#Kahani by Dr Kshama Sisodia

-प्रीत की पगडंडी–*

 

ओ  मैडम -ऐसा क्या लिख रही हो कि बिल्कुल बात करने के लिए  तैयार नही हो  ? वही जिसे आज़ तक तुम समझ नही पाए ।

क्य्य्य्यया !!?

चुप्प रहकर मुझे लिखने दो तो ही मैं बताऊंगी कि क्या लिख रही हूँ ।

जो हुकुम पंडिताईन जी।

 

अच्छा लो पढ़ो………

“पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय

ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित  होय ।”

 

प्रेम की भाषा तो न जाने कितनी लिपियों में लिखी गयी है । लेकिन

इसमें ऐसा जादू है कि नाम सहित हो या नाम रहित उसके स्नेह का स्पर्श हर पल साथ रहता है ।

“प्रीत किसी जादूगर से कम है क्या -जो जीवन की शुष्क दरारों को भी भर देती है ।”

‘मतलब – ए-इश्क का दस्तूर बहुत निराला है ।

किसीको फिर कुछ याद न रहा ,इश्क हो जाने के बाद ।’

“ए जी सुनो- इन्द्रधनुष के तो सिर्फ सात रंग ही होते हैं न फिर प्रेम के इतने रंग कँहा से आ जाते हैं ?  ऐसा लगता है जैसे प्रेम  हर मौसम में अपने साथ बसंत लेकर चलता है ।”

एक छोटा सा दिल प्रेम के एहसास मात्र से इतना रंग-बिरंगा कैसे हो जाता है  ?

 

एक बात बता- तू क्या इस पर कोई रिसर्च की है  ?

हाँ -लेकिन मैं कागज़ पर लिखी हुई स्याही को नहीं बल्कि लोंगो के मन को पढी हूँ ………….

 

” बसंत की गनगुनी धूप जब अपने पूरे शबाब पर होती है तो कुम्हलाया हुआ इश्क भी खिल उठता है।”

 

“प्रेम एक ऐसा खूबसूरत अहसास है जो किसी की भी जिंदगी को गुलज़ार बना देता है ।यह जीने के मायने ही नहीं सिखाता है बल्कि उसे संम्पूर्ण भी बनाता है ।”

 

हा पंडिता  – तुम  सही कह रही हो ।प्यार कोई नशा तो है नहीं जो एक उम्र के बाद उतर जाए ।

यह तो दो दिलों की वह खूशबू है,जिसकी भीनी महक के गुब्बारे में गोते लगाना चाहिए न कि अपनी जज्बातों को अहं के थर्मामीटर से नापना चाहिए ।

 

साहब-   “मोहब्बत तो  कुदरत का नायाब तोहफा है ।जिसकी सुगंध हमेशा ही फिज़ाओं में महकती रहती है ।”

इश्क का अहसास ही अपने आपमें बहुत खास होता है ।

इश्क का नमक जिंदगी के साथ और जिंदगी के बाद भी होना चाहिए क्योंकि हमारी जिंदगी में जो खुशी और मजबूती आती है उसके पीछे का बल नब्बे प्रतिशत प्रेम ही तो है ।

इसलिए साहब जी –

“प्रीत की राह में प्रैक्टिकल समझ का होना आति आवश्यक है । इसके अभाव में एक-दूसरे को बेपनाह मोहब्बत करने वाले भी अपने प्रेम को खो देते हैं ।”

“बढ़ती उम्र की प्रीत तो सम्मान और विश्वास के साथ और चोखी हो जाती है । फिर अपनी प्रीत धुंधली कैसे हो गयी   ?”

जब प्रकृति ने अपने प्यार को किसी सीमा या उम्र में नही बाँधा तो फिर इंसान क्यों सोचता है कि अब हम बूढे हो गये ।

“कुछ दार्शनिकों ने तो प्रीत को भी स्वार्थी जामा पहनाकर और अपनी सोच के लबादे में लपेटकर उसे भी कठघरे में खड़ा कर दिया है ।”

 

“अरे प्रीत में तो वह ताकत है जो अनगिनत इतिहास रचे हैं ।

स्वार्थी प्यार  पगडंडी क्या सपाट सड़कों पर भी नही रेंग सकता है ।

सच्ची-प्रीत तो तलवार की धार पर चलती है ।

और सुनो-

“सच्ची प्रीत वही है जो  प्रेम में सहज होकर एक-दूसरे में खोते हुए  खुद को पा लेते ।”

और जाने कब

” झूठे अंह की पगडंडी पर खड़े  दो साये सांझ की सिंदूरी ललिमा में एकाकार हो थे ।”

 

डाॅ. क्षमा सिसोदिया

 

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