हो, किसी की यादों में सिमटी हुई। कमला की गोद से मुन्नी को उठा बिछावन पर सुला दिया और गंभीर निगाहों से कमला को निहारने लगा। कमला अंदर ही अंदर शर्म से लाल हो रही थी।

सच में,  राहुल की खुशी वर्षों बाद सामने थी। कमला के मन-मस्तिष्क में कुछ और ही घूम रहा था। वह सोच रही थी, “जो आज होने वाला है, शायद फिर कभी नहीं।”

राहुल में हलचल बढ गया। कमला की खूबसूरती को बंद दरवाजे ने लील लिया। राहुल करीब आ, कमला से कुछ कहना चाहा कि कमला दबी जुबान से बोली, “आपकी चाहत के अनुरूप संभव है,  लेकिन मेरा क्या? मैं कहाँ हूँ?”

राहुल की बातों में अकुलाहट मालूम पडी, उसने कहा, “सब तुम्हारी है, नजरें तो दौडाओ।”

“मैं मान भी ली और अंतरंग खेल, खेलने के लिए भी तैयार हूँ— बदले में आज के बाद पलट कर देखिएगा भी नहीं— मंजूर है?”

“इतनी बडी सजा? राहुल की आवाज में नरमी आ गई।

“इसे सजा न कहें, न ही बेईमानी; मेरी शर्त है।”

“तुम भी अच्छी तरह समझ चुकी हो। तुम बिन मैं भी कुछ नहीं हूँ, फिर भी?”

“हाँ, मैं समझ रही हूँ। क्योंकि इसकी चिंता मुझे है। इतना तो दावे के साथ कह सकती हूँ कि यह रिश्ता, अपनत्व आज ही समाप्त हो जाएगी या फिर कभी न खत्म होने वाली होगी—- राहुल! आज या जिन्दगी भर के लिए?”

राहुल समझ नहीं पाया और उत्सुकता में प्रतिउत्तर दिया, “कल किसने देखा?”

कमला अंदर ही अंदर टूट गई लेकिन मुस्कुराती हुई बोली, “प्रेम एक दलदल है, राहुल! वासना से परे आत्मिक संबंध भी। दलदल में जिसका भी पांव पडता है,  धंसता चला जाता है और सात्विक प्रेम ऊपर उठता चला जाता है। पर, मैं खुश हूँ। मैंने प्रयास किया और सफलता भी मिलती नजर आ रही है। आप अपना ख्याल रखें, मैं तो चली।”

मुन्नी को गोद में उठा, झटके के साथ बाहर निकल गई और फिर अपने घर, जहाँ अपनी गलती ढूंढने में लग गई।

देर रात की निर्ममता ने सूर्योदय के बाद कमला को जगाया। घर के बाहर कानाफूसी के साथ भीड में भी मायुसी झलक रही थी। कमला दौडती हुई, भीड तक पहुंची और उत्सुकता वश पूछी, “हुआ क्या?”

एक औरत पास आकर बोली, “तुम्हें नहीं पता? छोटे सरकार इस दुनिया से विदा ले लिए— किसी चुडैल की नजर लग गई।”

कमला हताश हो, खुद को संभालते हुए भी संभाल नहीं पाई। जमीन पर बैठ गई। पल भर में ही भीड को चीरती हुई, पागलों की भांति दौड पडी। सैकडों आंखें कमला की पागलपन को टकटकी में रह गई।

कमला जमींदार के घर पर ही दम ली। चीखें चारों ओर। पुत्र वियोग में मां बार-बार एक ही बात रट लगाए जा रही थी, “ले गये, मेरे बच्चे को।”

कमला की भी आवाजें कहाँ रूकने वाली, अब संकोच कैसा, चिल्लाती हुई  बोली, “कहाँ है राहुल?”

“माँ फफकती हुई, इशारा करती हुई बोली, “वे लोग मेरे बच्चे को ले गये।”

कमला श्मशान घाट की ओर दौड पडी। कब मरघट तक पहुंच गई, मालूम नहीं, लेकिन वहाँ के दृश्य में कोई नयापन नहीं। हाँ,  राहुल का शरीर निर्जीव के साथ हो, धुआं में तब्दील हो रहा था।

शून्य की ओर निहारती कमला बुदबुदाई, “राहुल! आप एक घास काटने वाली, मजदूरी करने वाली, समाज में कोढ रूपी विधवा को राजकुमारी का स्थान दिया न? अपने वायदे पर कायम रहा,  लेकिन मेरे आने तक का इंतजार नहीं किया?”

इतने में तेज हवा का झोंका आया। कमला के कानों से जानी-पहचानी आवाज टकराई, “मैं वादे को निभाया, पर, तुम भी अपने को निभाना।”

अचानक कमला का ध्यान भंग हुआ और खुरपी पर जा पहुंची—-दिमाग पर जोर देने लगी, “ओह! मैं थी कहाँ?”

© संजय कुमार अविनाश

मोबाइल- 9570544102

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