#Kahani by Shabdh Masiha

साहित्य-मानव

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लेखकों के सम्मान में बहुत बड़ा आयोजन किया गया था . सभी नामचीन लेखकों को आमंत्रित किया गया था . संयोजक की भूमिका निभाते नीलाभ की माँ की बड़ी इच्छा थी कि वह भी इस कार्यक्रम को खुद देखे .किन्तु अस्वस्थता के चलते वह बहुत धीरे-धीरे चलती थीं .

उस रोज वह नीलाभ के साथ ही कार्यक्रम स्थल पर गयीं . लेकिन नीलाभ के लिए जरुरी फोन आ गया . वह अपने पुराने और बुजुर्ग ड्राइवर के भरोसे माँ को लाने के लिए कहकर गणमान्य अतिथियों की अगवानी में चला गया .

ड्राइवर बूढा होने के कारण माँ को सम्हाल नहीं सका और माँ समेत सीढियों पर लुढ़क गया . नीलाभ मंच पर खड़ा यह देख रहा था . वरिष्ठ लेखकों का झुण्ड मंच की और ही बढ़ रहा था मगर किसी ने उनकी मदद नहीं की . तभी देखा कि एक व्यक्ति जिसके कंधे पर झोला लटका हुआ था वह दोनों की मदद करने लगा और माँ को उठाकर कुर्सी पर बैठा दिया .उसके बाद वह मंच की ओर एक वरिष्ठ लेखक की तरफ बढ़ गया और उनका पान उन्हें पेश किया .

नीलाभ ने उन वरिष्ठ लेखक को नमस्कार कर उसका परिचय पूछा तो वे बोले –

“अरे! पगलाया सा है ये आदमी . मेरे साथ सहायक की तरह रहता है, कुछ रचनाएँ इसने लिखी हैं पर सब भावनात्मक हैं, कुछ रचनात्मक नहीं है . मैं प्रमोट कर देता हूँ तो कुछ कहानियाँ चार –छह पत्रिकाओं में छपी हैं .एक किताब भी छपवाई है.”

प्रोग्राम शुरू होते ही मंच पर नीलाभ ने माता जी को बुलाया जिन्होंने पुरस्कार की घोषणा की थी . उनको देखते ही मंचासीन कई लेखकों के चेहरे के भाव उड़ गए. उन्हें मालूम ही नहीं था कि यही वह हस्ती है जो सबके सम्मान के लिए अपना धन दे रहीं हैं .

नीलाभ ने उस सहायक लेखक की ओर देखा, उसकी आँखों में मदद करने की ख़ुशी चमक रही थी तो दूसरी ओर कुछ लोग नजर किये हुए थे . नीलाभ ने कहना शुरू किया-

“मित्रो! और उपस्थित प्रबुद्धजनों , साहित्य का प्रमुख लक्ष्य होता है जीवन को समृद्ध करना और संस्कारवान बनाना . मात्र शब्दों को पिरो देने से कोई बड़ा साहित्यकार नहीं बन सकता , जरुरी है उसकी सोच भी उसके लेखन के साथ व्यवहार में परिलक्षित हो . यह पुरस्कार सच्चे साहित्यकार को दिया जाना चाहिए, भले ही वह बहुत मशहूर न हो .”

अब प्रतिष्ठित लेखकों के चेहरे और उतर गए थे. नीलाभ की बातों ने उनको शंकाग्रस्त और अपमानित कर दिया था बिना कुछ कहे .

“मित्रो ! मैं आपका ऐसे ही एक लेखक से परिचय करवाना चाहता हूँ और मुझे ख़ुशी है कि मेरी माता जी ने भी मेरे प्रस्ताव को मंजूरी देकर कृतार्थ किया है. वह जो सज्जन सहायक की भूमिका निभाते हैं उन्हें हम साहित्य-मानव की उपाधि से सम्मानित करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं . साथ ही यह घोषणा भी की जाती है कि संस्था उनकी चार किताबों का प्रकाशन भी अपने व्यय से करवाएगी.”

समस्त सदन तालियों की आवाज से गूँज उठा जब उस सहायक लेखक को सम्मानित किया गया . जबकि महान  लेखक पुरस्कृत होकर भी खुश नहीं थे आत्मिक रूप से .

शब्द मसीहा

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