#Kahani by Laxmi Tiwari

एक छोटी की कहानी :  डाली से टूटे हुऐ अंगूर की

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आज मै स्टेशन पर खड़ी थी , सामनें से फलों का ठेला गुजर राहा था,

मैं वहाँ गयी और फल बेचने वाले भईया जी से मैं फलों की कीमत पूछी फिर वो मुझे कीमत बताने लगे फिर वो जब अंगूर की कीमत बताने लगे तो मुझे अलग – अलग जगह पर रखे हुऐ अंगूरों की अलग – अलग कीमत बतायें.

वो बोले बच्ची ये डाली से टूटे हुऐ अंगूर की कीमत बाकी है सभी फलों से कम है.

तो मैं उनसे पूछी भईया जी दूसरे साईड में रखे हुऐ अंगूरों में और इन अंगूरों में क्या फर्क है जो इसकी कीमत इतना कम है तो फल वाले भईया जी एक मिनट सोचे फिर बोले की बच्ची ये वो अंगूर हैं जो डाली से टूट गये है पर इंसान डाली में लगे हुऐ अंगूर के गुच्छे ही लेना पसंद करते है तो हमें इनकी कम कीमत लगानी पड़ती है और ज्यादतर लोग तो ये डाली से टूटे हुऐ अंगूर लेना भी नहीं चाहते

तो मैं भी उनकी बात समाप्त होने के बाद डाली में लगे हुऐ अंगूर लेके वापस आ गयी

और वापस अपनी ट्रैन में अपना स्थान ग्रहण करके फल वाले भईया जी की बातें सोचने लगी तो मुझे एक बात समझ आयी की हम इंसानों को दूसरों की एकता से इतना प्रेम है पर हम लोगों को अपनी ही एकता से परेशानी होती है हम डाली से टूटे हुऐ फल लेना नहीं पसंद करते है अगर यही बात हम अपने वास्तविक जीवन में लागू कर ले तो ये तो इस संसार, हमारे अपने परिवार, हमारे समाज में कितना आंशिक प्रेममय और सुखमय वातावरण हो जायेगा काश हम इंसान इस एकता और प्रेम के सुखद अनुभव को समझ पाते और अपने इस टूटे अर्थात आखरी जीवन और परिवार से छुटकारा पा पाते और प्रेमपूर्वक अपने परिवार के साथ अर्थात अपने माता – पिता और अन्य प्रिय जनों के साथ मिल – जुलकर अपनी डाली और जड़ों से जुड़कर प्रेमपूर्वक रहकर इस सुखद अनुभव का एहसास कर पाते.

आज की कहनी में बस इतना ही.

हमें आशा है की आप सब जो लोग इस कहानी को पढ़ रहे है वो अपने जीवन में प्रेमपूर्वक रहना चाहते है और आगे भी मिल जुल कर प्रेमपूर्वक रहने का प्रयास करते हुऐ इस देश और समाज के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान देंगें.

इस कहानी को इतना अच्छे से पढ़ने के लिये आपका आभर.

आपकी अपनी प्रिय नन्ही लेखक लक्ष्मी तिवारी.

 

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