#Kahani by Jitendra Yadav

कहानी:- तुमनें हीं तो कहा था

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शिवानी अपनें पति की बदलती दिनचर्या और बदल चुके रवैये से इतनी परेशान थी की उसके बेबसी की सिलवटें, उसके माथे की सिकन अब रूह तक उतर चुकी थीं मगर अपनें पति सिद्धार्थ से कुछ कहनें या पूछनें की हिम्मत नहीं जुटा पाती,

हाँ कभी पत्रिका में या TV पर Extramarital के बारे में पढ़ती या देखती तो आंखों में बरबस हीं आंसुओं के मेघ उमड़ जाते जिसे रोकनें के लिए ढाई साल की श्रेया को गोद में दबा लेती पर मन में वैसा विचार नहीं आनें देती क्योंकि दिल के कोने में उसनें सिद्धार्थ पर अटूट विश्वास को पनाह दी थी कभी, और वो भरोसा इसकदर था कि उसनें एकबार मजाक में कह दिया था अगर तुम्हारा किसी से Affair हो जाए तब भी मुझे कोई दिक्कत नहीं, और हँसते हुए सिद्धार्थ नें भी कहा था ” Same Here ”

 

रोज की तरह उस दिन भी घर के सारे काम निबटा कर सोफ़े पे बैठी हीं थी कि सामनें टेबल पर पड़े सिद्धार्थ के फोन में ibibo का Notification दिखा हनीमून पैकेज का।

देखते हीं मन में कई सवाल उठनें लगे, सोचा पूछ लूं मगर नहीं बोल पायी। जब अचानक सिद्धार्थ पाँच दिन के Office टूर पर निकल गया और एक कलीग के जरिए पता चला कि Office से ऐसा कोई टूर गया हीं नहीं तो शिवानी की बची-खुची उम्मीद भी धरासाई हो गयी। TV का वॉल्यूम बढ़ा दिया ताकि उसके दिल की चीख उसके कानों तक न पहुंचे और मासुम श्रेया को सीनें से लगाकर सिसकती रही और कोसती रही अपनी क़िस्मत को।

 

सिद्धार्थ के वापस आते हीं बरस पड़ी उसपर ये बात और है कि उस बरसात के आँसूं बस शिवानी के दामन को भींगा रहे थे सिद्धार्थ तो संवेदनाविहीन सूखे पेड़ सा खड़ा था, बस चरचराते हुए यही बोला कि तुम बेवज़ह मुझपर शक़ कर रही हो।

चलो मान भी लिया कि मेरा किसी से Affair चल रहा है तो भी इतना ड्रामा क्यूँ कर रही हो

 

“तुमनें हीं तो कहा था तुम्हें कोई दिक्कत नहीं ”

 

शिवानी ये सुनते हीं बर्फ़ की सिल्ली सी खड़े-खड़े जम गयी अपनी जगह पर जिससे बूंद-बूंद क्षोभ-संताप टपकने लगा था लेकिन थोड़ी देर बाद कलेजे को पत्थर सा मजबूत बनाकर पागल सी हँसते हुए बोली

 

” Sorry Sid, थोड़ी खुदगर्ज हो गयी थी But I am extremely Sorry. अच्छा चलो हाँथ मुँह धो लो खाना गरम करके रख दिया है और तुम्हारा फ़ोन तुम्हारे बेड के पास हीं चार्जिंग में लगा दिया है तुम्हें रात को जरूरत पड़ेगी Office Assignment के लिए।

 

काफी दिन बीत गए हमेशा की तरह सिद्धार्थ office के कामों में मशगूल रहता आये दिन office Tour लगते रहते और फोन से Work From Home चलता रहता, इधर शिवानी भी सिर्फ श्रेया में मशगूल रहनें लगी थी।दिल तो विधवा हो चुका था लेकिन सिन्दूर के लालिमा की चमक अब भी बरकरार थी।

 

एक दिन जब सिद्धार्थ घर लौट रहा था तब चौराहे से हीं लोग उसे घुरनें लगे थे कुछ अजीब सी निगाहों से लेकिन वो तो फ़ोन पर Office Assignment में busy था, घर पहुंचा तो सन्नाटा पसरा हुआ था घर में जैसे कोई मौत हो गयी हो और मातम का पहरा हो पूरे घर में।

अब रात होनें को थी तो पड़ोसियों नें घर से निगाह हटाकर दीवार से कान लगा लिया था।सिद्धार्थ की निगाह पड़ते हीं पिताजी के आँख से अंगारे फुट पड़े ये कहते हुए की तुम्हारी पत्नी नें वर्षों की इज़्ज़त को अपनी हवस तले रौंद दिया वो भी सरेआम. . .

 

सिद्धार्थ नें गुस्से में काँपते हुए फ़ोन दीवाल पर दे मारा जिससे से office की सारी फाइलें बिखर गयीं और चिल्लाते हुए शिवानी को आवाज लगाई

 

शिवानी ई ई ई ई ई. . .

 

उधर से उससे भी तेज़ गर्जन से आयी आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूँज गयी

 

चुप अ अ अ अ अ अ. . .

 

भूल गए तुमनें भी तो कहा था ” Same Here ”

 

याद रखना सिद्धार्थ तुम्हें किसी को पटानें के लिए जतन की जरूरत होगी पर हम औरतों को उनकी निग़ाह हीं बहुत है रिझानें के लिए।