#Kahani by Mahakal Bhakt Kuldeep

में तब 11 साल का था मुझे याद है बहुत बीमार था और उस वक़्त दवाई कराने के लिये भी पैसे नहीं थे क्योंकि कोई था ही नहीं घर में कमाने वाला और पिताजी पुरे दिन नशे में चूर रहते थे । जितना कमाते थे उससे ज्यादा की वो शराब पी जाते थे । और माँ भी छोटा-मोटा काम कर लेती थी बस इसी से घर चलता था । जब डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहाँ इस लडके को दाखिल करना पड़ेगा जल्दी से जल्दी इसे मलेरिया हुआ है और हालत बहुत ख़राब है लड़के की । अब मुझे अस्पताल में दाखिल करने के लिये माँ के पास पैसे नहीं थे और मदद करने वाला भी कोई नहीं था । माँ ने कहाँ यहाँ बैठ में आती हु (मुझे अस्पताल के बहार बैठने को कहाँ) । मेने सर हिला दिया । जेसे माँ दूर जा रही थी मेरे मन में अजीब अजीब ख्याल आने लगे और कुछ सवाल उठने लगे । में भी पीछे पीछे चल दिया । जब माँ एक सुनार की दुकान पर जाकर रुकी में भी रुक गया । माँ के दूकान के अंदर जाने के बाद में वहाँ जाकर खड़ा हो गया और शीशे में से अंदर झांकने लगा । देखा तो मेरी माँ ने अपना मंगलसूत्र निकाल कर उस सुनार की टेबल पर बेचने के लिये रख दिया और में बहार खड़ा खड़ा देखता रहाँ ।

K.r.yadav

 

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