#Kahani by Jitendra Kumar Gupta

“समाधान”

 

“अरे वर्माजी, परसों शादी है नेताजी के बेटे की । रिसेप्शन का कार्यक्रम के लिये हमने पहले ही हामी भर दी है याद है न।” सर्वोच्च हाई स्कुल के प्राचार्य ने प्रधान अध्यापक दुबे जी को केबिन में बुलाकर कहा।

” जीहाँ जी हाँ बिल्कुल याद.है सर ।”

“अरे मगर  नेताजी ने कहा है कि मैदान में एक भी पत्थर या कंकड़ नहीं होना चाहिये ..मगर देखो मैदान तो अभी भी साफ.नही है।”

“जी सर वो क्या है न दो मजदूर लगाये थे मगर काम पूरा नहीं हुआ…कहो तो चार छह मजदूर और बढ़ा दूँ ?”

चिन्तित स्वर था दुबे जी का भी।

“अरे चार मजदुर लगाओगे तो  दो तीन हजार खर्च हो जायेगें और फिर फीस भी नही आ रही है, समझे  । कुछ दिमाग लगाईये।”

” समझ गया सर।”

दुसरे ही दिन प्रेयर में ही फीस जमा न करने वाले ,लेट आने वाले, ड्रेस में न आने वाले बच्चों को अलग खड़ा कर दिया गया । शाम तक मैदान साफ हो चुका था।

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जितेन्द्र कुमार गुप्ता

इंदौर

 

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