#Kahani by Vikas Pal

शिक्षा (लघुकथा)

“चोप्प…” सरजी कक्षा में घुसते ही दहाड़े। आगे की सीटों में बैठे छात्र सन्न हो गए। पीछे अभी भी खुसुर-फुसुर हो रही थी।

“ऐय…पीछेवालो, ज्यादा चर्बी चढ़ी है क्या, दो डंडे में सुद्ध हो जाओगे। सीधे अपने मुँह में ऊँगली रख लो, आवाज न निकले, वरना मार-मार के गुड़िया कर देंगे।”

सरजी ने अँगूठे और बीच की ऊँगली से चुटकी बजाकर तर्जनी को ऊपर-नीचे हिलाते हुए खड़े होने का इशारा किया– “ऐ चश्मेवाली, आगे की शीट में किनारे वाली, हाँ हाँ तुम्ही…,बड़ी स्मार्ट बनती हो, चलो बताओ शिक्षा क्या है?”

“शिक्षा एक प्रकार का नॉलेज  है, जिससे जीवन के ऐम का पता चलता है, प्लस हमें एक-दूसरे के साथ कैसा बिहैवियर करना चाहिए प्लस…प्लस हमें जरूरतमन्द लोगों की हेल्प करनी चाहिए इन सबका नॉलेज होता है।”

” आता जाता कुछ नहीं, प्लस प्लस कर रही है। बैठ जा चुपचाप। और कोई है बताने वाला?”

फिर एक लड़के से कहा– “ओए नीली शर्ट, काहे उँघा रहा है बे! बासी भात खा के आया है क्या? चल बता शिक्षा क्या है?”

” शिक्षा हमे पशु से मानव बनाती है…”

लड़के की बात पूरी नहीं हो पायी थी कि सरजी ने बीच में ही टोककर कहा– “पहिले तू जानवर था क्या?”

पूरे क्लास में खिसखिसी हँसी गूँजने लगी। सरजी ने डस्टर को उठाकर मेज में पटका फिर जोर से बोले– “किसी को कुछ नहीं आता। इंटर में पढ़ने चले हो अभी शिक्षा की परिभाषा तक नहीं मालूम। मैं बोल रहा हूँ, नोट करो– ‘बालक विद्यालय में जो प्राप्त करे वो शिक्षा है। तुम जो यहाँ से जो मिलता है वो शिक्षा है। तुमने जो आज यहाँ जो सीखा वो शिक्षा है।’ समझ गए।”

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