# Kahani by Dr Sarala Singh

कड़वा सच

………………

कई बार लोग सीरत से अधिक सूरत को

महत्व देते है । पर्सनैलिटी को विशेष रूप से

महत्व देते हैं।अगर किसी के पास दोनों न हो तो

उसे धनाढ्य होना चाहिए अन्यथा लोग इज्ज़त

नहीं करते ।

“अरे लो ये पेपर ,इस पर स्टैम्प ….अरे ठप्पा लगा लो ठप्पा ठप्पा ।” प्रधानाचार्या जी ने

ज्वाइनिंग लेटर देते हुये कहा ।उनके बोलने का

अंदाज ऐसा था मानों किसी बेहद गंवार से बात

कर रही हों ।

रीना का चेहरा गुस्से से तमतमा गया

था पर नई जगह ,नये लोग, वह खून का घूँट पी

करके अपमान सह गयी ।वह मन ही मन स्वयं

को कोस रही थी कि उसने अपना तबादला ही

आखिर क्यों कराया ।आखिरउसे क्या सूझी जो

यहाँ चली आई ।

रीना का तबादला उसके घर के ही नजदीक हो गया था । आज वह बहुत खुश थी क्योकि वह बहुत दिनो से इस प्रयास में लगी थी किउसका तबादला उसकेघर के पास हो जाये ।

हालांकि जिस विद्यालय में वह अभी पढ़ा रही थी ,वह बहुत ही अच्छा था । वहाँ के सभी शिक्षक और प्रधानाचार्य सहयोगी और अच्छे

व्यवहार वाले थे ।उसकी गलतियों को भी वे

सहज भाव से समझा देते । प्रधानाचार्य बहुत

ही सहयोगी इंसान थे । कभी कोई गलती होती

तो उसे भी बड़े ही शांत भाव से समझा देते ।

“मैडम चिन्ता मत करो मैं हूँ ना ।”

उनकी यही दो लाइने ना जाने कितना सुकून

पहुँचाती थीं । काम तो फिर भी करना ही होता

था पर एक शान्त दिमाग के साथ वही काम होता था ।

रीना काफी दूर से आती थी,उसका कोई साथ भी ना था ।  अगर  किसी का साथ हो तो

कैसा भी  कठिन राह हो आसान हो  जाता  है।अकेले कहीं आना जाना उतना ही कठिन ।रीना की  हमेशा  से  यही  इच्छा  रही  थी  कि  कोई उसकी ऐसी सहेली होती जो उसके साथ आती जाती परन्तु उसकी यह इच्छा कभी भी पूरी ना हुई ।ना स्कूल ,ना कॉलेज और ना ही नौकरी करते समय ही । उसके आने जाने के रास्ते में

एक जगह ऐसी पड़ती थी जिसे पार करने के

बाद ही उसकी जान में जान आती । वहाँ आये

दिन जेबकतरे और गुंडेटाइपके लड़के आरटीवी या बस में चढ़ जाते और जबरन किसी का पर्स

किसी का मोबाइल चाकू दिखाकर छीन लिया

करते थे ।उस एरिया या क्षेत्र को पार करने के

बाद ही लोग चैन की सांस  लेते ।सबसेबड़ीबात

यह थी कि इस एरिया से लगकर पुलिसथाना

भी था । कुछ बदमाश तो पुलिस थाने से पहले

उतर जाते कुछपुलिसथाने से थोड़ाआगे जाकर

उतरते मानों पुलिस का माखौल उड़ा रहे हों ।

एक बार हम लोग आ रहे थे कि आरटीवी जैसे ही चौराहे पर रुकी,नीचे से आवाज आई    ” कैमरा- कैमरा”।

नीचे खड़ेकुछलड़केआरटीवी में बैठे लड़को से कह रहे थे ।।

मुझे लगा शायदकिसी के घर में

शादी होगी या कुछ और होगा और वे लड़के इन लड़को को जानते होंगे और इसलिये इन

लड़को से वे कैमरा मंगवा रहे हैं ।मैं सोच ही रही थी कि एक लड़का अपने जेब से एक तेज

धारदार चाकू निकाल लेता है और सबसे पीछे

की सीट पर बैठे आदमी के सामने तान देता है।

वो आदमी बड़ी ही समझदारी से बिना समय

गंवाये मोबाइलदेदेताहै।

“अरे भाई ये लो मोबाइल मोबाइल ही चाहिये

ना ।”

वह व्यक्ति बोला ।

पर गुंडों को इससेभीसन्तोष ना मिला ,उन्होंने उसकी जेबमें जो कुछ था सब ले लिया ।

ये घटना ठीकपुलिसचौकसेबमुश्किल चार कदम की दूरीपर हो रही थी ,पर विरोध का साहस किसी मेंभी नहीं था ।इन सबके कारण ही वह चाहतीथी कि उसका तबादला उसके घर के पास ही हो जाये ।

” रीना तुम गलती कर रही हो ”

प्रधानाचार्यसर बोले ।

“यहाँ  क्या  हुआ ,वहाँ  तुम परेशान

हो जाओगी ।”

” जी सर,क्या करूँ बच्चों की तबियत कभी

खराब होती है तो यही दूरी बहुत खलती है ।

मुझे भी जाते हुये बिलकुल अच्छा नहीं लग

रहा है ।”

