#Kahani by Madhu Mugdha

आज कई दिनो के बाद

आसमान साफ दिख रहा था !!

हल्की हल्की धूप निकल आयी थी

मैने सोचा आज कुछ सामानो को धूप दिखा दूं वैसे भी बारीस के मौसम मे सामान खराब होने लगते है !!

अभी मै बस बडी़ को फैला कर लौट ही रही थी कि ,एक जगह निगांह टिककर रह गयी !

आंखे पथरा सी गयी ..

मस्तिक पटल पर आवाज गुंजने लगी

नानी मुझे अभी चाहिये

आप ही दो मुझे

मन भर आया ..

अपाहिज सी हो गयी मै

एकांत पा मन स्मृतियों के हिंडोले में जा बैठा है |

हजारो कीलोमीटर दूर बिटीया पास मे दिखने लगी और आंखे शब्दबिहीन हो गयी …

अभी कल की हो तो बात है

मै अपना सामान पैक करती जाती

और बाबुजी से कहती जाती

मुझे जल्दी बूला लेना मै आपके बिना नही रह सकती ,

और बाबूजी प्यार से कहते बस तुम दिन गिनना मै आ जाऊंगा …

और मै शिका़यत भरी लहजे से बाबूजी से कहती

हां मुझे पता है ….

वही शब्द आज जाते जाते बिटीया कह गयी

हां मुझे पता है …

आज अहसास कर पा रही थी अपने बाबूजी की बेबसी को

मै भी असहाय सी हो गयी थी !!

बिटीया के इस बात पे

कितने असहाय हो जाते है मां बाप

कोई कंहा रख पाता है बेटीयों को…

आंखो के कोरो से दो आंसू लुड़क गये

मन को सान्तवना देने लगी

कितने दिन लगते गुजरने मे ..

जल्द ही आ जायेगी

और आंसूपोछ कर चल दे नीचे

 

 

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