# Kahani by Dr. Mrs. Tara Singh

मनोवृत्ति

 

            दिन के आठ बज चुके थे । मुन्ना के स्कूल जाने का वक्त हो चला था । माधव जल्दी-जल्दी अपने पाँच साल के पुत्र (मुन्ना) को नींद से जगाया और गोद में बिठाकर दूध पिलाने लगा । मुन्ना की आँखें नींद से अब तक बोझिल थीं ; वह कुछ देर और सोना चाह रहा था । इधर मुन्ने की मम्मी, स्कूल जाने में देरी की आशंका से चिंतित और परेशान हो रही थी । उसने चिल्लाकर पति, माधव से कहा——-मुन्ने के पापा ! यह बच्चा पहले ऐसा नहीं था । इसे तो आपके लाड़ ने बिगाड़ दिया है । इसे मेरी गोद में दीजिये, अभी इसकी नींद खुल जायगी ।

माधव, श्यामली-सलोनी रूप रश्मि की खान पत्नी, मीना से झल्लाते हुए कहा —-चुप भी करो भाग्यवान !

क्यों अपना माथा खराब कर रही हो ? अभी एक घंटा समय है, मैं इसे तैयार कर स्कूल पहुँचा दूँगा । तुम इसके टिफ़ीन की व्यवस्था करो ।

मीना, मर्मभेदी नयन से मुन्ने की ओर देखकर बोली— गदहे के इतना बड़ा होकर भी, बच्चों की तरह रोते हो , तुमको शर्म नहीं आती ?

गदहा कहते ही मुन्नी जोर-जोर से , चीख-चीखकर रोने लगा और पिता माधव से कहा—– मम्मी अच्छी नहीं है, पापा ।

माधव, मुन्ना को समझाते हुए कहा—- वो तो मैं भी जानता हूँ, मगर गदहा होना अच्छी बात है, बेटा । आप नहीं जानते, मेरे हिसाब से तो सभी जानवरों में गदहा ही एक समझदार जानवर होता है । तभी आपकी मम्मी ने आपको गदहा कहा ।

मुन्ना, आँखों के आँसू पोछते हुए बोला—- गदहा, समझदार नहीं बेवकूफ़ होता है पापा और मैं वे बेवकूफ़ नहीं हूँ ।

माधव, दूध का घूँट पिलाते हुए मुन्ने से पूछा—– कैसे ?

मुन्ना ने कहा—– गदहा अपने मालिक को नित नदीं में नहलाने ले जाता है, लेकिन खुद कभी नहीं नहाता । दूसरी बात , उसके पीठ पर हजारों

 

 

कपड़े के पोटले होते हुए भी वह नंगा घूमता-रहता है, और मैं नंगा नहीं रहता । फ़िर मुन्ना ने उदासीन भाव से कहा— पापा ! ऐसे भी मैं अभी गदहे के इतना ऊँचा नहीं हुआ हूँ, मैं अभी छोटा बच्चा हूँ ।

पिता माधव,मुन्ना के हाँ में हाँ मिलाते हुए बोले—- बिल्कुल ठीक बोल रहे हैं आप; आप तो अभी बच्चे हैं । इसीलिए अभी आपको गदहा कहना, सरासर गलत होगा ।

मुन्ना, पिता माधव द्वारा उसके कथन की पुष्टि करते ही उल्लसित हो उठा और पूछा—- तब फ़िर मम्मी ने मुझे गदहा क्यों कहा ? शायद लगता है, उसने मुझे नहीं, आपको गदहा कहा !

पिता माधव हँसते हुए बोला —- नहीं बेटा, मेरी ऊँचाई तो ऊँट के बराबर है, इसलिए मुझे गदहा कैसे कह सकती है ?

मुन्ना, हठ करते हुए फ़िर पूछा—– तब अपने घर में किसकी ऊँचाई गदहे के समान है ?

माधव चुटकी लेते हुए कहा—- बेटा ! उसके बाद तो एक ही आदमी बच जाता है, जिसने आपको गदहा कहा ।

मुन्ना को समझते देर नहीं लगी; वह उछलता हुआ चिल्लाया —– मम्मी ! तुम गदहा हो ?

