#Kahani by Jitendra Yadav

मुबारक हो. . .लड़की हुई है

 

सुनते हीं खामोशी और उदासी इस कदर पसर गयी मानो मुबारक़ नहीं मातम सुन लिया हो या फिर से नोटबन्दी की ख़बर।

रोम-रोम से प्रसव-पीड़ा झलकनें लगी है और छोरी होनें की टीस के मरोड़े दिमाग़ में उठ रहे हैं। पर मन के विपरीत जबरन दांत निपोरना और खुस दिखनें की Acting करना भी लाज़मी है क्योंकि तथाकथित progressive और Modern का तमगा बरकरार रखनें की बेबसी जो है नहीं तो लोग क्या कहेंगें।

 

ये और बात है कि बोले गए शब्द शक्ल और आंखों से मैच नहीं कर रहे थे, पर बेचारे वार्ड बॉय को ये समझ कहाँ थी, वो शब्दों से अभिभूत होकर बधाई माँग बैठा, बस फिर क्या था माँ के क्षोभ और सब्र का बांध भर्रा के टूट पड़ा।

 

रे बावड़ै, तेरी मती किते घास चरण जा रही है? अंधे तन्ने दिखता को न्या ? छोरी हुई है “

अचानक उसकी चेतना वापस आती है और वो मुँह लटकाए चल देता है वहाँ से।

 

अच्छा छोरी होने की टिस के cells है तो सबके दिमाग में पर अंदाज-ए-बयां अलग है।

किसी का गुस्से में निकल गया किसी का Motivation और दिलाशा के रूप में निकल रहा जैसे:-

लक्ष्मी जी आयीं हैं “

लड़की अपनी किस्मत साथ ले के आती है “

लड़का भाग्य से लड़की सौभाग्य से होती है “

बहन- अरे कोई नेग मत दियो “

बाप- अरे तू चिंता मत कर मैं अभी जिंदा हूँ “

और भी जानें क्या-क्या . . . !

 

संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल के तीसरे माले पर लेबर रूम के बाहर मैं हाँथ में हेलमेट लटकाए, नंगी आंखों से देख और मफ़लर बंधे कानों से सुन, इस मानसिक उथल-पुथल में लगा हुआ हूँ कि अब दोस्त को जाके congratulation कहुँ की better luck for next time.

फ़िर कंफ्यूजिया के बोल दिया ” चल साले खुश हो जा दारू मैं पिला दूंगा।

 

फिर सोचता हूँ कि दोगलापन तो समाज के रग-रग में बसा हुआ है। Equalism और Humanism की डींगें हाँकनें वाले लोग दर-असल घोर Anti-feminist हैं। न सिर्फ़ मर्द बल्की इस सोच के पोषण में खुद मिहिलाओं का योगदान भी कमतर नही है।

मुझे याद है मेरी एक महिला-मित्र बददुआ देनें में क्रम में कहती थीं ” भगवान करे तुझे लड़की हो ” हालांकि वो जबरदस्त फेमिनिस्ट हैं पर उनके भी ज़ेहन के किसी कोने में लड़की शब्द अभिशप्त था।

अभी यही ख़्याल दिमाग में गुल्ली-डंडा खेल हीं रहे थे कि तभी फोन बजता है माता जी का फोन है,

 

ये बबुआ बड़की भुंवरी भईंसिया पाँड़ी गिरवलस हिय हो, दु बेरी से पाँड़ा गिरावत रहल हिय, चला अब एहू क बंस चल जायी खूंटा पर।आवा फेनुश खा के चल जइहा “

नाहीं माई अबही छूट्टी नइखे तोहन लोग खा हम थोड़ी देर बाद फोन करब “

 

फिर मोबाइल पर नज़र पड़ती है तो देखा FB, Twitter पर कोई फ्रीडम यादव ट्रेंड कर रही हैं। जिन्होंने 450 वर्षों की पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए इस बार महिलाओं की कुश्ती में बनारस केसरी का खिताब अपने नाम किया है।

 

बस इन दो घटनाओं नें विचारों का रुख मोड़ दिया कि यही है वो मानव समाज जिसमें एक तरफ़ पांड़ी बियानें पर जश्न मना रहा है और लड़की पैदा होने पर शोक।एक तरफ़ लड़की पैदा होनें पर अवसाद में गड़ता समाज दूसरी ओर लड़की के विजयी होते उसके नाम का जप कर रहा है।

 

दरअसल किसी को gender विशेष से न कोई लगाव है न नफरत बस Assets और Liability वाला नज़रिया है।

पता है बेटी हुई है अभी से दहेज़ के लिए पैसा जोड़नें दायित्व आ गया, लड़का हुआ तो दहेज लेनें का स्वामित्व आ गया। स्वाभाविकतः लोग Life की Balancesheet में assets के होनें पर ज्यादा जोर देंगें।

ये बात और है कि लड़कियां इतनें कम समय में खुशियों का खाता Credit कर देती हैं कि आजीवन उनसे लगाव कभी Debit नहीं हो पाता। जबकी बहुत बार लड़के के bad debts को appreciate करते-करते जीवन बीत जाता है।

 

ख़ैर जिस दिन Reserve for Dowery Debts का provision हट जाएगा, लड़कियां ख़ुद को लड़की मानना बंद कर देंगी यक़ीनन लोग लड़की होनें का जश्न मनानें लग जायेगें।

 

अभी तो आलम ये है कि Equality की पुरजोर वकालत करनें वाली लड़की भी जरा सी प्रिफरेंस दिखते ही लड़की ख़ुद को लड़की/कमजोर साबित करनें लगती है चाहे वो किसी भी पोजीशन पर क्यूँ न हो, कुछ अपवादों को छोड़कर. .

 

 

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