#Kahani by Mukesh Kumar Rishi Verma

लघुकथा – एक नई आशा
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मैं गृहनिर्माण से सम्बन्धित कुछ सामान खरीदने फतेहाबाद गया था | सामान खरीदने के बाद, दुकान पर लॉडिंग वाहन के आने का इंतजार करने लगा | समय करीब आधा घंटा बीत गया तो टहलते-टहलते बाहर सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे आ कर खड़ा हो गया | तभी एक जादूगर अपने छ: – सात वर्षीय मासूम के साथ वहाँ आ गया और मुझसे बोला ‘ ए बाबू ! हम इस पेड़ के नीचे छाया में बैठकर खेल दिखा सकता हूँ क्या…?’

‘हाँ-हाँ… क्यों नहीं जरूर दिखाओ’… मैंने उसे यह सोचकर बोल दिया कि कुछ टाइम पास हो जायेगा |

उसने अपने जादूगरी के खिलौने शेर, डायनासोर, नेवला, सांप आदि थैले से निकाले और अपनी दुकान जमाने लगा | मैं उसका डमरु बजाने लगा पर मुझसे सही तरीके से बजा नहीं तो जादूगर का छोटा बच्चा हंसने लगा, उसकी हंसी देख मुझे भी हंसी आ गई | वैसे मैं देख रहा था वो शुरू से ही कुछ निराश सा था |

तभी डमरु की आवाज़ सुनकर दुकानदार बाहर आ गया और बेचारे जादूगर पर लाल-पीला हो गया | तमाम उल्टी-सीधी गालियाँ बक गया पर बेचारा जादूगर हाथ जोड़े बिनती करता रहा – ‘साब जी! गरीब हूँ, दिवाली का त्यौहार नजदीक है | दो पैसे यहाँ पेड़ की छॉव में आ जायेंगे | बस आधे घंटे की बात है |’

‘अबे! यहाँ से अपने टाट-कमंडल उठा रहा है कि अभी मैं ही उठाके फैंकू… निकल यहाँ से सुबह-सुबह आ जाते हैं मूड खराब करने |’

‘ठीक है – ठीक है माईबाप जाता हूँ’…
बेचारे जादूगर ने कुहनी तक हाथ जोड़े और अपना सामान समेटने लगा | मैंने उसकी सामान समेटने में मदद की और उसे समझाया ईश्वर पर भरोसा रखो हो सकता है यहाँ खेल देखने दर्शक न आते और तुम्हारी मेहनत बेकार चली जाती, इसीलिए शायद इस दुकानदार ने तुम्हारा खेल शुरू होने से पहले ही खत्म करा दिया | अभी शाम दूर है | कोई और जगह तुम्हारा इंतज़ार कर रही है | इतना सुनते ही उसका मायूस – दुःखी चेहरा एक नई आशा के साथ चमक उठा और वो मुस्कराता हुआ चला गया… |

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
ग्राम रिहावली, डाक तारौली गुर्जर,
फतेहाबाद, आगरा, 283111

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