#Kahani By Mukesh Kumar Rishi Verma

लघुकथा – बेचारी सबीना

——————————-

 

रात के तकरीबन दस बजे होंगे | सबीना अपने दोंनो बच्चों  को लिए खाट पर भूखे पेट करवटें बदल रही थी | तभी जोर – जोर से कोई दरवाज़ा पीटने लगा… लड़खड़ाती आवाज में ‘ कित्ते मर गई… खोल ना रही… भौ&&&की,कौनसे खसम के संगे कालो मुंह कर रही है | ‘

 

बेचारी डरी – सहमी सबीना समझ गई, आज फिर आया है जुआ हार के और शराब में धुत्त होके | सबीना ने कांपते हाथों से किवाड़ की सांकल खोल दी | सांकल खुलते ही भूखे भेडिये की तरह वो टूट पड़ा और तब तक पीटता रहा जब तक कि वो स्वयं बेहोश न हो गया |

 

कोने में पड़ी – पड़ी सबीना सिसक – सिसक कर अपनी फूटी किस्मत पर रो रही थी ‘ मरघटा बारे, तेरी छाती पै कंड़ा जरैं, तेरी कढ़ी खाऊं… तू आजु ही मरि जावै तोऊ मैं तो अपने बच्चन कूं पाल लूं | पागल हती मैं जो तेरी चिकनी – चुपड़ी बातन में आके कोर्ट मेरिज करिलई… | ‘

 

सबीना अपने पति से मार खाकर बुदबुदाती रही… | सबीना ने भी क्या किस्मत पाई है | ठीक तीन साल पहले वो कॉलेज की छात्रा थी | मंगल के प्यार – व्यार के चक्कर में फसकर अपने माँ – बाप, भाई – बहिन की मर्जी के खिलाफ उसने मंगल से कोर्ट मेरिज करली |

 

आज सबीना इतनी बेबस है कि वो अपने मायके भी नहीं जा सकती, क्योंकि तीन साल पहले ही वो सारे रिस्ते – नाते तोड़ चुकी थी, अब बस मंगल के अत्याचार सहने के सिवाय उसके पास कोई दूसरा चारा भी नहीं… बेचारी बेबस सबीना !

 

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

गॉव रिहावली, डाक तारौली गुर्जर,

फतेहाबाद, आगरा, 283111UP

 

585 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Whatspp dwara kavita bhejne ke liye yahan click karein.