मुन्ना की यह बात मीना को अच्छी नहीं लगी । उसने तीक्ष्ण तिरस्कार के भाव से कहा—- मैं तुझे जितना ही सभ्य और विचारशील बनाने की कोशिश करती हूँ; तुम्हारे पिता तुमको उतना ही ,बुरा और उद्दंड बना रहे हैं ।

माधव ने देखा,’ बात बनने के बजाय बिगड़ती जा रही है । ऐसे भी मीना पर इस तरह का कटाक्ष कर, मुन्ना ने ठीक नहीं किया । इससे तो मीना के हृदय से मेरे लिए स्नेह, सम्मान ,दोनों मिट जायेंगे, जो किसी भी नजरिये से ठीक नहीं होगा ।’

 

 

 

माधव , मीना के समीप जाकर , उसके उलझे बालों को सुलझाते हुए , वफ़ा की उम्मीद के साथ कहा—- शिकवा, शिकायत, बेताबी और बेकरारी ; यही तो मुहब्बत के मजे हैं । सच तो यह है मीना कि, मेरे जैसे बेसमझ को इतना समझदार तुम्हीं ने बनाया । तुम्हारा साथ रहेगा, तो मैं कागज की नाव पर बैठकर भी सागर को पार कर लूँगा ।

मीना व्यंग्य भरी हँसी हँसती हुई बोली—- बेचारे मर्दों का दिल कितना निष्कपट होता है ? फ़िर शिकायत के भाव में कही—- ये ही तो मर्दों के हथकंडे हैं, पहले तो देवता बन जाते हैं, जैसे सारी शराफ़त इन्हीं पर खतम है । बाद काम बनते ही तोतों की तरह आँखें फ़ेर लेते हैं ।

माधव, मीना की बात सुनकर कुछ क्षण के लिए अनिश्चित दशा में खड़ा रहा, फ़िर गंभीर भाव से कहा—

मीना , मेरी विनय-शीलता और सज्जनता केवल अपना मतलब गांठने के लिए नहीं है, बल्कि पवित्र और निर्दोष है ।

पति की बात सुनकर मीना बोली—- मुझे तो ऐसा प्रतीत नहीं होता । मुझे तो आज भी लगता है, तुम्हारी ये बातें हृदय से नहीं, केवल मुख से निकली है । ऐसा मैं इसलिए बोल रही हूँ, कि तुम्हारे प्यार में अब हार्दिक भावों की जगह अलंकार ज्यादा होता है । जब से मुन्ना का साथ तुमको मिला है , मेरी ओर तुम ध्यान ही नहीं देते । सारा समय मुन्ने में लगे रहते हो । पहले जैसी मेरे सिर की पीड़ा, तुम्हारे हृदय की पीड़ा अब नहीं होती ।

परिस्थिति को बिगड़ता देख , माधव ने बात को फ़िर से गदहे की तरफ़ मोड़ दिया, कहा—-हाँ तो हमलोग अभी गदहे को लेकर झगड़ रहे थे न । जानती हो मीना—- मेरी समझ से गदहा सभी जानवरों में ज्यादा समझदार होता है । बावजूद जब हम किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ़ कहना चाहते हैं, तब उसे गदहा कहते हैं । जब कि उसे यह पदवी , उसकी सहिष्णुता ने दिलाई है । बेचारा भूखा-प्यासा रहकर मालिक का काम करता

 

 

है, मगर कभी क्रोध नहीं करता । जितना चाहो मारो,सड़ी घास खाने दो, उसके चेहरे पर असंतोष की छाया तक नहीं दीखती ; और तो और उसके चेहरे पर स्थायी विषाद की छाया को सुख-दुख , लाभ-हानि –किसी भी दशा में किसी ने बदलते नहीं देखा । धैर्य , ईमानदारी और त्याग में तो ऋषि-मुनियों से भी आगे है ।

मीना चकित होकर पूछी—- वो कैसे ?

माधव समझ गया,’ आया ऊँट पहाड़ के नीचे “; इसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये । उसने कहा—– पुराने जमाने में दुर्वासा, विश्वामित्र आदि ऋषियों के क्रोध की बातें शास्त्रों में विख्यात है । बात-बात पर श्राप की बात करते थे । एक गदहा ही है, सच पूछो तो अपने सदगुणों का इतना आदर करते मैंने किसी को नहीं देखा । गदहे हर हाल में अपने आदर्श बनाये रखते हैं, उसे नीचा नहीं होने देते । पति की बातें सुनकर मीना में आत्मगौरव का आविर्भाव होने लगा । उसने मुन्ने को गोद में लेकर पुचकारते हुए कहा— तो मम्मी गदहा है, और आप ?

 

 

 

 

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