#Kahani by Gopal Kaushal

लघुकथा

 

बहू या गुलाम

 

टुकटुक रोज की तरह सारा काम करके बैठी ही थी कि सास ने आवाज लगाई अजी बहू सुनती हो , तुमने मुझे अभी तक खाना नहीं दिया …….इधर से पतिदेव  भी टुकटुक जल्दी करो …अभी तक टिफिन बैग में नही रखा ……बस माँ जी का काम करके जैसे ही पतिदेव की सेवा में हाजिर हुई थी कि पतिदेव बादल की तरह फट पडे …..और अपशब्दों से भला-बुरा कहने लगे ……यह नजारा आज का नही रोज का था …….लेकिन कब तक … आखिर टुकटुक भी आज बिजली की तरह गरजी और बोली ,….. मैं आपकी पत्नि ..इस घर की बहू हूँ … नौकर या गुलाम नही ….जिस काम को आप बडी आसानी,सहजता से कर सकते हो उसमें इतना गुस्सा और फटकार …… मुझें याद है जब आप और आपकी मम्मी जब मेरे यहाँ  रिश्ता तय करने आएं थे ….तब मम्मी ने बडी शान से कहाँ था कि हम बहू नही आपके यहां से बेटी लेने आएं है ….आपकी यह सोच देख में गर्वित थी …..पर अफसोस हैं कि यह सच नही निकला …। रिश्ते .. फरिश्ते होते न कि फजिहतें बनाम गुलामी के हिस्से होते है ……।

 

 

✍ गोपाल कौशल

नागदा जिला धार मध्यप्रदेश

99814-67300

 

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