#Kahani Narendra Ranawat

नजरिया

मैं जैसे ही बस में चढ़ा, एकमात्र खाली सीट देख वहीं बैठ गया। पास वाली सीट पर एक 15-16 साल की बालिका बैठी हुई थी। उसकी असहजता बता रही थी कि ‘वह अंतर्मुखी है और अकेले सफर करना शायद उसके लिए कठिन होता है। हो भी क्यों न? समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों की चीखें ऐसी कितनी ही बिटिया की विकास राह में अवरोधक बनतीं हैं।

मैंने आदतन सफर में एक पुस्तक निकाली और पढ़ने लगा। ‘व्यक्तित्व विकास’ का पहला पृष्ठ पढ़ ही रहा था कि ‘एक्सक्यूज मी’ ने ध्यान आकर्षित किया। मैंने देखा तो बालिका ने उस पुस्तक के प्रकाशक और लेखक का नाम नोट करवाने का अनुरोध किया। मैंने उसे पुस्तक दे दी। उसने अपनी कॉपी में आवश्यक जानकारी नोट की और पुस्तक मुझे लौटा दी।
मैंने बालिका से उसका परिचय जाना, उसकी रुचि जानी । विश्वास की किरण शायद उसे भी नजर आई। उसने खुलकर मुझसे अपनी उलझनों को साझा किया। मैंने अपनी ओर से उसे पूरी सद्भावना दर्शाते हुए कुछ सुझाव दिए और फिर पुस्तक पढ़ने लगा।

चार घंटे के सफर के दौरान मैं पुस्तक पूरी पढ़ चुके था । गंतव्य पर पहुंचकर मैंने वह पुस्तक उसे बतौर उपहार देना चाही । पहले तो उसने इनकार करना चाहा लेकिन बदले नजरिये ने उसे इसकी सहमति दे दी, उसने मेरा अनुरोध स्वीकार कर पुस्तक ले ली।

“अरे बेटा, किसका लिफाफा आया है, कौन है तेरी बहन जो राखी भेजेगी ?” मां ने मेरे हाथ में खुला लिफाफा देखकर पूछा ।

आठ माह पहले की सफर की यादों में खोया मैं तंद्रा से बाहर आ चुका था। मुस्कराते हुए मैंने मां के हाथ में लिफाफा थमा दिया और अपना वह यात्रा वृतांत भी सुना दिया।

मुझको वर्षों तक “आवारा” समझने वाली मां का नजरिया भी मेरे प्रति आज बदल चुका था।

— नरेन्द्र राणावत
गांव-मूली तहसील-चितलवाना
जिला-जालौर
राजस्थान
+919784881588

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