#Kahani by Vikas Pal

(लघुकथा) भीतर का हाल

स्कूल में एक दिन पहले ठहरे बारातियों के खाकर फेंके दोने-पत्तलों को कुचलते और धूल के हवाई हमलों को सहते हुए शर्मा जी, शुभम का पाँचवीं में एडमिशन कराने को कार्यालय कक्ष की तरफ एक-एक कदम बढ़ा रहे थे किन्तु उनका निश्चय मन से पाँव पीछे खींच रहा था। पत्नी नही चाहती थी। आंतरिक इच्छा तो उनकी भी सरकारी स्कूल में पढ़ाने की नहीं थी किन्तु नवोदय विद्यालय में सरकारी स्कूल से पाँचवीं पास छात्रों के एडमिशन आसानी से हो जाते हैं, इसकारण ही उन्होंने ये निश्चय किया था। विद्यालय में तितर-बितर घूमते बच्चों में शुभम के शामिल होने की अनुभूति करके शर्मा जी की धौंकनी बढ़ी जा रही थी। शर्मा जी के बढ़ते कदम एक कक्षा के दरवाजे के पास एकाएक रुक गए। झाँक कर देखा, चारो तरफ बच्चों से घिरी कुर्सी पर बैठी मैडम, मेज पर रखे मोबाइल में चल रही हिंदी फिल्म देख रही थीं। शर्मा जी बाहर बच्चों को फिरते अक्सर देखा करते थे पर कक्षा के भीतर का हाल उन्होंने पहली बार देखा। कदम आगे नहीं बढ़ सके शायद उनका निश्चय टूट चुका था। थोड़ी देर बाद शर्मा जी उसी तरह पत्तलों को कुचलते हुए वापस लौट रहे थे  इसबार उनकी धौंकनी धीमी हो रही थी।

विकास पाल

217 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *