#Kahani by Dr. Kshama Sisodia

परिदों की चहचाहट\«

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“”सोन-चिरैया””

 

रोज की तरह आज़ भी “सोन चिरैया” भोर होते ही चहचहाने लगी ।लेकिन आज़ उसकी चहचहाट रोज जैसी नहीं थी । उसे आज़ न जाने क्यूँ अपने नन्हे परिंदो को सीने से ही चिपका कर  रख लेने का जी हो रहा था ।इतनी ठंड ,या कुछ विपदा का आभास !!

उसे समझ नहीं आ रहा था ।

लेकिन चिड़ा ने अपनी मजबूत भाषा में उसे समझाया ।और फिर सोनचिरैया ने अपने कलेजे के टुकड़ों को अपने से दूर जीवन और दुनिया के गुर सीखने के  लिए आज फिर खुले आसमान में उड़ने के लिए जाने दिया।

साँझ होने पर भी जब नन्हे परिदें  वापस नहीं पहुँचे तो सोनचिरैया का दिल जोर-जोर से धड़कने  लगा ।वह फुदक-फुदक कर इस डाली से उस डाली पर उड़ती रही ।

शंकाओं के बीच पल-पल काट रहा था ।बहुत देर हो गयी ।लेकिन परिदें घोसले में वापस उड़कर नही आऐ ।

आई तो उनकी मृत्यु की खबर ।

नह्ह्ह्ह्ह्ह्हीहहहही-

सोनचिरैया की चीख जैसे ग्रीवा के अंदर ही अटक गयी ।

सोनचिरैया तो इस विश्वास में थी कि अपने परिंदो को  सोने के आँचलरूपी पंख में हमेशा सुरक्षित रखेगी । वह पथराई हुई आँखों से कभी अपने पंख को देखती तो कभी अपने मृत परिदों को जिनकी चहचाहट अब हमेशा के लिए शांत हो गयी थी । दिल तार-तार होकर खून के आँसू बहा रहा था ।उनकी कोमल पंखुरियों को वह अपनी चोंच में भर लेना चाहती थी ।

ऐसा कैसे हो सकता है ?

“काल इतना क्रूर कैसे हो सकता है ?”

अभी तो वे ठीक से उड़ना भी नहीं जानते थे ।कौन से पाप की गठरी उनके सिर पर थी !!!! ?

जिसकी इतनी बड़ी सज़ा दी तूने ?

उसने सूनी आँखों से आसमान की तरफ देखा तो ओस की कुछ बूँदें उसके पंख पर गिर गयी ।जैसे आसमान भी उसके साथ रो रहा हो ।

डाॅ.क्षमा सिसोदिया।

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