#Kahani by Dr. Kshama Sishodia

मिट्टी का दीपक:

:::::::::::::::::::::::::::::::::::

‘ क्यों भइया कितने का  दीपक दिया ?’

‘ले जाओ साहब

कोई मंहगो नाहीं है ,

मिट्टी का  दीपक है साहब, दो दिन बाद मिट्टी में ही मिलनो है ,इतना हिसाब-किताब काहे करत हो ‘

 

‘अरे इतनी लच्छेदार बातें करते हो ऊपर से इतना महंगा दीपक भी दे रहे हो । इस पर भी जीएसटी लगा दिया है क्या ?’

‘ऊ का होत है साब  ? इससे क्या हमरे बस्तीवालों को राशनकार्ड से महीने का राशन मिल जाएगा साहब ? सब भूख से बिलबिलात-बिलबिलात फिरत हैं ‘

‘अरे नही भाई , तुम नही समझोगे, झुझंलाते हुए रमेश बाबू बोले ,लो अपने पैसे काटकर बाकी पैसे वापिस दो हमें ‘

 

वह अंदर धंसी हुई आँखों को सुरसा के मुँह की तरह  फाड़ते हुए बोला ‘ साहब हम लोग सड़क के किनारे दस ,बीस रूपए का धंधा करने वालों के पास इतनी बड़ी नोट का छुट्टा कहाँ से आएगा साब ?’

‘अरे भाई तुम ही दे दो’ रंगोली बेचने वाले से श्याम बाबू बोले ही थे कि रंगोली वाला धंधा न होने से भड़क गया बोला  ‘साहब हम क्या बहुत बड़ा व्यापारी दिखत हैं ? हम गरीब मनख रोज कमाने खाने वाले हैं और ऊपर से

इ नोटबंदी तो साहब हम गरीबों को बरबाद ही कर गयी है ।

अब ए फायदेमंद किसके लिए साबित हुई है,यह तो वही जानें

और साहब कालाधन कहाँ से आयो और कहाँ गयो ,इ तो म्हारो ना पतो,लेकिन म्हारो पास जो संतोषधन थो ऊ भी चली गयो साहब ‘

परेशान हो चुके रमेश बाबू वहाँ से खिसकने  की कोशिश करते हुए  खील बताशे बेचने वाले से बोले ‘अरे भाई तुम ही खुल्ले कर दो । लाओ एक किलो खील-बताशे तौल दो ‘……..

‘अरे क्या अब यह भी इतना मंहगा हो गया ?’

“साहब आप लोग रोज खावा की चीज  पाँच रूपए किलो प्याज को चालीस रूपये में ,

दस रूपए किलो टमाटर को अस्सी-सौ रूपए तक खरीदकर चुपचाप खावत हो और साल में एक बार खरीदी जाने वाली चीज को मंहगा बतात हो ?”

 

उधर दीपक वाला आवाज़ लगाता है ‘ साहब एक दीपक हमरी तरफ से हुआँ भी जला दीजो ,जहाँ से बड़े सरकार मन की बात करत हैं ,

बोल दीजो कि वही कुम्हार का दिया है ,जिसके वोट की कीमत केवल एक दिन रहत है ।”

 

डाॅ.क्षमा सिसोदिया।

One thought on “#Kahani by Dr. Kshama Sishodia

  • November 18, 2017 at 1:41 pm
    Permalink

    बहुत सुंदर कथा बधाई

Leave a Reply

Your email address will not be published.