#Kahani by Dr Sarla Singh

“पिज्जू”

एक छोटा सा कबूतर का बच्चा पेड़ से अचानक नीचे गिरा । उसी समय बच्चों का एक

झुण्ड भी उधर से गुजर रहा था ।पहले तो बच्चे

उत्सुकतावश उसके पास ठहरे, लेकिन उसकी

घायलावस्था देख धीरे-धीरे सभी खिसकतेगये।

शायद उन्हें यह डर हो कि मम्मी की मार पड़ेगी

या सोच रहे हों कि यह भला उनके किस काम

का ?

उसी में एक बच्चा जो उस कबूतर के बच्चे के पास बैठा था ,उसने कबूतर के बच्चे को उठा लिया ,शायद उसे अपनी माँ पर ज्यादा

ही भरोसा था । कबूतर के बच्चे को लेकर वह

घर आ गया,”मम्मी देखो ना पिज्जू को कितनी

चोट आयी है ।” इसी के साथ कबूतर के बच्चे

का नामकरण भी हो गया “पिज्जू”।

माँ ने  कबूतर के बच्चे को देखा तो परेशान हो गयीं । इसकीे तो चोंच भी घायल है,

भला इसे क्या खिलाया जायेगा।”फिर उन्होने

इसका तोड़ निकाला कि रूई के फाहे से उसके

मुँह में दूध डाला जाये ।”तभी किसी ने सुझाया

कि ड्रापर से भी दूध पिलाया जा सकता है।और

पिज्जू को दो चार ड्राप दूध पिलाकर माँ अपने

को परमविजेता समझने लगीं ।

अब पिज्जू के चोट पर क्या लगाया जाये

यह समस्या आ खड़ी हुई ।खैर माँ ,पिता ,बच्चों की सहसहमति से हल्दी तेल लगाने पर बात आ टिकी । माँ की दिनरात की सेवा से पिज्जू

के पंख निकलने लगे । एक दिन हाथ पर रखे

दानों को पिज्जू ने उठाकर खा लिया ।अबतो

सबके खुशी का ठिकाना ही ना रहा, पिज्जू ने

पहली बार अपनेआप कुछ खाया था । अब उसके खाने की चिन्ता खत्म हो गयी ।कम से कम अब वो खुद से खा सकता था ।

मम्मी ये उड़ेगा कब ?रोहित ने बड़ी बेकरारी से माँ से पूछा ।” उड़ेगा जरूर उड़ेगा

सब्र तो करो ।”माँ ने कहा। अभी तो इसके पंख

निकल रहे हैं ,जब पूरी तरह पंख निकल आयेंगे

तब इसे उड़ना सिखायेंगे ।माँ ने अपनी बात पूरी की ।

पिज्जू बिना पिंजरे के घर भर में इधर से उधर फुदकता रहता ।हाँ इतना ध्यान जरूर

रखा जाता कि खिड़की दरवाजे की जाली ना

खुली हो । बाथरूम का दरवाजा ना खुला हो ।

रात मे उसे एक पिंजरे में रख दिया जाता ।धीरे

धीरे पिज्जू भी घर के लोगों से मानों हिलमिल गया था ।वह किसी के हाथ पर बैठकर आराम से दाने चुगता और फिर फुदककर दूसरे के हाथ पर बैठ जाता ।

धीरे धीरे पिज्जू के पंख पूरी तरह से निकल तो आये किन्तु उसे उड़ना नहीं आया ।अब माँ ने उसे उड़ाने की तरकीब निकाली ।बाहर जाकर पिज्जू को उड़ाना सिखाने की तरकीब । इसमे दो तीन लोग होने चाहिए ताकि

पिज्जू को चोट ना आये ।वह किसी जानवर के

द्वारा घायल ना किया जा सके । अब तीनों माँ बेटे का त्रिगुट पिज्जू को उड़ना सिखाने के लिए

कमरकसकर तैयार था । चार पाँच दिन की कड़ी मसक्कत के बाद पिज्जू महाशय को उड़ना आ ही गया । वो उड़कर पेड़पर बैठता

और वापस माँ के पास आ जाता । धीरे धीरे

पिज्जू खाना खाने बालकनी में आता माँ के हाथ से दाना खाकर, पानी पीकर आराम से

फिर पेड़ पर चला जाता ।

कहते हैं कि भगवान ने सभी की जोड़ियां

बनायीं हैं तो पिज्जू कैसे पीछे रहते ?एक दिन

पिज्जू की दोस्ती भी उनके जोड़ीदार से हो

गयी । अब पिज्जू जी दोचार दिन भी बाहर रहने लगे लेकिन वापस बालकनी में ही आ जाते । माँ को भी अपने बच्चे की तरह उसका

इन्तजार रहता वे उसकी आवाज तक पहचानने

लगीं थीं ।

तभी उन लोगों को मकान बदलना पड़ा ।वे

वहाँ से काफी दूर रहने लगे थे ।किन्तु पड़ोसियो

ने बताया कि पिज्जू प्रायः उनकी बालकनी में

आकर बैठ जाता था मानों माँ को बुला रहा हो।

कुछ दिनों बाद मायूस होकर वह वहाँ से चला

गया ,शायद अपने नये घोसले में ।

डॉ.सरला सिंह

Leave a Reply

Your email address will not be published.