#Kahani By Madhu Mugdha

 

रिमझिम फूहारे अब भी पड़ रही  थी

चाय लेकर आकर बरामदेमे बैठ गयी!

ठन्डी हवा बड़ा सुकून दे रही थी!

अांखे बन्द कर कुछ पल अतित  मे जीने को दिल चाहा!

कुछ पाने की चाह  मे निरंतर  भागते रहना

कितना कुछ जिन्दगी की सच्चाई  से

अवगत करा देता है !!

और जीवन के इस आपा धापी मे

अपनी जिंदगी  जैसे बिखर के

रह जाती है…..

अभी कल ही इनसे कह कर रेडियो  मंगायी !

ये अचंभित  से मुझे देख रहे थे

एक प्रश्न  ???

रेडियो वो क्यूं  ?

टीवी देखो ,मूवी देखो

म्यूजिक सिस्टम है फिर????

Uffff

मैने कहा तुम नही समझोगे मुझे ना, फिर से अपने पुराने दिन को जीना है!!

रेडियो मे विविध भारती  लगा था !

मै फिर से खो गयी!

मै और मेरी सहेली बेबी कितने  सुहावने थे वो दिन

ना किसी बात की चिंता ,  ना डर, बिदांस  ज़िन्दगी  जीया हमने !!

बाबुजी ने हमलोगो को लड़को के तरह पाला था !

कितना  कुछ था उस वक्त  हमलोगो के पास रीयल मे  इलेक्ट्रॉनिक दुनिया  से दूर केवल रेडियो के सहारे  ..

कितनी हसीन शाम और शुबह करती थी…

पूरे बिल्डिंग मे केवल एक लोगो के पास टीवी था!!

हर रविवार  5 बजे से तैयार हो जाते थे !

की टीवी  मे आज फिल्म  आयेगी  तो देखना है!

और इंटरवल में पैसा इकठ्ठा कर के समोसे  लेना

कैसे भूल जाऊ  ???

वो एक एक पल जो हमने साथ साथ जिया है !

पर अफ़सोस  अब इन बातों  को याद करने के लिये मै अकेले  ही रह गयी !

मेरी वो दोस्त  आज से दो साल हो गये ,छोड़ के चली  गयी..

कितना कुछ दबा रह गया उसके दिल मे

जो शायद कहना चाहती थी!

रेडियो घर्र घर्र करने लगा शायद मौसम के

ख़राब होने की वजह  से..

अचानक  उठ कर शीशे के सामने आकर देखने लगी!

बालों मे अब सफेदी  झांकने  लगी थी !

मुस्कुरा  दी अब शाम ही तो है जिंदगी  की

एक शायरी याद आ गयी

बशीर भद्र जी की ….

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

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