हाँ शायद यह भी सही कह रहे थेयहाँ की तरह अपनत्व तो शायद ना ही मिले ।रीना मन ही मन सोच रही थी ।आखिर कहते कहते करीब पन्द्रह दिन बाद वह विद्यालय सेरिलीव हुई । रीना सभी से मिलकर अपने नयेविद्यालय पहुँचने की तैयारी करने लगी । सारेचार्ज देने के बाद नये विद्यालय की ओर चलपड़ी । रास्ते भर उसे बड़ा ही अजीब लग रहाथा । अपने घर के पास पहुँचने की खुशी सेअधिक अपने साथ के लोगों को छोड़कर जानाअधिक दुख पहुँचा रहा था ।वो अब खुश कमऔर उदास ज्यादा थी ।

ना जाने क्या क्या सोचती हुई वह नये विद्यालय

की ओर बढ़ चली थी ।अजीब सी उलझन उसके ऊपर हावी हो रही थी ।

नये विद्यालय मेंपहुँचकरवोपहलेज्वाइनिंग के लिये प्रधानाचार्या के कमरे में जाती है । वहां

पहुँचकर पहले प्रधानाचार्या को नमस्कार करती

है,जिसका जवाब तीसरी बार उसे मिल सका ।

उसे बड़ा अजीब सा लगा ।वो काफी देर तक

आफिस में बैठी रही अन्ततः थककर अपनेपति को घर जाने के लिये कहकर पुनःइन्तजारकरने

लगती है कि कब उसकीज्वाइनिंगकरायी जाये। आखिर काफी देर बाद प्रधानाचार्या जी एक

शिक्षिका की ओर देखते हुए बोली, “अरे जरा इससे पढ़ाकर देख तो लो पढ़ाना आता है कि

नहीं,जब पढ़ाना आयेगा तभी मैं ज्वाइनिंग कराऊँगी । रीना को ऐसा लगा मानों वह नई नई

नौकरी करने आयी हो गुस्से से वह खौल उठी

लेकिन अपने ऊपर बहुत ही अंकुश लगाया

आखिर एक प्रधानाचार्या की बात थी खैर।

“नेहा मैम आप कक्षा आठवीं -सी  में  चली  जाइये ।”

सुनकर नेहा खड़ी हो गयी, “जी मैम किधरजानाहै ।”

“कमरा नंआठहै”दूसरीशिक्षिकानेकहा ।

“अरे ढूँढ लेगी “बड़ेहीअजीब ढंग सेप्रधानाचार्या जी बीच में बोल पड़ी ।

नेहा चुपचाप वहाँ से निकलकरबाहर आ गयी और एक बच्चे से पूछकर कक्षामें चली गयी ।अन्ततः अन्तिम कालांश मेंबुलावा आया अब तक नेहा के अन्दर उसप्रधानाचार्या के प्रति एक अजीब सी भावनाघर कर गयी थी खैरज्वाइनिंग हुई और वहबोलीं,

“अब ज्वाइनिंग लेटर कल लेना कल ।”

“जी मैम ।”नेहा बड़ी मुश्किल से बोली ।

नेहा घर पहुँचकर बहुत रोयीकिकैसी जगह आ गयी वो भी थोड़ी सी दूरी के कारण ।

वैसे भी अगर रास्ते की परेशानी ना होती तो वह कभीभी तबादला ना कराती । खैरदूसरेदिनजब वह  विद्यालय पहुँची तो पहले उसे वे  कक्षायें

बता दी गयीं जिनको उसे पढाना था । तीसरे

पीरियड मे बुलावा आया –

“मैडम आपको बड़ीमैम बुला रहीं हैं ।”एक मैम ने कहा ।

अब रीनातुरन्त ऑफिस में पहुँची ,कुछ देर वह खड़ी रहीबड़ी मैम अपनी एक चहेती से बात कर रही थींसो इन्तजार करती रही।काफी देर बाद दूसरीशिक्षिका से बोलीं,

“अरे इसका ज्वाइनिंग लेटरदे दो ।”

यानी उन्हे पता था कि मैं उनके ही बुलाने पर ऑफिस में आकर खड़ी हूँ ,फिर भीवेआपस की बातें करतीं ही रही । खैर दूसरीशिक्षिका ने उसे ज्वाइनिंग लेटर थमाते हुए कहाकि इस पर स्टाम्प लगा लो । नया स्कूल नये लोग उसे कैसे पता चल जाता कि स्टाम्प कहाँहै । वो उस मैम से जानना चाहती है कि स्टैम्पकहाँ है। इतने में फिर वो प्रधानाचार्या बोल पड़ीअरे स्टैम्प ,ठप्पा ठप्पा । यानी वो नेहा को अपनेआगे निरा गंवार सिद्ध कर रही थी जिसे स्टैम्प भी नहीं मालूम  जबकि नेहा उससे कहीं ज्यादा पढ़ी थी और पढ़ा भी कई साल से रही थी ।

नेहा को एक तगड़ा झटका सा लगा

ये दुनिया कैसी है । बड़े ही विचित्र लोगों से भी

सामना हो जाता है । नेहा के दिमाग में बहुत

समय तक” ठप्पा ठप्पा “शब्द घूमता ही रहा ।

डॉ. सरला सिंह

 

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