#Kahani by Shuchi

एक लघु कथा…

अश्कों की जमा पूंजी—

आज बहुत दिनों बाद वो मायके आयी थी।एक ही शहर में विवाह, माँ-पापा ने ये सोच किया था कि बेटी से मिलते रहेंगे।

शादी की पहली रात ही पति ने मुँह दिखाई में ये हिदायत दी थी कि मायके को भूल जाओ,ज्यादा नहीं जाना,नये घर को अपनाने में दिक्कत होगी,रोज जाने से सम्मान भी कम होता है।चुपचाप सुनती रही थी वो और पति के सोते ही नम आँखों सोचती रही कि पिता के पूछने पर बिट्टो कैसा जीवनसाथी पसंद है,उसने कहा था जो आपको ठीक लगे पापा बस इसी शहर का हो,आपसे दूर न रह पाऊँगी।

एक ही पल में उसके पांव तले की जमीन मानो सरक गयी थी।

आज एक साल बाद मायके आयी थी।पति की आवभगत के बाद उनके जाते ही पिता के पूछने पर कैसी हो बिटिया उनके कांधे सर रख फ़फ़क फ़फ़क कितनी ही देर रोई थी वो।साल भर की जमा पूंजी मानो आज खाली की थी।

पिता उसका माथा चूम सर सहलाते रहे थे।पूछा था उन्होंने बस इतना ही “वापस आना है क्या बिट्टो”।बगल में बैठी माँ,दो छोटी बिनब्याही बहनों और भाई का चेहरा पढ़ उसने ना में सर हिला दिया था।

शाम को मुस्कुराहट का चेहरा ओढ़ अपने पति के साथ फिर चली गयी थी वो एक साल तक अश्कों को जमा करने।

शुचि(भवि)

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